भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 770 में से

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पृष्ठ 136
१३४* संक्षिप्त नारदपुराण *

पापी जीवोंके स्थावर आदि योनियोंमें जन्म लेने और दुःख भोगनेकी अवस्थाका वर्णन

**श्रीसनकजी कहते हैं—**इस प्रकार कर्मपाशमें बँधे हुए जीव स्वर्ग आदि पुण्यस्थानोंमें पुण्यकर्मोंका फल भोगकर तथा नरक-यातनाओंमें पापोंका अत्यन्त दुःखमय फल भोगकर क्षीण हुए कर्मोंके अवशेष भागसे इस लोकमें आकर स्थावर आदि योनियोंमें जन्म लेते हैं। वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली और पर्वत तथा तृण—ये स्थावरके नामसे विख्यात हैं। स्थावर जीव महामोहसे आच्छन्न होते हैं। स्थावर योनियोंमें उनकी स्थिति इस प्रकार होती है। पहले वे बीजरूपसे पृथ्वीमें बोये जाते हैं। फिर जलसे सींचनेके पश्चात् मूलभावको प्राप्त होते हैं। उस मूलसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है। अंकुरसे पत्ते, तने और पतली डाली आदि प्रकट होते हैं। उन शाखाओंसे कलियाँ और कलियोंसे फूल प्रकट होते हैं। उन फूलोंसे ही वे धान्य वृक्ष फलवान् होते हैं। स्थावर योनिमें जो बड़े-बड़े वृक्ष होते हैं, वे भी दीर्घकालतक काटने, दावानलमें जलने तथा सर्दी-गर्मी लगने आदिके महान् दुःखका अनुभव करके मर जाते हैं। तदनन्तर वे जीव कीट आदि योनियोंमें उत्पन्न होकर सदा अतिशय दुःख उठाते रहते हैं। अपनेसे बलवान् प्राणियोंद्वारा पीड़ा प्राप्त होनेपर वे उसका निवारण करनेमें असमर्थ होते हैं। शीत और वायु आदिके भारी क्लेश भोगते हैं और नित्य भूखसे पीड़ित हो मल-मूत्र आदिमें विचरते हुए दुःख-पर-दुःख उठाते रहते हैं। तदनन्तर इसी क्रमसे पशुयोनिमें आकर अपनेसे बलवान् पशुओंकी बाधासे भयभीत रहते हुए वे जीव अकारण भी भारी उद्वेगसे कष्ट पाते रहते हैं। उन्हें हवा, पानी आदिका महान् कष्ट सहन करना पड़ता है। अण्डज (पक्षी)-की योनिमें भी वे कभी वायु पीकर रहते हैं और कभी मांस तथा अपवित्र वस्तुएँ खाते हैं। ग्रामीण पशुओंकी योनिमें आनेपर भी उन्हें कभी भार ढोने, रस्सी आदिसे बाँधे जाने, डंडोंसे पीटे जाने तथा हल आदि धारण करनेके समस्त दुःख भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार बहुत-सी योनियोंमें क्रमशः भ्रमण करके वे जीव मनुष्य-जन्म पाते हैं। कोई पुण्यविशेषके कारण बिना क्रमके भी शीघ्र मनुष्य-योनि प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य-जन्म पाकर भी नीची जातियोंमें नीच पुरुषोंकी टहल बजानेवाले, दरिद्र, अङ्गहीन तथा अधिक अङ्गवाले इत्यादि होकर वे कष्ट और अपमान उठाते हैं तथा अत्यन्त दुःखसे पूर्ण ज्वर, ताप, शीत, गुल्मरोग, पादरोग, नेत्ररोग, सिरदर्द, गर्भ-वेदना तथा पसलीमें दर्द होने आदिके भारी कष्ट भोगते हैं।

मनुष्य-जन्ममें भी जब स्त्री और पुरुष मैथुन करते हैं, उस समय वीर्य निकलकर जब जरायु (गर्भाशय)-में प्रवेश करता है, उसी समय जीव अपने कर्मोंके वशीभूत हो उस वीर्यके साथ गर्भाशयमें प्रविष्ट हो रज-वीर्यके कललमें स्थित होता है। वह वीर्य जीवके प्रवेश करनेके पाँच दिन बाद कललरूपमें परिणत होता है। फिर पंद्रह दिनके बाद वह पलल (मांसपिण्डकी-सी स्थिति) भागको प्राप्त हो एक महीनेमें प्रादेशमात्र* बड़ा हो जाता है। तबसे लेकर पूर्ण चेतनाका अभाव होनेपर भी माताके उदरमें दुस्सह ताप और क्लेश होनेसे वह एक स्थानपर स्थिर न रह सकनेके कारण वायुकी प्रेरणासे इधर-उधर भ्रमण करता है। फिर दूसरा महीना पूर्ण होनेपर वह मनुष्यके-से आकारको पाता है। तीसरे


* अँगूठेकी नोकसे लेकर तर्जनीकी नोकतककी लम्बाईको 'प्रादेश' कहते हैं।