नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता श्रीहरि का प्रपत्तिशील भक्त अपनी जीविका मन्त्रों के पाठ तथा जप करके न चलावे और न ही देवपूजक होकर रहे। वह श्रीहरि को बिना अर्पण किये भोजन करनेवाला और भगवान् को प्रसादरूप में नित्यवर्ज्य खाद्यादि को अर्पण करनेवाला भी नहीं होना चाहिए॥२९॥ वर्ज्याः पाखण्डशैवाद्यैः स्थापिताश्च तथार्चिताः । अन्यत्र च स्वतो बद्धा नियमात् सर्वदेवताः ॥३०॥ ऐसी भगवत् प्रतिमाएं जिन्हें वैदिक ब्राह्मण पाखण्डजन तथा अन्य शैवादि ने स्थापित तथा पूजित की हो उनकी भी पूजनादि से दूर रहना चाहिए। नियमतः तु कर्मवश सभी देवता भगवत् शरीरभाव के बिना उपासना के योग्य नहीं माने जाते हैं॥३०॥ गृहे यस्यान्यदेवार्चा व्यक्तो न च जनार्दनः । न तस्य किञ्चिदश्नीयादपि वेदान्तवेदिनः ॥३१॥ जिस पुरुष के घर में अन्य देवगण की पूजन में श्रीविष्णु का पूजन व्यक्त रूप में नहीं होता हो तो यदि वह वेद या वेदान्तवेत्ता विद्वान् भी (अनेक यज्ञादिं का कर्त्ता विद्वान् ब्राह्मण भी) हो तो उसके यहाँ पर (कुछ भी) अन्नादि ग्रहण नहीं करना चाहिए॥३१॥ वर्जयेदन्यदेवानामाल्याद्युपसर्पणम् । तथा गोपुरहर्म्यार्चयानास्त्राद्यवलोकनम् ॥३२॥ इसी प्रकार श्रीविष्णु के अतिरिक्त अन्य देवताओं के मन्दिरों में दर्शनार्थ भक्ति से न तो जाना ही चाहिए और न उनके गोपुर, निवास भवन तथा रथोत्सवादि का अवलोकन या उनके त्रिशूलादि अस्त्रों की अर्चना ही करना चाहिए॥३२॥ गीतवादित्रघण्टादिशब्दानां श्रवणं तथा । कर्माणि च समस्तानि बाह्यान्याभ्यन्तराणि च ॥३३॥ उनके मन्दिर में होनेवाले गीत, वादन तथा घण्टादि शब्दों का श्रवण तथा वहाँ सम्पन्न होनेवाले अर्चनादि समस्त कर्म जो मन्दिर के अन्दर किये जाएं या जो मन्दिरों के बाहर हो रहे हों तो उनको भी नहीं देखना या कार्यों में सम्मिलित होना ही उचित है॥३३॥ द्रव्याणां भुक्तभोगानां स्वीकारं स्पर्शनन्तथा । भोगादीनां तदर्थञ्चाप्यर्थनां प्रतिपादनम् ॥३४॥ उन अन्य देवताओं के द्वारा भुक्त या अर्पित (प्रसादादि) अन्यान्य अन्नादि का स्वीकार करना उनका स्पर्श करते हुए या उनके वन्दनादि में झुक कर पृथ्वी को