भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 135
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * १३३

अविवेकियोंने काम, क्रोध आदिसे दूषित अहंकारयुक्त चित्तसे किसलिये पापका आचरण किया है। पहले तो बड़े हर्षमें भरकर तुम लोगोंने पाप किये हैं, अब उसी प्रकार नरककी यातनाएँ भी भोगनी चाहिये। अपने कुटुम्ब, मित्र और स्त्रीके लिये जैसा पाप तुमने किया है, उसीके अनुसार कर्मवश तुम यहाँ आ पहुँचे हो। अब अत्यन्त दुःखी क्यों हो रहे हो? तुम्हीं सोचो, जब पहले तुमने पापाचार किया था, उस समय यह भी क्यों नहीं विचार लिया कि यमराज इसका दण्ड अवश्य देंगे। कोई दरिद्र हो या धनी, मूर्ख हो या पण्डित और कायर हो या वीर—यमराज सबके साथ समान बर्ताव करनेवाले हैं।' चित्रगुप्तका यह वचन सुनकर वे पापी भयभीत हो अपने कर्मोंके लिये शोक करते हुए चुपचाप खड़े रह जाते हैं। तब यमराजकी आज्ञाका पालन करनेवाले क्रूर, क्रोधी और भयंकर दूत इन पापियोंको बलपूर्वक पकड़कर नरकोंमें फेंक देते हैं। वहाँ अपने पापोंका फल भोगकर अन्तमें शेष पापके फलस्वरूप वे भूतलपर आकर स्थावर आदि योनियोंमें जन्म लेते हैं।

नारदजीने कहा—भगवान्! मेरे मनमें एक संदेह पैदा हो गया है। आपने ही कहा है कि जो लोग ग्राम-दान आदि पुण्यकर्म करते हैं, उन्हें कोटिसहस्र कल्पोंतक उनका महान् भोग प्राप्त होता रहता है। दूसरी ओर यह भी आपने बताया है कि प्राकृत प्रलयमें सम्पूर्ण लोकोंका नाश हो जाता है और एकमात्र भगवान् विष्णु ही शेष रह जाते हैं। अतः मुझे यह संशय हुआ है कि प्रलयकालतक जीवके पुण्य और पापभोगकी क्या समाप्ति नहीं होती? आप इस संदेहका निवारण करने योग्य हैं।

श्रीसनकजी बोले—महाप्राज्ञ! भगवान् नारायण अविनाशी, अनन्त, परमप्रकाशस्वरूप और सनातन पुरुष हैं। वे विशुद्ध, निर्गुण, नित्य और माया-मोहसे रहित हैं। परमानन्दस्वरूप श्रीहरि निर्गुण होते हुए भी सगुण-से प्रतीत होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रूपोंमें व्यक्त होकर भेदवान्-से दिखायी देते हैं। वे ही मायाके संयोगसे सम्पूर्ण जगत्का कार्य करते हैं। वे ही श्रीहरि ब्रह्माजीके रूपसे सृष्टि और विष्णुरूपसे जगत्का पालन करते हैं और अन्तमें भगवान् रुद्रके रूपसे वे ही सबको अपना ग्रास बनाते हैं। यह निश्चित सत्य है। प्रलयकाल व्यतीत होनेपर भगवान् जनार्दनने शेषशय्यासे उठकर ब्रह्माजीके रूपसे सम्पूर्ण चराचर विश्वकी पूर्व कल्पोंके अनुसार सृष्टि की है। विप्रवर! पूर्व कल्पोंमें जो-जो स्थावर-जङ्गम जीव जहाँ-जहाँ स्थित थे, नूतन कल्पमें ब्रह्माजी उस सम्पूर्ण जगत्की पूर्ववत् सृष्टि कर देते हैं। अतः साधुशिरोमणे! किये हुए पापों और पुण्योंका अक्षय फल अवश्य भोगना पड़ता है (प्रलय हो जानेपर जीवके जिन कर्मोंका फल शेष रह जाता है, दूसरे कल्पमें नयी सृष्टि होनेपर वह जीव पुनः अपने पुरातन कर्मोंका भोग भोगता है।) कोई भी कर्म सौ करोड़ कल्पोंमें भी बिना भोगे नष्ट नहीं होता। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है*।


* नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
(ना० पूर्व० ३१।६९-७०)