भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 243
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४१

तुदन्ती तुदन्ति। शेष पुँल्लिङ्गवत् ॥ ४३ ॥
दीव्यद्धनुश्च पिपठीः पयोऽदःसुपुमांसि च।
गुणद्रव्यक्रियायोगांस्त्रिलिङ्गांश्च कति ब्रुवे ॥ ४४ ॥

दीव्यत्-शब्दके रूप सभी लिङ्गोंमें पचत्के समान हैं। धनुष्-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—धनुः धनुषी धनूंषि। धनुषा धनुर्भ्याम् इत्यादि। पिपठिष्-शब्दके रूप नपुंसकमें इस प्रकार हैं—'पिपठीः पिपठिषी पिपठींषि' शेष पुँल्लिङ्गवत्। पयस्-शब्दके रूप तपस्-शब्दके समान होते हैं। यह दूध और जलका वाचक है। अदस्^१-शब्दके पुँल्लिङ्ग रूप बताये जा चुके हैं। जिस कुलमें अच्छे पुरुष होते हैं, उसे सुपुम्^२ कहते हैं। अब हम कुछ ऐसे शब्दोंका वर्णन करते हैं, जो गुण, द्रव्य और क्रियाके सम्बन्धसे तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं ॥ ४४ ॥

शुक्तः कीलालपाश्चैव शुचिश्च ग्रामणीः सुधी।
पटुः स्वयम्भूः कर्ता च माता चैव पिता च ना ॥ ४५ ॥
सत्यानायुरपुंसश्च मतभ्रमरदीर्घपात्।
धनाढ्यसोम्यौ चागर्हस्तादृक् स्वर्णमथो बहु ॥ ४६ ॥

शुक्त^३, कीलालपा, शुचि, ग्रामणी, सुधी, पटु, स्वयम्भू तथा कर्ता^४। मातृ-शब्द यदि परिच्छेत्तृवाचक हो तो तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। इसके पुँल्लिङ्गरूप—माता, मातारी, मातारः' इत्यादि; नपुंसकरूप—मातृ, मातृणी, मातृणि' इत्यादि और स्त्रीलिङ्गरूप—'मात्री, मात्र्यौ मात्र्यः' हैं। जननीवाची मातृ-शब्द नित्य-स्त्रीलिङ्ग है। इसके रूप इस प्रकार हैं—'माता मातरौ मातरः। मातरम् मातरौ मातृः' इत्यादि। इसके शेष रूप स्वसृ-शब्दके समान हैं। पितृ-शब्द यदि कुलका विशेषण हो तो नपुंसकमें प्रयुक्त हो सकता है। अन्यथा वह नित्य पुँल्लिङ्ग है। इसके रूप 'पिता पितरौ पितरः। पितरम् पितरौ पितॄन्' इत्यादि हैं। शेष कर्तृशब्दके समान समझने चाहिये। नृ-शब्द नित्य पुँल्लिङ्ग है और उसके सभी रूप पितृ-शब्दके समान हैं। केवल षष्ठीके बहुवचनमें इसके दो रूप होते हैं 'नृणाम् नॄणाम्,'।


१. स्त्रीलिङ्गमें इसके पूरे रूप इस प्रकार हैं—असौ अमू अमूः। अमूम् अमू अमूः। अमुया अमूभ्याम् ३ अमूभिः। अमुष्यै अमूभ्यः २। अमुष्याः २। अमुयोः २ अमूषाम्। अमुष्याम् अमूषु॥ नपुंसकलिङ्गमें प्रथम दो विभक्तियोंके रूप 'अदः अमू अमूनि' हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्।
२. सुपुम् सुपुंसी सुपुमांसि। शेष विभक्तियोंमें पुंस्-शब्दकी तरह रूप होते हैं।
३. 'शुक्त' (सीप या सुतुही) शब्दके पुँल्लिङ्गरूप—शुक्तः शुक्तौ शुक्ताः। शुक्तं शुक्तौ शुक्तान्। शुक्तेन शुक्ताभ्यां शुक्तैः। शुक्ताय शुक्ताभ्याम् शुक्तेभ्यः। शुक् तात् शुक्ताभ्यां शुक्तेभ्यः। शुक्तस्य शुक्तयोः शुक्तानाम्। शुक्ते शुक्तयोः शुक्तेषु। हे शुक्त शुक्तौ शुक्ताः। इस प्रकार हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'शुक्ता शुक्ते शुक्ताः' इत्यादि 'राधा'के समान रूप हैं। नपुंसकमें 'शुक्तं शुक्ते शुक्तानि' ये प्रथमा और द्वितीया विभक्तिके रूप हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत् रूप हैं।
४. 'कीलालपा' (जल पीनेवाला) के सभी रूप गोपाके समान हैं। और नपुंसकमें कुलके समान रूप होते हैं। 'शुचि' (पवित्र) शब्दके पुँल्लिङ्गरूप हरिके समान हैं। स्त्रीलिङ्गरूप 'गति' के समान और नपुंसकरूप 'वारि' के समान हैं। ग्रामणी (ग्रामका नेता) के पुँल्लिङ्गरूप बताये गये हैं। स्त्रीलिङ्गरूप भी प्रायः वे ही हैं। नपुंसकके भी बताये जा चुके हैं। 'सुधी' शब्दका अर्थ है श्रेष्ठ बुद्धिवाला तथा विद्वान्। पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्गमें 'सुधीः सुधियौ, सुधियः' इत्यादि रूप होते हैं। नपुंसकमें 'सुधि, सुधिनी, सुधीनि' इत्यादि रूप हैं। 'पटु' (समर्थ)-के पुँल्लिङ्ग रूप 'भानु' के समान, स्त्रीलिङ्ग 'धेनु' के समान और नपुंसकरूप 'पटु पटुनी पटूनि' हैं; शेष भानुवत्। 'स्वयम्भू' (ब्रह्मा)-के पुँल्लिङ्गरूप बताये गये हैं, स्त्रीलिङ्गमें भी वैसे ही होते हैं। नपुंसकमें 'स्वयम्भु वयम्भुनी स्वयम्भूिन' रूप होते हैं। शेष पुँल्लिङ्गवत्। 'कर्तृ' शब्दके पुँल्लिङ्ग और नपुंसक रूप बताये गये हैं। स्त्रीलिङ्गमें 'गोपी' शब्दके समान 'कर्त्री' शब्दके रूप चलते हैं।