भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 242

२४० * संक्षिप्त नारदपुराण *


‘चित् चिती चिन्ति, चिता चिद्भ्याम् चिद्भिः’ इत्यादि होते हैं। त्यद् आदि१ शब्दोंके रूप पुँल्लिङ्गमें ‘स्यः त्यौ ते’ इत्यादि सर्ववत् होते हैं। नपुंसकमें ‘त्यत् त्ये त्यानि’—ये रूप होते हैं॥ ४२ ॥

एतद् बेभिद्गवाग् गवाङ् गोअग् गोङ् गोग् गोङ्।
तिर्यग्यकृच्छकृच्चैव ददद्भवत्पचत्तुदत् ॥ ४३ ॥

(इदम् और) एतत्-शब्दके रूप अन्वादेशमें२ द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियोंमें कुछ भिन्न होते हैं। पुँल्लिङ्गमें ‘एनम् एनौ एनान्, एनेन एनयोः।’ नपुंसकमें ‘एनत् एने एनानि’ ये रूप हैं। अन्वादेश न होनेपर पूर्वोक्त रूप होते हैं। बेभित्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—‘बेभित् बेभिद् बेभिदी बेभिदि (यहाँ नुम् नहीं होता)। बेभिदा बेभिद्भ्याम् बेभिद्भिः’ इत्यादि। गवाक्-शब्दके रूप गति और पूजा-अर्थके भेदसे अनेक होते हैं। गति-पक्षमें गवाक्‌का अर्थ है गायके पास जानेवाला और पूजा-पक्षमें उसका अर्थ है गो-पूजक। प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें उसके उभयपक्षीय रूप इस प्रकार हैं—एकवचनमें ये नौ रूप होते हैं—गवाक् गवाग् गोअक् गोअग् गोक् गोग् गवाङ् गोअङ् गोङ् द्विवचनमें चार रूप होते हैं—गोची गवाञ्ची गोअञ्ची गोञ्ची। बहुवचनमें तीन रूप हैं—गवाञ्चि गोअञ्चि और गोञ्चि। प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें ये ही रूप होते हैं। तृतीयासे लेकर सप्तमीके एकवचनमें सर्वत्र चार-चार रूप होते हैं—‘गोचा गवाञ्चा गोअञ्चा गोञ्चा’ इत्यादि। भ्याम्, भिस् और भ्यस्‌में छः-छः रूप होते हैं— गवाग्भ्याम् गोअग्भ्याम् गोग्भ्याम् गवाङ्भ्याम् गोअङ्भ्याम् गोङ्भ्याम् इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें भी नौ रूप होते हैं—गवाक्षु गोअक्षु गोक्षु, गवाङ्क्षु गोअङ्क्षु गोङ्क्षु गवाक्षु गोअक्षु गोक्षु। इस प्रकार कुल एक सौ नौ रूप होते हैं३। तिर्यक्४-शब्द पशु-पक्षियोंका वाचक है। यकृत्५-शब्द कलेजा तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली बीमारीका बोधक है। शकृत्६-शब्द विष्ठाका वाचक है। ददत्-शब्दका रूप पुँल्लिङ्गमें बिभ्रत् शब्दकी तरह होता है। नपुंसकमें ‘ददत्, ददती, ददन्ति ददति’ ये रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। भवत्७ शब्दका अर्थ है, पूज्य। शतृ प्रत्ययान्त ‘भवत्’ शब्दके रूप पुँल्लिङ्गमें ‘भवन् भवन्तौ भवन्तः’ इत्यादि होते हैं। शेष पूर्ववत्। स्त्रीलिङ्गमें ‘भवन्ती भवन्त्यौ भवन्त्यः’ इत्यादि गोपीके समान रूप हैं। नपुंसकमें पूर्ववत् हैं। पचत्-शब्दका रूप सभी लिङ्गोंमें शतृ-प्रत्ययान्त ‘भवत्’ शब्दके समान होता है। तुदत्-शब्द पुँल्लिङ्गमें पचत्‌शब्दके ही समान है। स्त्रीलिङ्गमें ङीप् प्रत्यय होनेपर उसके दो रूप होते हैं—तुदती और तुदन्ती, फिर इन दोनोंके रूप गोपी-शब्दकी भाँति चलते हैं। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियोंके रूप इस प्रकार हैं—तुदत् तुदती


१. त्यद्, तद, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि—ये त्यदादि कहलाते हैं। २. एकके विषयमें दोबारा की हुई चर्चा अन्वादेश है, जैसे—‘यह आया, इसे भोजन दो’ इस वाक्यमें ‘इसे’ अन्वादेश हुआ। ३. कुछ मनीषी विद्वान् इसमें ५२७ रूपोंकी उद्भावना करते हैं। ४. पुँल्लिङ्गमें इसके ‘तिर्यङ् तिर्यञ्चौ’ इत्यादि प्रत्यङ् -शब्दकी तरह रूप होते हैं। द्वितीयाके बहुवचनमें ‘तिरश्चः’ रूप होता है। तृतीया आदिमें ‘तिरश्चा तिर्यग्भ्याम्’ इत्यादि रूप होते हैं। नपुंसकमें ‘तिर्यक् तिरश्ची तिर्यञ्चि’ रूप होते हैं। पूजा-पक्षमें ‘तिर्यङ् तिर्यञ्ची तिर्यञ्चि’ रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। ५. इसके रूप होते हैं—यकृत् यकृती यकृन्ति। यकृता यकृद्भ्याम् इत्यादि। ‘यकन्’ आदेश होनेपर ‘यकानि’ रूप केवल ‘शस्’ विभक्तिमें होता है। तृतीया आदिके एकवचनमें ‘यक्रा’ आदि रूप अधिक होते हैं। ६. इसके रूप भी यकृत्-शब्दकी भाँति ही होते हैं। ७. इसके तीनों लिङ्गोंमें रूप होते हैं। पुँल्लिङ्गमें ‘भवान् भवन्तौ भवन्तः’ इत्यादि ‘धीमत्’ शब्दके समान रूप हैं। स्त्रीलिङ्गमें ‘भवती भवत्यौ भवत्यः’ इत्यादि गोपी-शब्दके समान रूप होते हैं। नपुंसकमें दो विभक्तियोंमें उसके ‘भवत् भवती भवन्ति’ रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्।