भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

२४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

सत्य, अनायुष्, अपुंस्, मत, भ्रमर, दीर्घपात्, धनाढ्य, सोम्य, अगर्ह, तादृक्, स्वर्ण, बहु—ये शब्द भी तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं¹ ॥४६॥
सर्वं विश्वोभये चोभौ अन्यान्यतरेतराणि च ॥४७॥
डतरो डतमो नेमस्त्वत्समौ त्वसिमावपि।
पूर्वः परावरौ चैव दक्षिणश्चोत्तराधरौ ॥४८॥
अपरः स्वोऽन्तरस्त्यत्तद्यदेतत्किमसमावयम्।
युष्मदस्मच्च प्रथमश्वरमोऽल्पस्त्यार्धकः ॥४९॥
नेमः कतिपयो द्वे निपाताः स्वरादयस्तथा।
उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपाश्चाव्ययाः ॥५०॥

अब सर्वनामशब्दोंको सूचित करते हैं—सर्व, विश्व, उभय, उभ, अन्य, अन्यतर, इतर, डतर, डतम, नेम, त्व, त्वत्, सम, सिम, पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अधर, अपर, स्व, अन्तर, त्यत्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, किम्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवत्। ये सर्वनाम हैं और इनके रूप प्रायः² सर्व-शब्दके समान ही हैं। प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम—इन शब्दोंके प्रथमाके बहुवचनमें दो रूप होते हैं यथा—प्रथमे प्रथमाः, चरमे चरमाः इत्यादि।

स्वरादि और निपात तथा उपसर्ग, विभक्ति एवं स्वरके प्रतिरूपक शब्द अव्ययसंज्ञक होते हैं॥४७-५०॥

तद्धिताश्चाप्यपत्यार्थे पाण्डवाः श्रैधरस्तथा।
गार्ग्यो नाडायनात्रेयौ गाङ्गेयः पैतृष्वस्त्रीयः ॥५१॥
अब तद्धित-प्रत्ययान्त शब्दोंका उल्लेख करते


१. 'सत्य' शब्द जब सामान्यतः सत्य भाषणके अर्थमें आता है, तब नपुंसक होता है और विशेषणरूपमें प्रयुक्त होनेपर विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त होता है। इसके पुँल्लिङ्गरूप—सत्यः सत्यौ सत्याः—इत्यादि रामवत् हैं। स्त्रीलिङ्गरूप—राधाके समान हैं—सत्या सत्ये सत्याः। नपुंसकरूप—'सत्यम् सत्ये सत्यानि' हैं। शेष रामवत्। 'अनायुष्' शब्दका अर्थ है आयुहीन। पुँल्लिङ्गमें—'अनायुः, अनायुषौ, अनायुषः' इत्यादि। स्त्रीलिङ्गमें भी ये ही रूप हैं। नपुंसकलिङ्गमें 'अनायुः अनायुषी अनायूंषि' इत्यादि। 'अपुंस्' का अर्थ है, पुरुषरहित। पुँल्लिङ्गमें—अपुमान् इत्यादि, स्त्रीलिङ्गमें 'अपुंस्का' आदि तथा नपुंसकमें 'अपुम्' इत्यादि रूप होते हैं। मतका अर्थ है—'अभिमत, राय' आदि। 'मतः', मता। मतम्' ये क्रमशः पुँल्लिङ्ग आदिके रूप हैं। 'भ्रमर'का अर्थ है भौंरा या घूमकर शब्द करनेवाला। पुँल्लिङ्गमें भ्रमरः, स्त्रीलिङ्गमें भ्रमरी, नपुंसकमें भ्रमरम्, इत्यादि रूप होते हैं। जिसके पैर बड़े हों, वह 'दीर्घपात्' हैं। तीनों लिङ्गोंमें 'दीर्घपात्' यही प्रथम रूप है। 'धनाढ्य' का अर्थ है धनी। धनाढ्यः, धनाढ्या, धनाढ्यम्—ये क्रमशः तीनों लिङ्गोंके प्रथम रूप हैं। 'सोम्य' का अर्थ है शान्त, मृदु स्वभाववाला। रूप धनाढ्यके ही तुल्य है। 'अगर्ह' का अर्थ है निन्दारहित। रूप पूर्ववत् है। 'तादृश्' शब्दका अर्थ है, 'वैसा'। इसके 'तादृक् तादृशौ तादृशः' इत्यादि पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्गमें रूप होते हैं, नपुंसकमें तादृक् तादृशी तादृशि रूप होते हैं। स्वर्णका अर्थ है सोना। रूप धनाढ्यवत् है। तीनों लिङ्गोंमें 'बहु' के रूप क्रमशः बहवः। बह्व्यः। बहूनि इत्यादि हैं।
२. प्रायः इसलिये कहा गया कि कुछ शब्दोंके रूपमें कहीं-कहीं अन्तर है। जैसे पूर्व पर अवर दक्षिण अपर उत्तर अधर—ये व्यवस्था और असंज्ञामें ही सर्वनाम माने जाते हैं। जहाँ संज्ञा हो अथवा व्यवस्थाभिन्न अर्थमें इन शब्दोंका प्रयोग हो वहाँ इनका रूप 'सर्व' शब्दके समान न होकर 'राम' शब्दके समान हो जाता है। यथा—दक्षिणाः गायकाः, उत्तराः कुरवः। यहाँ दक्षिण-शब्द कुशल अर्थमें और उत्तर-शब्द देशकी संज्ञामें प्रयुक्त हुए हैं। व्यवस्था और असंज्ञामें यद्यपि ये सर्वनामसंज्ञक होते हैं, तथापि प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी और सप्तमीके एकवचनमें इनकी सर्वनामसंज्ञा वैकल्पिक होती है। अतः उन स्थलोंमें दो-दो रूप होते हैं—एक सर्ववत् दूसरा रामवत्। यथा—'पूर्वे पूर्वाः, पूर्वस्मात्, पूर्वात्, पूर्वस्मिन् पूर्वे' इत्यादि। शेष सभी रूप सर्ववत् हैं। ज्ञाति और धनसे भिन्न अर्थमें 'स्व' शब्दका रूप भी पूर्वादि शब्दोंके समान ही होता है। बाह्य और परिधानीय (पहननेयोग्य वस्त्र) अर्थमें प्रयुक्त अन्तर शब्दका रूप भी पूर्वादिके ही समान होता है। डतर और डतम शब्द प्रत्यय हैं। अतः तदन्त शब्द ही यहाँ सर्वादिमें गृहीत होते हैं, यथा—यतर यतम ततर ततम कतर कतम इत्यादि।