नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
हिन्दीटीकासहित ८५ अथेह बान्धवास्तस्य गतस्य परमां गतिम् । वैष्णवास्त्वभिनन्देयुः पुण्यामवभृथक्रियाम् ॥८७॥ इधर यहां भूलोक में उस प्रपन्नभक्त के बन्धुबांधव जन परमगति प्राप्त करने वाले उस वैष्णव का अभिनन्दन कर पुण्यभूत संस्कारान्त में होने वाले अवभूत स्नान को सम्पन्न करते हैं॥८७॥ क्रियते चास्य पुत्राद्यैर्यत् किमप्यौर्ध्वदैहिकम् । तत् सर्वं प्रियभक्तस्य विष्णोः प्रीतिकरं परम् ॥८८॥ और तब इसके पुत्रादि के द्वारा संस्काररूप में किये गये और्ध्वदेहिक विधान आदि क्रियाएँ भी भक्तिप्रिय श्रीविष्णु की परमप्रीति करनेवाली हो जाती हैं॥८८॥ गुरूणामन्तिमतिथौ जन्मर्क्षे श्रवणेऽपि वा । हरिमभ्यर्चयेद् भक्त्या तद्भक्तांश्च विशेषतः ॥८९॥ ऐसे परम वैष्णव गुरु की अन्तिम या पुण्यतिथि के अवसर पर जन्म नक्षत्र के या सुनी गयी उनकी तिथि के दिन भक्तिपूर्वक श्रीहरि की अर्चना करे तथा उनके शिष्य और भक्तजन इस कार्य पर ध्यान विशेषरूप से रखे॥८९॥ ज्ञानकर्मक्रियामन्त्रध्यानयोगगतिक्रमाः । विस्तरेण मया पूर्वमुक्तास्तत्रापि ते समाः ॥९०॥ श्रीहरि के प्रति प्रपत्तिभाव रखने के बाद जिन कार्यों को मैंने यहां पूर्वमें विस्तारसे कहा था उन सभी ज्ञान, कर्म, क्रिया, मन्त्र, ध्यानयोग, गति तथा क्रमों का अनुसरण करना चाहिए। यहां भी इसी प्रकार इनका अनुगमन समान भाव से किया जाए॥९०॥ उपासनाविधौ धर्मा ये चान्यैः परिकीर्तिताः । न्यस्तात्मानस्तु तान् सर्वान् फलान्येव निबोधत ॥९१॥ और न्यस्त या प्रपत्तिभाव करनेवालों के विषय में अन्य पूज्य मुनिजन के द्वारा उपासना के विधानों में जिन उपायादि का कथन किया गया है उन सभी उपायों को भी जानना उचित है॥९१॥ अभ्यर्थितो जगद्धात्र्या श्रिया नारायणः स्वयम् । उपादिशदिमं योगमिति मे नारदाच्छ्रुतम् ॥९२॥ इस योग का साम्प्रदायिक क्रम पूर्व में स्वयं संसार की विधात्री श्री लक्ष्मी के श्रीमहाविष्णु से प्रार्थना करने पर इस न्यासयोग का उपदेश दिया था जिसे मैंने श्री नारद ऋषि से सुनकर ग्रहण किया है॥९२॥
८६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इति हस्तपदे साङ्ख्यं शास्त्रं गुह्यतमं परम् । शिरश्चैतन्मयोक्तायाः संहिताया भविष्यति ॥९३॥ इस प्रकार इस देवगण से भी अज्ञात गुह्यतम सांख्य शास्त्र का मैंने शीर्षभूत सिद्धान्त यह न्यासयोग बतलाया जो मेरे द्वारा कही गयी संहिता का रूप लेकर भविष्य में प्रवृत्त होगा॥९३॥ संहितोपनिषदस्मिञ्च्छास्त्रे ज्ञेयान्यनुक्रमात् । आदौ न्यासः फलञ्चास्य तदुपायश्च सङ्ग्रहः ॥९४॥ इस प्रकार इस भारद्वाज संहिता के रूपवाले गुह्यतम उपनिषद्भूत इस शास्त्र में क्रमशः मैंने न्यासयोग, न्यास का फल तथा उसके उपायों को संग्रह कर चार अध्यायों में प्रतिपादित शास्त्र में बतलाया है॥९४॥ ततो न्यासस्य चाङ्गानां निर्णयः सविरोधिनाम् । ततश्च फलरूपाया वृत्तेरङ्गानि विस्तरात् ॥९५॥ और इसमें न्यास तथा उसके अंगों का उनके विपरीत भावों के साथ निर्णय दिखलाया है तथा फलभूत वृत्तियों तथा उनके अंगों का भी विस्तार से निरूपण किया गया है॥९५॥ वृत्त्यङ्गसेवञ्च ततो निन्यहानं गतिस्तथा । एवं चतुर्भिरध्यायैः कथितानि विशेषतः ॥९६॥ इसी क्रम में वृत्ति तथा उसके अंगों का विचार, इसके बाद प्रतिषिद्ध विवर्जन का विवेचन किया गया। इन सभी को विशेषरूप से चार अध्यायों के द्वारा बतलाया गया॥९६॥ इत्थं प्रसादाद् देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः । कृतोऽत्र वेद-वेदान्त-पञ्चरात्रार्थनिर्णयः ॥९७॥ इस प्रकार यहां अमितौजाः महर्षि नारद मुनि के प्रसाद से मैंने वेद तथा वेदान्त के अनुगत पञ्चरात्रआगम के अर्थों का (तात्पर्यों का) शास्त्रीय निश्चय दिखलाया है॥९७॥ इत्येतत् परमं गुह्यं श्रुत्वा भागवतोत्तमाः । मुनयः पूजयाञ्चक्रुर्भारद्वाजं तपोनिधिम् ॥९८॥ इस प्रकार वेद ग्रहण के तुल्य परम रहस्यों से पूर्ण पञ्चरात्र के अर्थों को सुनकर परमभागवत मुनिगण ने तपोनिधि भारद्वाज की प्रसन्नता से अर्चना की॥९८॥
हिन्दीटीकासहित ८७ श्रुत्वादौ नारदात् सम्यग्भारद्वाजोऽर्थसङ्ग्रहम् । महतीं संहितामेता चकार मुनिचोदितः ॥९९॥ प्रथम वार श्री देवर्षि नारद से पञ्चरात्र आगम के अर्थों का श्रवण कर बाद में नारदमुनि की (ही) प्रेरणा से इस विस्तीर्ण संहिता की मैंने रचना की॥९९॥ यश्चेमां संहितां पुण्यां शृणुयाच्छ्रावयेत वा । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वकामान् समश्नुते ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां न्यासोपदेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ अतएव जो इस पुण्यदात्री तथा सभी पातकों को दूर करनेवाली भारद्वाज प्रोक्त संहिता का नियतमन से वह श्रवण करता है, वह सद्यः सभी पातकों से मुक्त होकर सभी इच्छाओं (कामनाओं) की प्राप्ति करेगा॥१००॥ नारदपञ्चरात्र की भारद्वाजसंहिता में न्यासोपदेश नामक चतुर्थाध्याय की तत्वप्रकाशिका नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त
८८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे अथ प्रथमोऽध्यायः भूय एवर्षिभिः पृष्टो भारद्वाजस्तपोनिधिः । अनुक्तानब्रवीद्धर्मान् उक्तांश्चैव प्रसादयन् ॥१॥ न्यासोपदेश को सुनकर ऋषिगणों के द्वारा भरद्वाजमुनि से इन्हीं विषयों पर पूछे गये प्रश्नों को सुनकर पूर्व में कथित न्यासोपदेश को और अधिक स्पष्ट करने के साथ इसी क्रम में अनुक्त तत्वों को भी दिखलाते हुए भरद्वाज मुनि पुनः उनसे कहने लगे।।१।। धर्मो वर्णाश्रमादीनां कार्त्स्न्येन मुनिसत्तमाः । शिष्टो व्याससमासाभ्यामार्षे-र्दिव्यैस्तथागमैः ॥२॥ हे मुनिजन! वर्ण तथा आश्रम आदि के धर्मों को ऋषि प्रोक्त वेदादि, धर्मशास्त्र तथा दिव्यआगमों के द्वारा (पञ्चरात्र संहिता आदि से विस्तार तथा संक्षेप में दिखलाया या उपदिष्ट किया गया है) तथा कहीं विस्तार तथा संक्षेप को मिलाकर अनतिसंकोच तथा विस्तार से भी बतलाया है।।२।। अत्र केचित् परं तत्वं रजोमीलितदृष्टयः । अपश्यन्तोऽभिजानन्ति धर्मस्य न परां गतिम् ॥३॥ परन्तु कुछ रजोगुण से युक्त दृष्टि वाले बनकर आर्षदिव्यादि शास्त्रों को न देखते हुए धर्म की परमगति को नहीं समझ पाते हैं, अतएव वे उपयुक्त न्यायादि से परिशीलित फलभूत निर्णय से वंचित से हैं।।३।। केचित्तु सत्वसम्पन्नाः केशवेनावलोकिताः । सारासारविदः प्राज्ञाः परं धर्मं विजानते ॥४॥ और कुछ जो सत्व सम्पन्न हैं तथा इसी कारण श्रीविष्णु से जन्म के समय से ही सम्बद्ध हैं तथा उनके विलोकन के सौभाग्य से युक्त हो चुके हैं वे अपने सत्वगुण की सम्पत्तिगत विशेषता के कारण सारासार के अभिज्ञ होकर तीक्ष्णबुद्धि के द्वारा परमधर्म मोक्ष को जाननेवाले हो जाते हैं।।४।।
हिन्दीटीकासहित ८९ यदैकान्त्यङ्गता विष्णौ भगवत्यात्मभावने । तद्वैष्णवा भागवताः सन्त इत्यपि ते स्मृताः ॥५॥ जो आत्मभावन श्री भगवान् विष्णु के विषय में प्रपत्ति आदि से एकान्तभाव को प्राप्त कर चुके हैं वे वैष्णव तथा भागवत जन ही सन्त कहे जाते हैं॥५॥ नियोक्ता भगवान् विष्णुनियोगस्तस्य वै श्रुतिः । नियोज्याः सत्वसम्पन्ना मुख्या मोक्षार्थचिन्तकाः ॥६॥ ज्ञानादि षड्गुण सम्पन्न भगवान् श्रीविष्णु इस धर्म के नियोजक देव हैं तथा श्रुति (वेद) उस पुरुष का नियोग (आज्ञारूप) है। इस श्रुति प्रतिपादित धर्म में नियुक्ति के योग्य अधिकारी वे हैं जो सात्विकगुणों से सम्पन्न तथा मोक्षतत्व के विचारक हों, वे ही यहाँ मुख्य अधिकारी माने गये हैं॥६॥ अन्यथैवाभिमन्यन्ते सर्वमेतत् कुदृष्टयः । यतो दूरतरास्ते हि तथा भागवता अपि ॥७॥ परन्तु इस विषय में जिनकी दृष्टि स्पष्ट नहीं है ऐसे जन इस मोक्षादि तत्व को दूसरी ही पद्धति से लेकर समझने की बात करते हैं। क्योंकि वे सभी पदार्थादि से परे रहने वाले परमात्मा श्रीहरि से अपनी निष्ठा तथा आचरणों के कारण दूर बने हुए हैं॥७॥ यथा पृथग्विधा वर्णा यथा तत्रैव चाश्रमाः । विविक्तमत्तयस्तत्र तथा भागवता अपि ॥८॥ जैसे ब्राह्मणादि वर्ण परस्पर भिन्नरूपादि वाले हैं तथा इसी प्रकार जैसे ब्रह्मचर्यादि आश्रम भी परस्पर भिन्नरूपादि वाले हैं तथा विभिन्नबुद्धि सम्पन्न होते हैं। इसी प्रकार विविध मतों से युक्त बुद्धिवाले सत्वसम्पन्न अनन्यबुद्धि भागवत भी अनेक प्रकार के हैं जो वर्ण तथा आश्रमों में स्थित हैं। (ये भी भक्त, प्रपन्न तथा शुद्ध, मिश्र आदि भेदों के कारण अनेक भेदों से युक्त हैं)॥८॥ ईशभक्तिफलोपाया ईशैकफलसाधनाः । द्विधा ह्येकान्तिनस्ते च शुद्धा मिश्रा इति द्विधा ॥९॥ परमेश श्रीविष्णु, उनकी भक्ति को क्रमशः जो फल तथा उपायरूप में माननेवाले भक्ति के उपाय निष्ठ रहने वाले प्रथम प्रकार के तथा भगवान् श्रीविष्णु को परमेश मानकर उन्हें ही एकमात्र फल तथा उसकी प्राप्ति का साधन भी मानते हैं ये दूसरे प्रकार के हैं। ये दोनों ही एकान्ती हैं तथा इनके प्रत्येक के शुद्ध तथा मिश्ररूप में दो प्रकार होते हैं॥९॥
९० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता विशुद्धज्ञानकर्माणः श्रौतदिव्यार्षवर्त्मभिः । भक्तिनिष्ठाः परं ब्रह्म नारायणमुपासते ॥१०॥ इनमें प्रथम “ईशभक्तिफलोपाय स्वरूप वाले (वैष्णव) फल की आकांक्षा या आग्रह से हीन, ज्ञान तथा कर्मयोग के प्रति निष्ठावान् होते हैं जो भक्ति को साधनरूप मान लेते हैं। ये भक्तिनिष्ठ होकर मोक्षोपाय में विहित श्रौत, दिव्य-आगम तथा आर्ष- धर्मशास्त्रादि के द्वारा कथित पद्धति में स्थित रहकर उनका अनुसरण करते हुए नारायणरूप परब्रह्म की उपासना करते हैं॥१०॥ नारायणैकशरणाः फलं नारायणः स्वयम् । तैस्तैः स्वादुत्तमैः कल्पैर्यजन्तोऽनुभवन्ति वै ॥११॥ ऐसे जन एकमात्र नारायण को ही एकनिष्ठ भाव से उपाय मानते हैं तथा स्वयं नारायण ही उनका फलभूत प्राप्तव्य होता है। वे श्रौत, दिव्य तथा आर्ष कल्पों में कथित उत्तम विधियों के द्वारा अपने इष्ट की आराधना कर उनका दर्शनादि अनुग्रह का अनुभव करते हैं॥११॥ ये तु वाकनिषन्निष्ठास्तत्तत्संस्कारसंस्कृताः । ते वै भागवताः शुद्धा वासुदेवैकयाजिनः ।१२॥ इसी प्रकार जो ईश्वरोक्त मूलवाणी वेद तथा उपनिषद् आदि परमविद्या के द्वारा विहित संस्कारों से संस्कृत होकर पवित्रभाव से वासुदेव मात्र की यज्ञादि से आराधना करनेवाले अनन्य (एकनिष्ट) भक्त हैं उन्हें शुद्ध तथा भागवत समझना चाहिए॥१२॥ त्रय्या विहितसंस्कारास्त्रय्यन्ते परिनिष्ठिताः । यजन्त्येकान्तिनो मिश्रा विष्णुं विश्वतनुं हरिम् ॥१३॥ जिनके संस्कार वेदत्रयी से सम्पन्न हैं तथा इसी त्रयी के अन्त या शीर्षभूत उपनिषद्रूप वेदान्त शास्त्र में जो परिनिष्ठित ज्ञानवाले हैं वे एकान्तभाव से विश्व के शरीररूप सर्वव्यापी अन्तर्यामी श्री नारायण की स्वविहित यज्ञादि में श्रोतादि विधानों से आराधना करते हैं। ये भागवत भक्त मिश्र कोटि के समझना चाहिए॥१३॥ श्रूयते यत्र यष्टव्या यादृशी या हि देवता । तादृशी सा भवेत्तत्र यजन्त्येकान्तिनो हरिम् ॥१४॥ तथा वेद श्रुति के द्वारा जिस कर्म में जिस देवता के गुण विग्रह आदि दिखलाकर उसका यजन उपदिष्ट हो तो ऐसी जो भी देवता कर्म में विहित है उसी (प्रकार की) देवता में अन्तर्यामी हरि स्थित हैं ऐसा मान कर एकान्तभाव से उपासना करते हैं (तो उसी में श्रीहरि स्थित होकर (सर्वान्तव्यापी होने के कारण) उसके कर्मों का
हिन्दीटीकासहित ९१ फल देकर उसकी सिद्धि प्रदान कर देते हैं॥१४॥ तथा हि वाक् शची दुर्गा धाता शक्रस्त्रियम्बकः । इति नानाभिधारूपो लक्ष्मीशः स्वयमिज्यते ॥१५॥ जैसे विविध धर्मादि अनुष्ठानों में वाणी (सरस्वती), इन्द्राणी, दुर्गा, ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्र आदि के रूप में जहाँ उपासना की जाती है वहां भी अनन्य भाव से यही मानना चाहिए कि स्वयं लक्ष्मीश श्रीनारायण ही अपने इन विराट्रूपों में यहाँ यज्ञादि से उपासित (हो रहे) हैं।१॥१५॥ तथैवात्मपृथिव्याद्या यतो लक्ष्मीपतेर्वपुः । अतस्तैरौपनिषदैरिज्यतेऽखिलविग्रहः ॥१६॥ और जैसे श्रीहरि के सभी जीव तथा पृथ्वी आदि सभी अंश स्वरूप माने गये हैं । अतः उपनिषद् के विद्वानों (वेदान्तशास्त्रवेत्ताजन) के द्वारा ब्रह्म को सभी के उपादानभूत शरीर के रूप में माने जाने के कारण अन्तर्यामी तथा विराट्रूप में लक्ष्मीपति के शरीर का अर्चन किया जाता है। (इस प्रकार परमैकान्तिक रूप में श्रीहरि एकमात्र शरण्य तथा उपास्य बन जाने के कारण अन्तर्यामी रूप हैं, अतः एकनिष्ठता सुरक्षित रहती है)॥१६॥ ततः शुद्धं परं ब्रह्म विशुद्धपरिवारकम् । इज्यते विविधैर्भोगैर्नित्यञ्च प्रतिमादिषु ॥१७॥ इसलिए शुद्धरूप वाला परब्रह्म ही दिव्य विग्रह में स्थित तथा विशुद्ध देवीभूषण दिव्यायुधगण आदि परिवार से युक्त प्रतिमादि में विविध समर्पणीय भोगों से नित्य ही अर्चित होता है (जो मिश्र रूप में अन्तर्यामी तो है पर प्रतिमादि में नित्य एवं शुद्ध यजनीय भी है)॥१७॥ अशुद्धा ब्रह्मरुद्राद्या जीवा विष्णोर्विभूतयः । तान् वै कुदृष्टयः साम्यात् परत्वाद्वाप्युपासते ॥१८॥ जो ब्रह्मा तथा रुद्ररूप अशुद्ध कर्मभाव से रहने से जीवभूत होकर देवभाव से अर्चित भी हो तो भी वे श्रीविष्णु की विभूति के रूप में मान्य हैं। उनको समता का स्थान देकर या परमदेवता के रूप की भावना तथा बुद्धि से जो उपासना करते हैं वे १ आशय यही है कि अनेक नाम तथा रूप से विशिष्ट श्रीलक्ष्मीपति ही सर्वत्र उपासित हैं क्योंकि ये ही प्रत्येक देव में भी अन्तर्यामी रूप से अवस्थित हैं। यहाँ लक्ष्मीश पद सार्थक एवं साभिप्राय रूप से रखा गया है। कहा भी है कि- देवतिर्यङ्मनुष्येषु पुन्नामा भगवान् हरिः । स्त्रीनाम्नी लक्ष्मीर्मैत्रेय नानयोर्विद्यते परम्।।' अतएव देवीभूत शक्ति का आराधन श्रीलक्ष्मीजी का तथा ब्रह्मादि देवाराधन श्रीहरि का आराधन है।
९२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तात्त्विकज्ञान से अनभिज्ञ हैं॥१८॥ अपरत्वेन चाप्येता ये यजन्ति हि देवताः । तेषां भवति नैकान्त्यमतो नैवाप्नुयुः परम् ॥१९॥ और जो दूसरे पक्ष के विद्वान् हैं तथा जो इन्हें अपररूप या स्थिति में अर्चित करते या उपास्य मानते हैं तथा देवतारूप में उनकी यज्ञादि धर्म कार्यों से उपासना करते हैं उनका एकान्त्यभाव नहीं बनता। अतः वे परं निःश्रेयस् भाव को (मोक्ष को) प्राप्त नहीं कर सकते॥१९॥ अङ्गभावेन शुद्धानामर्चा प्रियतमा हरेः । या स्वतन्त्रधिया तत्र सा निहन्ति विविक्तताम् ॥२०॥ परन्तु शुद्धभाववाले नित्यमुक्त अनन्तादि की अङ्गभाव में (अमुख्यरूप से भी) अर्चना करना श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय होती है परन्तु यदि यज्ञादि क्रियाएं किसी (अन्य देवता) की स्वतन्त्र निष्ठा से की जाए तो उससे भगवन्निष्ठा तथा एकान्त्यभाव को क्षति पहुँचने के कारण यह कार्य निषिद्ध माना जाता है॥२०॥ भावनानान्तु कालुष्यादशुद्धिः कर्मणां भवेत् । तस्मात्तेषां विशुद्धयर्थं विष्णुमेव सदा भजेत् ॥२१॥ तथा ऐसे कर्म में भावना के कलुषित हो जाने के कारण कर्म भी शुद्धरूप में नहीं होते हैं। अतएव समस्त कर्मों की विशुद्धि के लिये सदा श्रीहरि की ही उपासना करनी चाहिए॥२१॥ बाह्यः सदसतां नास्ति भेदः प्रायेण कर्मसु । सङ्कल्पादेव भिन्नानि स हेतुर्बन्धमोक्षयोः ॥२२॥ जो भक्त एकान्ती हैं उनके कर्म में प्रायः बाह्य-भेद नहीं माना जाता है (किन्तु संकल्प के कारण ही भिन्नता वाले सन्तों के कर्म भगवत्-प्राप्ति पर्यन्त फलाग्रह से रहित होते हैं) यह भेद प्रायः कर्मों में तथा संकल्प से भिन्नता रखता है तथा यही बन्धन एवं मोक्ष का कारण बनता है (असत् संकल्प बन्ध का तथा सत्संकल्प मोक्ष का हेतु बनता है)॥२२॥ यजेच्छुद्धानशुद्धान् वा साम्यात् पारम्यतोऽपि वा । लभते विविधान् कामान् विभोस्तस्यैव शासनात् ॥२३॥ शुद्ध तथा अशुद्ध के साम्य या परमता के आधार पर यजन (अर्चना) को किया जाता है जो ऐसी विविध कामनाओं को दिलवाता (प्राप्त करवाता) है जो कि परमेश श्रीविष्णु के अनुमत या शासन से होती है (किन्तु इनसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता है)॥२३॥
हिन्दीटीकासहित ९३ त्रिभिः प्रजापतेर्भक्तः सप्तभिः शङ्करस्य तु । विंशत्याग्नीन्द्रसूर्यादिर्जन्मभिर्वैष्णवो भवेत् ॥२४॥ प्रजापति ब्रह्मा का आराधक भक्त तीन जन्मों के बाद शंकर का भक्त सात जन्मों के बाद तथा अग्नि, इन्द्र, सूर्य आदि का उपासक बीस जन्मों के बाद वैष्णव भक्त के रूप में जन्म लेता है॥२४॥ न सांख्येन न योगेन शैवेनापि न तत्पदम् । यदौपनिषदैः प्राप्यं पञ्चरात्रविशारदैः ॥२५॥ रजस्तमो मूलक दर्शनादि के अनुगमन से मोक्ष प्राप्ति का विचार कर कहते हैं कि यह मोक्ष कपिलादि प्रणीत सांख्य-शास्त्र के तथा पातञ्जल या हिरण्यगर्भीय योग-शास्त्र के, पाशुपतादिमत के शैवागम के अनुगमन या सिद्धांतों के मानने पर वैसा (मोक्ष) प्राप्त नहीं होता जैसा कि उपनिषद् के सिद्धान्तों के अथवा पञ्चरात्र-आगम के विद्वानों के अनुगमन करने पर सहज ही प्राप्त हो जाता है॥२५॥ एकैकं वापि नैकान्ती भजेन्नैकान्त्यलक्षणम् । कालेनैकान्त्यमाप्नोति नरो विगतकल्मषः ॥२६॥ मनुष्य इन पूर्व कथित मार्गों में से एक का भी अनुसरण करते हुए अन्य देवता की उपासना करे तो भी समय आने पर या जन्मादि की अवधि के पश्चात् विगतकल्मष या पवित्रता प्राप्त कर वहीं एकान्ती विष्णु भक्त होकर अन्त में परम मोक्ष को प्राप्त कर लेता है॥२६॥ नारायणैकनिष्ठा ये सात्विकास्तान् निबोधत । पुरुषा राजसा ज्ञेया नानादैवतयाजिनः ॥२७॥ अतः जो भगवान् श्रीहरि के एकान्त भक्त या तन्निष्ठ हैं वे सात्विक-आराधक हैं तथा जो अनेक देवताओं के आराधक तथा अर्चानादिकारी हैं वे पुरुष राजस-आराधक कहलाते हैं॥२७॥ बाह्या निर्देवताश्चैव तामसाः परिकीर्तिताः । रजस्तमोऽभिभूतानां न तु मोक्षः कथञ्चन ॥२८॥ वे पुरुष जो किसी देवता की आराधना ही नहीं करते हों तो ऐसे निरीश्वरवादी तामस तथा बाह्यजन हैं। राजस तथा तामस गुणों से अभिभूत जन को (अन्यदेवतादि के आराधन करने के कारण) मोक्ष प्राप्ति नहीं होती है॥२८॥ मुनयः सत्वनिष्ठानां लक्षणानि निबोधत । विष्णोर्दास्यैकफलता तदेकोपायता स्थितिः ॥२९॥
३. तृतीय परिच्छेद: नित्य-अर्चन, भगवद्-उपासना एवं मन्त्र-विधान
९४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता हे मुनिजन! अब सात्विक गुणोंवाले श्रीनारायण के सात्विक उपासकों के स्वरूप को बतलाता हूं। इनका श्रीनारायण के दास्यभाव को प्राप्त कर मुक्ति प्राप्ति ही फल है तथा भगवान् ही इस प्राप्ति के उपायभूत आधार होकर अंग भी हो जाते हैं (अतः इस प्रकार श्रीहरि ही मोक्ष के प्रति उपाय तथा उपेय हैं) ।।२९।। तदाज्ञाकरणे प्रीतिस्तत्कर्मगुणकीर्तनम् । तच्चिह्नाङ्कितदेहत्वं तदीयाराधने रतिः ।।३०।। इन सात्विक उपासकों को अपने नित्य तथा नैमित्तिक अनुष्ठानों में भगवदाज्ञारूपी वचनों के पालनादि में प्रीति रखना है तथा उनके कर्मों तथा गुणों का कीर्तन करना, उनके चक्रादि चिन्हों से शरीर को अंकित करना तथा उनकी आराधना में ही रति रखना कार्य हो जाते हैं।।३०।। तदन्यस्पर्शवैराग्यमिन्द्रियार्थेष्वलोलता । आचार्याधीनवृत्तित्वमाचार्यार्थार्थवृत्तित्ता ।।३१।। उन्हें भगवन्नारायण के अतिरिक्त अन्य जन के स्पर्शादि तक से विराग हो जाता है तथा इन्द्रियादि के भौतिक आलम्बनों के प्रति लोलुपता नहीं रहती। इनकी कार्यादिवृत्ति भी अपने आचार्यों के प्रति अर्पित होकर उनके अधीन रहती है तथा आत्मवृत्ति भी आचार्यादि के अर्थों के प्रति ही रहनेवाली हो जाती है।।३१।। क्रोधलोभमदालस्यमानमोहविहीनता । सत्यशौचदयाधैर्यक्षमासन्तोषयुक्तता ।।३२।। और वे क्रोध, लोभ, मद, आलस्य, मान तथा मोह से रहित हो जाते हैं। तब उनमें सत्य,, शौच, दया, धैर्य, क्षमा तथा सन्तोष के भाव स्वतः ही उत्पन्न हो जाते हैं।।३२।। इत्येतैल्लक्षणैर्युक्ता वैष्णवा वीतकल्मषाः । सभाज्या दर्शनेनैव नावज्ञेयाः कदाचन ।।३३।। इस प्रकार इन लक्षणों से युक्त वैष्णव भक्त रहते हैं जो अतिशय पवित्र तथा निष्कल्मषरूप वाले हैं। ऐसे वैष्णवजन के दर्शन प्राप्त होने पर पूज्यभाव से उनकी सम्भावना करनी चाहिए तथा इनकी न तो उपेक्षा ही करना चाहिए और न तिरस्कार करना चाहिए।।३३।। १ ऐसे साधक भक्त 'श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे' मानकर ईशवचन का अनुगमन करते हैं। तथा आचार्य को भी उसी श्रीपति के रूप में रखते हुए अपनी वृत्ति में अवस्थित रहते हैं। यथा-'शरीरं प्राणवत् पश्येदन्नं प्राणविलेपनम् । प्राणाभावेन न च तावनन्दस्तन्तु प्राणवत् ।।'
हिन्दीटीकासहित ९५ अज्ञैः कुदृष्टिभिर्बाह्यैर्नास्तिकैः संशयात्मभिः । न तु भागवतः किञ्चित् प्रच्युतैश्च समाचरेत् ॥३४॥ ऐसे लोग जो शास्त्रज्ञान से रहित हैं, जो वेद को प्रमाण मान कर भी उसकी प्रतिपत्ति से विपरीत व्याख्या करते हैं, जो नास्तिक बुद्धि वाले तथा संशयात्मा पुरुष हैं तथा जो तन्त्रादि आगम के व्रतधारी हों तो ऐसे पुरुषों के साथ भागवत वैष्णव कुछ भी आचरण या संसर्ग न रखें॥३४॥ तुल्याभिजनचारित्रा बान्धवास्तुल्यदृष्टयः । आपाद्य दृष्टयोऽपि स्युर्न कदापि कुदृष्टयः ॥३५॥ और जो बाह्य तथा अन्तररूप में कुल तथा वृत्ति में समानता रखते हों, जो ज्ञानादि में भी बराबर समान हों, ऐसे बान्धवजन यदि आपत्ति में इन पूर्वोक्त आचारों से हीन (विपरीत भाववाले) भी हो जाएं तो ऐसे बान्धवजन बाद में कुदृष्टि नहीं होते (या यदि वैसे ही हो तो वे बान्धव नहीं होंगे)॥३५॥ विवाह-यज्ञाध्ययन-स्पर्श-संवास-भोजनम् । एकान्तिनान्तु कर्त्तव्यं तादृशैः सह बान्धवैः॥३६॥ विवाह, यज्ञादि अनुष्ठान, अध्ययनकाल, स्पर्श, साथ में निवास करना तथा भोजनादि कर्मों में उपयुक्त व्यवहार वाले अपने सम्बन्धी या कुल के व्यक्तियों के साथ भी भागवत अथवा एकान्तीजन को भी सम्बन्ध रखना चाहिए या काम बनाये रखना चाहिए॥३६॥ सतामनवकाशत्वात् कालांशेषु न लौकिकम् । तस्मादलौकिकैरेव सकलं कर्म कारयेत् ॥३७॥ अपने इष्टदेव के पांच निर्धारित समयों में आराधना से ही रहने के कारण इनके काल भागों में लोकयात्रा या सम्बन्धीजन से सम्पर्क या व्यवहार का समय ही नहीं होगा। अतएव इस समय लोकयात्रा से विमुख अतिरिक्त समय के अंशों में ही इनसे कार्य रखे या इनका कार्य करवाए॥३७॥ समित्पुष्पहविस्तोयपात्रोपनयनादिषु । अवैष्णवान् विशेषेण न कर्मसु नियोजयेत् ॥३८॥ जैसे यज्ञीय अपेक्षा से समिधाओं, पुष्पपल्लवादि, जल-पात्रों का लाना जैसे कार्यों में विशेषरूप से जो अवैष्णवजन हों तो उनकी नियुक्ति नहीं की जाती है॥३८॥ नोपभोक्तव्यमन्नाद्यमवैष्णवनिवेदितम् । नावैष्णवाय दातव्यं स्वयं विष्णोर्निवेदितम् ॥३९॥ किसी अवैष्णवजन से अर्पित या निवेदित स्वादु अन्नादि का उपभोग या अशनादि
९६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता नहीं करना चाहिए तथा स्वयं भी श्रीहरि को समर्पित प्रसादादि अन्न को किसी अवैष्णवजन को प्रदान नहीं करना चाहिए॥३९॥ ये त्ववैष्णवभर्त्तव्या ये चावैष्णवभर्तृकाः । एकान्त्यस्योपघातेन न तैः कर्माप्यनापदि ॥४०॥ आपत्ति की स्थिति को छोड़कर यदि जिनका पालन किया जा रहा हो ऐसे पुत्र, स्त्री आदि के वैष्णव न रहने या जो पालन करनेवाले पिता माता आदि भी वैष्णव न हों तो अनैकान्ती भाव के उपघात हो जाने से इनसे भी कार्य तथा सम्बन्ध को दूर रखे और आपत्काल में इसे पालनयोग्य न समझे॥४०॥ त्यक्ताचारस्त्यक्तदृष्टिस्त्यक्तार्थस्त्यक्तलक्षणः । त्यक्ताचार्यस्त्यक्तमन्त्रः प्रत्येकं प्रच्युतो नरः ॥४१॥ अब प्रच्युत का स्वरूप बतलाते हैं कि जो वैष्णवानुमत वृत्ति के आचारों को पालन न करता हो, जिसने दृष्टि (नामक अवयव) का ध्यान न रखा हो, जो वैष्णवार्थ में भक्ति आदि का सम्यक् ज्ञान न रखता हो तथा जो ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि धारण के भगवत् चिन्हों का परित्याग करता हो तो उसे 'प्रच्युत' समझना चाहिए, जो कि अपने मन्त्रादिकों के प्रदाता गुरु तथा उनके दिये गए मन्त्रों का भी परित्याग कर देता हो॥४१॥ पातकेन कुदृष्ट्यान्त्यभजनेनान्यलक्षणैः । अवैष्णवोपसत्यान्यमन्त्रेणाऽपि च्यवन्ति वै ॥४२॥ विहित आचार के विरुद्ध आचरण के पातक से, दृष्टि विरुद्ध अन्य देवता के भजन तथा भक्ति करने से, अन्य लक्ष्म के धारण करने से तथा अवैष्णवजन की संगति के कारण सत्सेवा न करने से और अन्य देवता के मन्त्र को लेने के कारणों में प्रत्येक की स्थिति में वह पतित या 'प्रच्युत' हो जाता है॥४२॥ यो दिव्यशास्त्रमन्त्रेषु कुरुते त्ववधीरणाम् । तथान्यशास्त्रमन्त्रेषु प्रसक्तिं न स वैष्णवः ॥४३॥ जो पञ्चरात्रागमादि प्रोक्त दिव्यशास्त्रीय मन्त्र तथा इन शास्त्रों के मन्त्रों की अवधीरणा करे तथा अन्य शास्त्रों के प्रति श्रद्धा या आसक्ति रखने लगे तो वह 'वैष्णव' नहीं माना जाता है॥४३॥ सर्वैश्च लक्षणैर्युक्तो नियतश्च स्वकर्मसु । यस्तु भागवतान् द्वेष्टि सुदूरं प्रच्युतो हि सः ॥४४॥ और जो पूर्व में दिखलाये गये सभी लक्षणों से युक्त हो, अपने कर्म तथा आचार में जो निष्ठा रखता हो किन्तु जो भागवतजन से द्वेष करनेवाला या उनका तिरस्कार
हिन्दीटीकासहित ९७ करनेवाला हो तो उसे भी 'प्रच्युत' ही समझना चाहिए॥४४॥ अपि चेत् सेवनपरो न चेत्तापादिसंस्कृतः । अनर्चार्हतया विष्णोर्दास्यात् प्रच्यवते ध्रुवम् ॥४५॥ और यदि भागवतजन की सेवा में रत होकर भी जो तापादि चक्रांकित रूप से संस्कार प्राप्त न किया हुआ हो तो उसे श्रीनारायण की अर्चना करने का अधिकार न मिलने से वह भी निश्चितरूप से श्रीविष्णु के दास्यभाव से पतित हो जाता है (श्रीविष्णु की भक्ति का अधिकारी भी नहीं रह पाता है)॥४५॥ यस्तु प्राप्य गुरोर्विद्यां नार्चयेत् पुरुषोत्तमम् । प्रणमेदन्यदेवाय न स भागवतः स्मृतः ॥४६॥ जो उत्तम आचार्य से विद्या की शिक्षा तथा मन्त्रादि की दीक्षा प्राप्त करने पर भी श्री पुरुषोत्तम की अर्चना (नित्य) नहीं करे और अन्य देवताओं की प्रणामादि अर्चना करता हो तो वह भी भांगवतजन या वैष्णव नहीं है॥४६॥ ये नात्मानमनात्मानं विद्याविद्ये फलाफले । उपास्यमनुपास्यञ्च वेत्ति भागवतो न सः ॥४७॥ जो आत्मा तथा अनात्मा का, विद्या और अविद्या का, फल और फल विरोधी अफल का तथा इष्ट एवं उपास्य देव तथा अनुपास्य देवता का भेद न समझता हो तो उसे भी भागवतजन या वैष्णव नहीं समझना चाहिए॥४७॥ देवतानाञ्च याथात्म्यं कैङ्कर्यस्य हरेरपि । अविदित्वाऽऽचरन् कर्म विहीनां गतिमश्नुते ॥४८॥ जो अग्नि तथा इन्द्र आदि देवगण का भगवद् देह भाव तथा श्रीहरि के किंङ्करभाव को न जानकर कर्म, वर्ण तथा आश्रम में अपने नियतकर्मों का आचरण करते हुए न रहे तो वह भी प्रच्युत है तथा उसे भी सद्गति प्राप्त नहीं होती है॥४८॥ देवर्षिभूतात्मतया त्यजन् केवलमेव वा । विष्णुं तत्तत्फलाकाङ्क्षी पारमैकान्त्यतश्च्यवेत् ॥४९॥ और जो देव तथा ऋषियों के यजनादि कर्मों को नियत विधि से सम्पन्न करते हुए तथा उनमें केवल विष्णु का अर्चन कर उससे कार्य के फल की इच्छा रखे तो वह भी परमैकान्त्य-भाव से च्युत (होता) है॥४९॥ तेषां न परिशुद्धानि योनिविद्याञ्च कर्म वा । ये विष्णुचरणैकान्त्यविहीना ब्राह्मणादयः ॥५०॥ जिनको श्रीविष्णु के चरणों से एकान्त्य प्राप्त नहीं है वे ब्राह्मणादि वर्ण की योनि (वर्ण या जाति में) उत्पत्ति विद्या तथा कर्मों को परिशुद्ध नहीं माना जाता
९८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता है॥५०॥ मरणं जन्मने यस्य मरणायैव केवलम् । तेषां भगवदैकान्त्यविमुखा ये नराधमाः ॥५१॥ और जो भगवच्चरणों से विमुख एकान्त्य रहित ब्राह्मणादि वर्ण है उनका जन्म केवल मरण के लिये होता है तथा मरण भी केवल मरण के लिये होता है तथा मरण भी केवल पुनर्जन्म के लिये होता है और बाद में ये भी मनुष्यों में हीन स्थिति के ही रखनेवाले बन जाते हैं (तथा ये मोक्ष से वंचित हो जाते हैं)॥५१॥ न विद्या केवलार्थाय नाचारो नार्चनं हरेः । न चक्राद्यङ्कदेहत्वं विना भागवतार्चनम् ॥५२॥ श्रीहरि के अर्चन का कार्य न करने पर उनकी प्राप्त की गयी विद्या भी व्यर्थ है, उनकी आचारनिष्ठता तथा चक्रादि का शरीर पर धारण करना भी बिना श्रीहरि के अर्चन के साथ भागवतजन की सत्सेवारूप अर्चन भी निरर्थक होता है॥५२॥ न प्रपत्तेः परा विद्या न विष्णोर्देवतं परम् । न तद्दास्यात् परा सिद्धिर्न गुरुर्वैष्णवात् परः ॥५३॥ क्योंकि श्रीहरि की प्रपत्ति के 'न्यास-योग' से श्रेष्ठ कोई विद्या नहीं है तथा श्रीविष्णु से उत्तम कोई अन्य देवता नहीं। उनकी दास्यता प्राप्ति से उत्तम कोई सिद्धि नहीं होती तथा वैष्णवजन से उत्तम दूसरा कोई आचार्य या गुरु भी नहीं होता॥५३॥ नित्यमच्युतभक्तानां कुर्यात् पादावनेजनम् । नम्रः समुपभुञ्जीत सर्वपातकनाशनम् ॥५४॥ अतएव जो श्रीविष्णु के परमभक्तजन वैष्णव हों तो उनके नित्य पाद प्रक्षालन करना चाहिए तथा ऐसे चरणतीर्थ जल का विनम्रभाव से सेवन करना सभी पातकों का विनाश करनेवाला होता है॥५४॥ वैष्णवस्याङ्कशय्यायां वैष्णवस्य गृहेऽपि वा । देशे वा तद्विचरिते संस्थिता यान्ति सद्गतिम् ॥५५॥ यदि किसी वैष्णव की गोद में अन्तिम समय मस्तक रखकर या किसी वैष्णव के गृह में अथवा श्रीवैष्णव के द्वारा संचालित भूमि या स्थान पर स्थित रहकर यदि प्राण निकले तो उसकी सद्गति हो जाती है॥५५॥ यत्र क्वाप्यथवा देशे वैष्णवो म्रियते यदा । तदा तत्राशु सान्निध्यं करोति वृषभध्वजः ॥५६॥ और वैष्णव भक्त जहाँ कहीं भी स्थित रहकर अपना प्राण छोड़ता है तो उन सभी
हिन्दीटीकासहित ९९ स्थानों पर श्रीगरुड़ध्वज विष्णु उसके समीप आकर उसको करुणावश विष्णुलोक में ले जाते हैं॥५६॥ न जन्मनो नाध्ययनान् न यज्ञान्न तपःश्रमात् । न त्यागादश्नुते ब्रह्म गुरूपसदनं विना ॥५७॥ उपदेष्टा आचार्य की सेवा का आश्रय ही मुख्य है। अतः इसके बिना यदि ब्राह्मणादि उत्तमवर्ण में जन्म हो जाने से या वेदादि शास्त्रों के अध्ययन सम्पन्न हो जाने से, यज्ञादि अनुष्ठानों के कराने से तथा विरक्तिभाव से इन्द्रियादि के विषयों का त्याग करने से भी ब्रह्म की प्राप्ति (मोक्ष की प्राप्ति) नहीं हो सकती॥५७॥ देहकृन्मन्त्रविन्न स्यान्मन्त्री संस्कारकृत् परः । तौ च नात्मविदौ स्यातामन्यस्त्वात्मविदात्कृत् ॥५८॥ यदि जन्म प्रदान करनेवाला पिता ही मन्त्र का प्रदाता भी हो जाए ऐसी कभी स्थिति नहीं हो पाती है क्योंकि जो मन्त्रवेत्ता विद्वान है वही उपनयन आदि संस्कार का सम्पादन करनेवाला आचार्य नहीं हो पाता है और पिता तथा सँस्कार और मन्त्र का संपादन करनेवाला आचार्यरूप में रहकर भी ये ब्रह्म या आत्मतत्व के विद्वान् नहीं हो पाते। अतः यदि ब्रह्मवेत्ता पिता ही मन्त्रवेत्ता हो तो वहीं संस्कार का सम्पादन करनेवाला आचार्य भी होना उचित है॥५८॥ न चक्राद्यङ्कनं नेज्या न ज्ञानं न विरागता । न मन्त्रः पारमैकान्त्यं तैर्युक्ता गुरुवश्यता ॥५९॥ केवल चक्रादि का शरीर पर अंकन मात्र और न ही इष्ट के प्रति उपपादित यज्ञादि, न केवल दृष्टि या ज्ञान तथा न ही वैराग्य भाव, न दीक्षा में प्राप्त मन्त्र ही 'पारमैकान्त्यम्' होता है। किन्तु इन सभी के साथ अपने मन्त्रादि उपदेष्टा आचार्य (गुरु) के अधीन रहकर भगवदाराधना कर्म ही 'पारमैकान्त्य' होता है॥५९॥ विद्या विभूषणं पुंसस्तस्या वृत्तं विभूषणम् । विष्णुभक्तिर्विभूषाऽस्य सा चक्राद्यङ्कभूषणा ॥६०॥ पुरुष की विद्या के अर्जन से प्राप्त दृष्टि अलंकार या भूषण होती है और विद्या से विहित वृत्त या आचार विभूषण होता है। इस वृत्त का विभूषण श्रीनारायण की भक्ति है तथा इसका विभूषण शरीर पर श्रीविष्णु के चक्रादि का अंकन (कार्य) होता है॥६०॥ ध्यानेन मन्त्रयोगेन पूजनेनाङ्कनेन च । तोषयन्ति जगन्नाथं वासुदेवं युगक्रमात् ॥६१॥
१०० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता आराधकजन अपने इष्ट श्रीहरि को अपने ध्यानयोग के द्वारा मन्त्र के जपस्म अनुष्ठान के द्वारा क्रमशः युगों में तुष्ट करते हैं। (इनमें कृतयुग में ध्यान, त्रेतायुग मन्त्र योग, द्वापर में पूजन तथा कलियुग में चक्राद्यंकन कार्य नारायण की प्रसन्नता अतिशय आपादक है। यह तत्व दिखलाया गया) ॥६१॥ अष्टमात् षोडशाद्वाद्वा धार्यं चक्रादिभूषणम् । प्रतप्तैरङ्कनं पश्चात् सदा वा भूषणं स्त्रियः ॥६२॥ आठ वर्ष की आयु से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक का काल विहित रहने से इसने चक्रादि पञ्च आयुध के भूषण का धारण किया जा सकता है। (जो ब्राह्मण के उपनयनकाल का आरम्भ तथा गौण उपनयन का अन्तिम अवधि का काल है) इन मुहूर्त में प्रतप्त चक्रादि से अंकन किया जावे, अथवा स्त्रीजन के लिये भी इनका सद धारण या भूषणरूप में इनका धारण भी अभीष्ट (होता) है॥६२॥ शिष्यपुत्रकलत्राणां भृत्यानाञ्च गवामपि । कुर्यादचेतनानाञ्च वैष्णवं नाम लक्ष्म च ॥६३॥ इसके अतिरिक्त अपने शिष्य, पुत्र, भार्या तथा अपने सेवकजन का तथा अपने द्वारा संगृहीत पशु में गौ आदि का तथा अचेतनभूत स्वगृह तथा अन्य पदार्थों का नाम भी श्रीविष्णु से सम्बन्ध रखना चाहिए तथा इनमें चेतन जीवों के शरीर पर चक्रादि क अंकन भी करवाना चाहिए॥६३॥ आमा ह्यतप्ततनवस्तप्ताङ्गाः हरिलाञ्छनैः । सुभृता भोग्यतां प्राप्य भुज्यन्ते परमात्मना ॥६४॥ जो शरीर तप्तचक्र से अंकित नहीं किये गये वे अपक्व या पापों को दग्ध न करनेवाले होते हैं तथा श्रीहरि के चिन्ह चक्रादि से तप्ताङ्ग होने पर उनके सभी पातक दग्ध हो जाने से परमात्मा श्रीहरि के द्वारा भोगयोग्य होकर उनके द्वारा उपभोग के योग्य बन जाते हैं॥६४॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रान्तरालस्थाँश्चक्रादीन् धारयेत् सदा । बहिष्कृता ह्यतिक्रुद्धाः पदात् प्रच्यावयन्ति ते ॥६५॥ इसलिये शरीर पर उचित प्रदेशों पर चक्रादि चिन्ह तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र को सदा धारण करना चाहिए (चक्रादि चिन्ह से अंकित या ऊर्ध्वपुण्ड्रादि पूर्व निर्दिष्ट स्थानों प धारण करते हैं)। यदि इन चक्रादि तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रादि का धारण कर इन्हें उपेक्षित करेंगे तो वे उन्हें अपने स्थान से गिरा देंगे॥६५॥ प्रातर्माध्यन्दिने सायमूर्द्धपुण्ड्रेण केशव । अकृतैर्वापि सुकृतैस्तैस्तैः प्रीणाति कर्मभिः ॥६६॥
हिन्दीटीकासहित १०१ यदि प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सायंकाल त्रिसन्ध्य वेला में ऊर्ध्वपुण्ड्र ही शरीर पर धारण किया जाए (और अन्य नित्यादि कर्मों के अनुष्ठान में कमी भी आ जाए) तो भी श्रीनारायण की प्रीति रहने से ऐसे प्रत्यवाय की शान्ति शीघ्र हो जाती है।।६६।। प्रभाते दिव्यलोकस्थं मध्याह्ने चार्कमध्यगम् । तोषयन्त्यूर्ध्वपुण्ड्रेण सायं स्वात्मगतं हरिम् ॥६७॥ यदि प्रभातकालमें ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे तो दिव्यलोक स्थित श्रीनारायण की मध्याह्नकाल में आदित्य में स्थित नारायण की तथा सायंकाल आत्मस्थ नारायण की प्रसन्नता प्राप्त होती है।।६७।। सन्तः सतोऽनुगृह्णन्ति दर्शनादेव लक्ष्मभिः । त्यजन्त्यन्ये तदुभयं मुख्यमैकान्त्यकारणम् ॥६८॥ वैष्णव सन्त चक्रादि चिन्हों को देखने मात्र से उन्हें आत्मीय समझ कर उन पर अनुग्रह करते हैं तथा जो असन्त या अवैष्णवजन हैं वे इन वैष्णव चिन्हों को देखते ही उनसे दूर हट जाते हैं। ये दोनों ही एकान्त्य भाव में कारणभूत होते हैं अतः लक्ष्म (चिन्ह) तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रादि का धारण आवश्यक है।।६८।। क्रमाप्तभगवन्मन्त्रः कल्पविच्छुद्धमानसः । धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्चक्रादिलाञ्छितो हरिमर्चयेत् ॥६९॥ सम्प्रदाय (के क्रम) के अनुसार दीक्षित होकर भगवन्मन्त्र को प्राप्त कर मन्त्र तथा भगवतस्समाराधन के विधान को जानकर ऊर्ध्वपुण्ड्र को धारण कर चक्रादि लक्ष्म से युक्त रहकर वैष्णव श्रीनारायण की अर्चना करे।।६९।। यथापूर्वाकृतिन्नित्यान् मुक्ताँश्चैव यथागमम् । यथावतारदेहञ्च पूजयेद्धरिमिच्छया ॥७०॥ श्रीहरि का अर्चन पञ्चरात्र आगम के अनुगत यथावत् आकृति में युक्त तथा नित्यरूपवाले अवतार के अनुरूप देहादि विग्रह वाले श्री हरि की ध्यानादि के पश्चात् अपनी इच्छा के अनुरूप विधिवत् अर्चना करे।।७०।। अवैष्णवाद्द्वैष्णवाद्वा चेतनं वाप्यचेतनम् । यदवाप्तं समस्तं तद्विष्णवे विनिवेदयेत् ॥७१॥ वैष्णव अथवा अवैष्णव से प्राप्त होनेवाली चेतना चेतनात्मक भाव की जो भी सामग्री प्राप्त हो उस सभी को श्रीनारायण को अर्पित कर उन्हें निवेदित करे।।७१।। वासः स्रग्गन्धभूषादि भक्ष्यभोज्यादिकं तथा । न किञ्चिदुपभोक्तव्यमनिवेद्य श्रियः पतेः ॥७२॥
१०२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यह सामग्री वस्त्र, पुष्पादि की मालाएं, गन्ध, धूप, भूषणादि तथा भक्ष्य भोज्यादिरूप में होती है अतः प्राप्त ऐसी सभी सामग्री को श्रीनारायण को बिन निवेदित या अर्पित किये उनका उपभोग या ग्रहण नहीं करन चाहिए।।७२।। वेदवेदाङ्गतत्वज्ञो वेदान्तपरिनिष्ठितः । मीमांसान्याय-निपुणो धर्मशास्त्रविशारदः ॥७३॥ इतिहासपुराणज्ञः पञ्चरात्रार्थतत्ववित् । परं भगवदैकान्त्यं ज्ञात्वा धर्मं समाचरेत् ॥७४॥ अतएव वेद तथा वेदाङ्गों के तत्वों का पूर्ण ज्ञान करनेवाला, वेदान्तादि शास्त्रों में पारंगत, मीमांसा तथा न्याय शास्त्रों में निपुण विद्वान्, धर्मशास्त्रादि का पूर्णज्ञाता, इतिहास तथा पुराणों का अनुशीलन किया हुआ तथा पांचरात्र आदि वैष्णवागमों के तत्वों का विशेषज्ञान रखनेवाला विद्वान् नारायण की अनन्यता को समझ कर स्वधर्म का पालन करे।।७३-७४।। सर्वसंस्कारसंस्कारो ज्ञानं भागवतं परम् । तत्संस्कृता हि संस्काराः कल्पन्ते मुक्तिहेतवः ॥७५॥ भगवद्विषयक ज्ञान परमोत्तम है क्योंकि वही सभी वर्णाश्रमनियत संस्कारों का अतिशय आपादक संस्कार होता है तथा अतिशय संस्कृत रूप के कारण (यह ज्ञान संस्कृत संस्कार) मुक्ति में कारणभूत हो जाते हैं। (इसलिए भगवद्विषयक ज्ञान ही सर्व संस्कारभूत है)।।७५।। परमात्मा हरिः स्वामी स्वतोऽहं तस्य किङ्करः । कैङ्कर्यमखिला वृत्तिरित्येष ज्ञानसङ्ग्रहः ॥७६॥ भागवत ज्ञान को यदि संग्रह रूप में देखें तो यह है कि समस्त आत्माओं के अन्तरात्मास्वरूप परमात्मा हरि ही स्वामी हैं तथा अहंवृत्तिवेद्य प्रत्यगात्मरूप में स्वयं इन हरि का दासभूत किंकर मैं हूं तथा मेरे सभी वृत्तिभूत व्यापार कैंकर्यभूत हैं यही इसका संग्राहक संग्रह है।।७६।। नित्यमर्चाजपध्यानस्नानदानव्रतादिकम् । विशुद्धमेव कर्तव्यमनन्यैर्न विमिश्रितम् ॥७७॥ (वृत्ति के विहिताचारों में) नित्य ही इष्टदेव श्रीहरि की अर्चना करना, निष्ठा मन्त्र का नित्यजप, उनका ही स्मरणरूप ध्यान धरना, नित्य स्नान, दान तथा एकादश आदि साम्प्रदायिक व्रत उपवास आदि रखना, ये सभी अर्चादि तत्व तथ एकान्तीभाव से विशुद्धरूप में करना चाहिए। अर्थात् अन्य देवगण की अर्चनादि
हिन्दीटीकासहित १०३ साथ इन्हें मिलाकर नहीं करना चाहिए॥७७॥ सद् ब्रह्म वासुदेवाद्यैर्विविक्तैर्यत्र नामभिः । प्रोच्यते भगवान् विष्णुस्तद्विशुद्धमुदाहृतम् ॥७८॥ जिस कर्म में केवल श्रीहरि के वाचक सद्ब्रह्म वासुदेवादि नामों से भगवान् श्रीहरि अभिहित होते हैं, वही कर्म विशुद्ध तथा जहाँ साक्षात् भगवद्देवता विषयक केवल कर्म हो वह भी विशुद्ध है॥७८॥ यत्राविविक्तैः शब्दैस्तु प्रोच्यते पुरुषोत्तमः । देवादीनामशुद्धानां व्यामिश्रं तत् प्रचक्षते ॥७९॥ तथा जहाँ सद्ब्रह्मादि से भिन्न देवादि शब्दों से परमेश्वर को अभिहित किया जाता है तो ऐसा अर्चनादि कर्म 'मिश्र' (व्यामिश्र) होता है॥७९॥ दुर्निमित्तमये पापे ग्रहादीनां विपर्यये । विष्णुतद्भक्तपूजाभिः शान्तिं कुर्वीत् नान्यथा ॥८०॥ दुर्निमित्तादि से युक्त भयोत्पादक किसी पातक के कारण या सूर्य, शनि आदि के जन्मादि से द्वादशादि स्थान में आने से अनिष्टकारक योग रहने के कारण या आ जाने पर उन्हें श्री विष्णु तथा उनके परिवारभूत देवादि की पूजनादि अनुष्ठानों (विष्णुपूजा के पारम्परिक परमादि रूपों से तथा उपशान्तिरूप परिवारभूत अनुष्ठानों) के द्वारा इसकी शान्ति की जाए। अन्यथारूप में केवल ग्रहयज्ञादि के द्वारा इस शान्ति को नहीं करें॥८०॥ प्राज्यैः प्रियतमैर्भोगैर्विशेषेण जनार्दनम् । आराधयेन्निमित्तेषु वैष्णवाँश्च विशेषतः ॥८१॥ वैष्णवोत्सवादि निमित्तों के अवसर पर श्रेष्ठ तथा प्रियभाव के रूप में स्वेष्ट गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, सूप तथा अपूपादि पदार्थों से विशेषतः परमेश नारायण की आराधना की जाए तथा विशेष रूप में वैष्णवजन की भी प्रसन्नतापादक आराधना प्रसादादि के प्रदानरूप में रखी जाए॥८१॥ कुर्वन्ति वैष्णवार्थाय स्वधर्माणाञ्च सिद्धये । शान्तिकर्म हरेः केचित् प्रपत्तिं केवलं हरेः ॥८२॥ ग्रहादि शान्ति के हेतु कुछ वैष्णव लोग श्रीविष्णु के उद्देश से तथा अपने साम्प्रदायिक धर्मों की सिद्धि के लिये श्रीहरि की पूजनादि के अनुष्ठान से शान्तिकर्म करते हैं तथा अन्य केवल (दुर्निमित्त तथा ग्रहादि के भय के प्राप्त होने पर) श्रीहरि की प्रपत्ति या शरण का ही कार्य करते हैं (जो शान्ति आदि कर्मों में असमर्थ या अधिकारी नहीं होते हैं)॥८२॥
१०४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यास्तत्र तत्र श्रूयन्ते पुंसां काम्यतया श्रुतौ । ताः किलैकान्तिना दिव्या भगवद्भोगसम्पदः ॥८३॥ वेदादि में जो जो क्रियाएं पुरुषों के लिये काम्यरूप में बतलाई गयी है एकान्ती वैष्णव विद्या से विशुद्ध ऐसी दिव्य क्रियाओं को श्रीनारायण की अभिमत या प्रियरूप में भगवदाराधनरूप किंकरभाव से सम्पन्न होकर सम्पादन करे॥८३॥ आरम्भे कर्मणां सिद्धयै विघ्नानां प्रशमाय च । कुर्यात् सपरिवारस्य विष्वक्सेनस्य पूजनम् ॥८४॥ इन क्रियाओं के आरम्भ में कर्म की सिद्धि के लिये तथा विघ्नों की शान्ति के लिए विष्वक्-सेन श्रीविष्णु का परिवार सहित पारम्परिक अर्चन करना चाहिए॥८४॥ स्वल्पापि हन्ति भूयांसं स्वधर्मं निन्दिता क्रिया । दृष्टिं कुदृष्टिर्भक्तिन्तु देवतान्तरसम्भवः ॥८५॥ थोड़ी भी इष्टादि की निन्दा से युक्त किया बड़े से बड़े धार्मिक अर्चनादि के अनुष्ठानों का विघात कर देती है तथा अश्रद्धा या कुदृष्टि अपने इष्ट की गौण दृष्टि का तथा ऐसी भक्ति अन्य देवता को उपासना का आश्रय ग्रहण करती है॥८५॥ सत्सेवनमसत्सेवा लक्षणं चान्यलक्ष्माता । तस्माद् विरुद्धान्येकान्ती विशेषेण विवर्जयेत् ॥८६॥ और जैसे असत् सेवा सत्सेवा का विघात करती है इसी तरह अन्य देवताओं के चिन्हभूत (तिलकादि का) धारणरूप लक्ष्म से अपना लक्ष्य विनष्ट हो जाता है अतः विरुद्ध कार्यभूत ऐसे लक्ष्मादि का धारण अनन्य या एकान्ती वैष्णव को नहीं रखना चाहिए॥८६॥ एकस्यापि हि धर्मस्य विनाशे च विरोधिभिः । अनन्वयापचारेण नश्यत्येकान्तिवृत्तिता ॥८७॥ एक भी विहिताचारावि संपन्न धर्म की विरोधी भूत निन्दित क्रियाओं के अनुष्ठान से नष्ट हो जाने पर धर्म के न करने पर दोष से एकांती वृत्ति का विनाश हो जात है॥८७॥ परमैकान्तिनां धर्मः कृते पूर्णः प्रवर्तते । क्षीयमाणः क्रमेणायं कलौ स्यास्यन्ति वा न वा ॥८८॥ परमैकान्तितारूप धर्म कृतयुग में पूर्णरूप में स्थित रहेगा तथा युगादि क्रम में क्रमशः