भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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८८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अथ भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे अथ प्रथमोऽध्यायः भूय एवर्षिभिः पृष्टो भारद्वाजस्तपोनिधिः । अनुक्तानब्रवीद्धर्मान् उक्तांश्चैव प्रसादयन् ॥१॥ न्यासोपदेश को सुनकर ऋषिगणों के द्वारा भरद्वाजमुनि से इन्हीं विषयों पर पूछे गये प्रश्नों को सुनकर पूर्व में कथित न्यासोपदेश को और अधिक स्पष्ट करने के साथ इसी क्रम में अनुक्त तत्वों को भी दिखलाते हुए भरद्वाज मुनि पुनः उनसे कहने लगे।।१।। धर्मो वर्णाश्रमादीनां कार्त्स्न्येन मुनिसत्तमाः । शिष्टो व्याससमासाभ्यामार्षे-र्दिव्यैस्तथागमैः ॥२॥ हे मुनिजन! वर्ण तथा आश्रम आदि के धर्मों को ऋषि प्रोक्त वेदादि, धर्मशास्त्र तथा दिव्यआगमों के द्वारा (पञ्चरात्र संहिता आदि से विस्तार तथा संक्षेप में दिखलाया या उपदिष्ट किया गया है) तथा कहीं विस्तार तथा संक्षेप को मिलाकर अनतिसंकोच तथा विस्तार से भी बतलाया है।।२।। अत्र केचित् परं तत्वं रजोमीलितदृष्टयः । अपश्यन्तोऽभिजानन्ति धर्मस्य न परां गतिम् ॥३॥ परन्तु कुछ रजोगुण से युक्त दृष्टि वाले बनकर आर्षदिव्यादि शास्त्रों को न देखते हुए धर्म की परमगति को नहीं समझ पाते हैं, अतएव वे उपयुक्त न्यायादि से परिशीलित फलभूत निर्णय से वंचित से हैं।।३।। केचित्तु सत्वसम्पन्नाः केशवेनावलोकिताः । सारासारविदः प्राज्ञाः परं धर्मं विजानते ॥४॥ और कुछ जो सत्व सम्पन्न हैं तथा इसी कारण श्रीविष्णु से जन्म के समय से ही सम्बद्ध हैं तथा उनके विलोकन के सौभाग्य से युक्त हो चुके हैं वे अपने सत्वगुण की सम्पत्तिगत विशेषता के कारण सारासार के अभिज्ञ होकर तीक्ष्णबुद्धि के द्वारा परमधर्म मोक्ष को जाननेवाले हो जाते हैं।।४।।