नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अन्यचिह्नाङ्कितान् मर्त्यान् दूरतः परिवर्जयेत् । पयोऽस्थिचर्ममांसादि पशूनाञ्चातिगर्हितम् ॥३९॥ जो मनुष्य या प्राणी श्रीनारायण के शंखचक्रादि चिह्नों से अंकित नहीं हो तो उसका परित्याग करना चाहिए तथा ऐसे पशुओं का दूध अस्थि, चर्म तथा मांसादि की भी (जो अतिशय अपवित्र हैं उन्हें भी) दूर से ही परित्याग करे॥३९॥ वृक्षादीनाञ्च सर्वेषामकर्मण्यं फलादिकम् । अन्यचिह्नाङ्कितञ्चैव गृहक्षेत्रादिकं त्यजेत् ॥४०॥ ऐसे वृक्षादि जो अन्य चिह्नों से अंकित वृक्ष तथा लता आदि हों तो उनके फल तथा पत्रादि को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा इसी प्रकार अन्य चिह्नांकित गृह तथा क्षेत्रादि के रहने पर उनका भी परित्याग करना योग्य है॥४०॥ वर्तुलं तिर्यगच्छिद्रं ह्रस्वं दीर्घन्ततं तनुम् । वक्रं स्वरूपं बद्धाग्रं छिन्नमूलं पदच्युतम् ॥४१॥ अशुभं रूक्षमासक्तं तथानङ्गुलिकल्पितम् । विगन्धमपसंख्यञ्च पुण्ड्रमाहुरनर्थकम् ॥४२॥ त्रिपुण्ड्र- स्वरूपादि विचार- इसी प्रकार जो पुण्ड्र (तिलक) केवल मालाकार हो, तिरछे आकार में हो, छिद्र हीन हो, छोटे आकार का हो या बहुत बड़े आकार का हो, अपने विस्तार से न्यून या अधिक परिमाण वाला हो, अपने टेढ़े आकार में हो, असुन्दर या सीधे आकार में न हो, दोनों भौहों के मूलभाग में न मिलता हो, अपने निर्धारित स्थान से हट गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान से हट गया हो, जो श्वेतवर्ण के हल्केपन से युक्त होकर शुभकारी न हो, जिसके हृदय स्थान पर धारण करने का स्थान फोड़े आदि के कारण सूखा सा रहता हो, अन्य पुण्ड्र से लगा हुआ हो, जो स्वयं की (हस्त की) अंगुलियों के द्वारा किया हुआ न हो, जो किसी गन्ध से रहित हो, निर्धारित संख्या के अनुरूप धारण किया हुआ न हो तो ऐसा 'पण्ड्र' धारण करने पर भी अनर्थकारी या व्यर्थ समझना चाहिए॥४१-४२॥ न चन्दनादिभिर्गन्धैः कर्तव्यं न च भस्मना । न मृद्भिश्वाप्रशस्ताभिरूर्ध्वपुण्ड्रं कदाचन ॥४३॥ इसे चन्दन अगर आदि गन्धों से युक्त वस्तुओं से तथा भस्म आदि के द्वारा नहीं किया जाता है तथा इसी प्रकार साधारण मिट्टी जो कि प्रशस्त न हो तो उससे भी ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण न करने (क्षेत्र या पर्वतादि की प्रशस्त मृत्तिका से ही ऊर्ध्वपुण्ड्र