संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २४५
श्रेष्ठः^१ (यह इन सबमें अधिक प्रशंसनीय है, अतः श्रेष्ठ है)। द्वयोः प्रशस्य श्रेयान् (दोमेंसे जो एक अधिक प्रशंसनीय है, वह श्रेयान् कहलाता है। यहाँ भी प्रशस्य+ईयस्=श्रेयस् (पूर्ववत् श्र आदेश हुआ)। इसके रूप इस प्रकार हैं—श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांसः। श्रेयांसम् श्रेयांसौ श्रेयसः। श्रेयसा श्रेयोभ्याम् श्रेयोभिः इत्यादि। इसी प्रकार जो दोमेंसे एक अधिक कृष्ण है, उसे कृष्णतर और जो बहुतोंमेंसे एक अधिक शुक्ल है, उसे शुक्लतम कहते हैं। कृष्ण+तर=कृष्णतर। शुक्ल+तम=शुक्लतम। किम्, क्रियावाचक शब्द (तिङन्त) और अव्ययसे परे जो तम और तर प्रत्यय हैं, उनके अन्तमें आम् लग जाता है। उदाहरणके लिये किंतराम्, अतितराम् तथा उच्चैस्तराम् इत्यादि प्रयोग हैं। प्रमाण (जल आदिके माप) व्यक्त करनेके लिये द्वयस, दघ्न और मात्र प्रत्यय होते हैं। जानु प्रमाणम् अस्य इति जानुदघ्नं जलम् (जो घुटनेतक आता हो, उस जलको जानुदघ्न कहते हैं) जानु+दघ्न=जानुदघ्न। इसी प्रकार जानुद्वयसम् और जानुमात्रम्—ये प्रयोग भी होते हैं॥ ५९-६० ॥
जानुमात्रं च निर्द्धारि बहूनां च द्वयोः क्रमात्।
कतमः कतरः संख्येयविशेषावधारणे ॥ ६१ ॥
द्वितीयश्च तृतीयश्च चतुर्थः षष्ठपञ्चमौ।
एकादशः कतिपयथः कतिथः कति नारद ॥ ६२ ॥
दोमेंसे एकका और बहुतोंमेंसे एकका निश्चय करनेके लिये 'किम्' 'यत्' और 'तत्' शब्दोंसे क्रमशः डतर और डतम प्रत्यय होते हैं। यथा—भवतोः कतरः^२ श्यामः (आप दोनोंमें कौन श्याम है?) भवतां कतमः श्रीरामः? (आपलोगोंमें कौन श्रीराम हैं?)। संख्या (गणना) करनेयोग्य वस्तुविशेषका निश्चय करनेके लिये द्वि-शब्दसे द्वितीय, त्रि-शब्दसे तृतीय^३, चतुर्-शब्दसे चतुर्थ और षष्-शब्दसे षष्ठ रूप बनते हैं। इनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है—दूसरा, तीसरा, चौथा और छठा। पञ्चन्, सप्तन्, अष्टन्, नवन् और दशन्—इन शब्दोंके 'न्' कारको मिटाकर 'म'कार बढ़ जाता है, जिससे पञ्चम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम रूप बनते हैं। एकादशन्से अष्टादशन्तक उक्त अर्थमें 'न्' कारका लोप होकर सभी शब्द अकारान्त हो जाते हैं, जिनके 'राम' शब्दके समान रूप होते हैं। यथा एकादशः द्वादशः इत्यादि। नारदजी! कति और कतिपय शब्दोंसे थ-प्रत्यय होता है, जिससे कतिथः और कतिपयथः पद बनते हैं ॥ ६१-६२ ॥
विंशश्च विंशतितमस्तथा शततमादयः।
द्वेधा द्वैधा द्विधा संख्या प्रकारेऽथ मुनीश्वर ॥ ६३ ॥
बीसवेंके अर्थमें विंशः और विंशतितमः^४—ये दो रूप होते हैं। शत आदि संख्यावाचक शब्दोंसे (तथा मास, अर्धमास एवं संवत्सर शब्दोंसे) नित्य 'तम' प्रत्यय होता है। यथा—शततमः (एकशततमः, मासतम्ः, अर्धमासतमः, संवत्सरतमः)। मुनीश्वर! क्रियाके प्रकारका बोध करानेके लिये संख्यावाचक
१. प्रशस्य+इष्ठ=श्रेष्ठ (प्रशस्य-शब्दके स्थानमें 'श्र'आदेश हो जाता है, फिर गुण करनेसे श्रेष्ठ-शब्द बनता है)।
२. किम्+डतर, किम्+डतम। यहाँ डकार इत्संज्ञक है। डित् प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके टिभागका लोप होता है। अन्तिम स्वर और उसके बादके हल् अक्षर भी 'टि' कहलाते हैं। 'किम्' में 'क' छोड़कर 'इम्' भाग 'टि' है। उसका लोप हुआ। क्+अतर=क्+अतम मिलकर 'कतर' और 'कतम' शब्द बने। इसी प्रकार यतर, यतम, ततर, ततम—ये शब्द भी बनते हैं। ३. 'त्रि+तीय' इस अवस्थामें 'त्रि' के स्थानमें सम्प्रसारण-पूर्वरूप होकर 'तृतीय' रूप बनता है। ४. इससे आगेकी सभी संख्याओंमें इसी प्रकारके दो रूप होते हैं। साठवेंके अर्थमें केवल 'षष्टितम' शब्द बनता है। उससे आगेकी संख्याओंमें भी यदि आदिमें दूसरी संख्याका प्रयोग न हो तो केवल तम प्रत्ययका विधान है। यथा—सप्ततितमः, अशीतितमः, नवतितमः इत्यादि। आदिमें संख्या लग जानेपर तो 'विंशः विंशतितमः' की भाँति दो-दो रूप होते ही हैं—जैसे एकषष्ठः एकषष्टितमः इत्यादि।