नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ७५ स्पर्श करना या उनके देवताओं को अर्पित किये जानेवाले भोग्य पदार्थों (अन्नादि पक्व या अपक्व पदार्थों) को समर्पित करना भी उचित नहीं है॥३४॥ प्रणामं स्पर्शनं सेवां स्मरणं कीर्तनं तथा । निन्दाञ्च तद्भक्तिपराण्यप्येतानि विवर्जयेत् ॥३५॥ इसी प्रकार उन सभी अन्य देवताओं को प्रणाम करने, उनका श्रद्धा से स्पर्श करने, उनके मन्दिरों में सम्मार्जन या सफाई के लिये उनके स्थानों को लीपने पोतने की सेवा करने, उनके स्वरूप का स्मरण या स्तुति आदि करने या अन्य देवगण को भक्ति के साथ मन से प्रणाम करने जैसी क्रियाएं भी उचित नहीं है॥३५॥ इति भक्तिविरुद्धाधिकारः अथ लक्ष्म विरुद्धाधिकार शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्राद्यैश्चिह्नैः प्रियतमैर्हरेः । रहितः सर्वधर्मेभ्यः प्रच्युतो नैनमाप्नुयात् ॥३६॥ जो श्रीनारायण के अतिशय प्रिय शङ्ख, चक्र तथा उर्ध्वपुण्ड्र आदि लक्ष्म कहे गये हैं उनसे यदि कोई दीक्षित भक्त रहित है तो वह सभी धर्मों के अधिकारों से पतित होकर अन्त में श्रीनारायण को प्राप्त करने के योग्य नहीं रह जाता है॥३६॥ चक्राम्बुजगदाशार्ङ्ग- खड्गेभ्योऽन्यैर्हरेरपि । न लक्षणैर्दहेच्चाङ्गानान्यदग्धोऽर्हति क्रियाम् ॥३७॥ श्रीनारायण के लक्ष्मभूत जो शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग और खड्ग है, इन पांचो के अतिरिक्त उनके अन्य किसी लक्ष्म से दग्ध पुरुष उनकी अर्चानादि क्रिया के योग्य किङ्करभाव भी प्राप्त करने के योग्य नहीं है॥३७॥ धारयेन्नान्यचिह्नानि विशेषेणाङ्कनं क्वचित् । धारणादन्यचिह्नानां महदाप्नोति किल्विषम् ॥३८॥ अन्य देवगण के चिन्हों का तथा विशेषकर शरीर पर तप्त मुद्रा के दाह चिन्हों को धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन अन्य देवताओं के चिन्हों को धारण करने (या श्रीविष्णु के ही इन चिन्हों से भिन्न किसी लक्ष्मकी धारण करने) पर अतिशय किल्विष (ऐकान्त्यभंगरुपदोष या उसके कारण आपराधिकता) को प्राप्त करता है॥३८॥