भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

२४६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


शब्दसे स्वार्थमें 'धा' प्रत्यय होता है—जैसे (एकधा) द्विधा, त्रिधा इत्यादि^१ ॥ ६३॥
क्रियावृत्तौ पञ्चकृत्वो द्विस्त्रिर्बहुश इत्यपि।
द्वितयं त्रितयं चापि संख्यायां हि द्वयं त्रयम्॥ ६४॥
क्रियाकी आवृत्तिका बोध करानेके लिये कृत्वस् प्रत्यय होता है और 'स्' कारका विसर्ग हो जाता है। यथा—पञ्चकृत्वः^२ (पाँच बार), द्विः^३, त्रिः (दो बार, तीन बार)। बहु-शब्दसे 'था, शस् एवं कृत्वस्' तीनों ही प्रत्यय होते हैं—यथा बहुधा, बहुशः, बहुकृत्वः। संख्याके अवयवका बोध करानेके लिये 'तय' प्रत्यय होता है। उदाहरणके लिये द्वितय, त्रितय, चतुष्टय और पञ्चतय आदि शब्द हैं। द्वि और त्रि शब्दोंसे आगे जो 'तय' प्रत्यय है, उसके स्थानमें विकल्पसे अय हो जाता है; फिर द्वि और त्रि शब्दके इकारका लोप होनेसे द्वय, त्रय शब्द बनते हैं॥ ६४॥
कुटीरश्च शमीरश्च शुण्डारोऽल्पार्थके मतः।
स्त्रैणः पौंस्र्नस्तुण्डिभश्च वृन्दारककृषीवलौ॥ ६५॥
कुटी, शमी और शुण्डा शब्दसे छोटेपनका बोध करानेके लिये 'र' प्रत्यय होता है। छोटी कुटीको कुटीर कहते हैं। कुटी+र=कुटीरः। इसी प्रकार छोटी शमीको शमीर और छोटी शुण्डाको शुण्डार कहते हैं। शुण्डा-शब्द हाथीकी सूँड़ और मद्यशाला (शराबखाने)-का बोधक है। स्त्री और पुंस् शब्दोंसे नञ् प्रत्यय होता है। आदि स्वरकी वृद्धि होती है। ञकार इत्संज्ञक है। नके स्थानमें ण होता है। इस प्रकार स्त्रैण शब्द बनता है। जिस पुरुषमें स्त्रीका स्वभाव हो तथा जो स्त्रीमें अधिक आसक्त हो, उसे स्त्रैण कहते हैं। पुंस्+न, आदिवृद्धि=पौंस्र्न (पुरुषसम्बन्धी)। तुण्डि आदि शब्दोंसे अस्त्यर्थमें 'भ' प्रत्यय होता है। तुण्डि+भ=तुण्डिभः (बढ़ी हुई नाभिवाला)। शृङ्ग और वृन्द शब्दोंसे अस्त्यर्थमें 'आरक' प्रत्यय होता है। शृङ्ग+आरक=शृङ्गारकः (पर्वत)। वृन्द+आरक= वृन्दारकः (देवता)। रजस् और कृषि आदि शब्दोंसे 'बल' प्रत्यय होता है, रजस्वला स्त्री, कृषीवलः (किसान)॥ ६५॥
मलिनो विकटो गोमी भौरिकिबिधमुक्तटम्।
अवटीटोऽवनाटश्च निविडं चेक्षुशाकिनम्॥ ६६॥
निविरीसमैषुकारिभक्तं विद्याचणस्तथा।
विद्याचञ्चुर्बहुतिथं पर्वतः शृङ्गिणस्तथा॥ ६७॥
स्वामी विषमं रूप्यं चोपेत्यकाधित्यका तथा।
चिल्लश्च चिपिटं चिक्कं वातूलं कुतुपस्तथा॥ ६८॥
बलूलश्च हिमेलुश्च कहिकश्चोपडस्ततः।
ऊर्णायुश्च मरुत्तश्चैकाकी चर्मण्वती तथा॥ ६९॥
ज्योत्स्ना तमिस्राऽष्ठीवच्च कक्षीवद्रुमण्वती।
आसन्दीवच्च चक्रीवत्तूष्णीकां जल्पत्क्यपि॥ ७०॥
मल-शब्दसे अस्त्यर्थमें इन प्रत्यय होता है। मलम् अस्यास्ति इति मलिनः (मलयुक्त)। मल+इन अकार-लोप=मलिन। सम्, प्र, उद् और वि—इनसे कट प्रत्यय होता है,—यथा संकटः, प्रकटः, उत्कटः, विकटः। गो-शब्दसे मिन्-प्रत्यय होता है। अस्त्यर्थमें—गो+मिन्=गोमी (जिसके पास गौएँ हों, वह पुरुष) ज्योत्स्ना (चाँदनी), तमिस्रा (अँधेरी रात), शृङ्गिण, (शृङ्गवाला), ऊर्जस्विन् (ओजस्वी), ऊर्जस्वल, गोमिन्, मलिन और मलीमस (मलिन)—


१. द्वि और त्रि शब्दोंके इकारका विकल्पसे एकार भी हो जाता है। यथा—द्वेधा, त्रेधा। द्वि और त्रि शब्दोंसे 'धम्' प्रत्यय और आदिस्वरकी वृद्धि—ये दो कार्य और भी होते हैं। यथा—द्वैधम्, त्रैधम्।
२. था, धा, त्र, तस्, कृत्वस् आदि प्रत्यय जिन शब्दोंके अन्तमें लगते हैं, वे तद्धितान्त अव्यय माने जाते हैं। ३. द्वि, त्रि और चतुर् शब्दोंसे कृत्वस् न होकर केवल 'सुच्' प्रत्यय होता है। इसमें केवल 'स' रहता है और 'उ'कार तथा 'च्'कारकी 'इत्संज्ञा' हो जाती है। प्रयोगमें सकारका विसर्ग हो जाता है। चतुर्-शब्दके आगे स 'स'का लोप होता है और 'र' का विसर्ग हो जाता है। इस प्रकार क्रमशः द्विः त्रिः चतुः—ये रूप बनते हैं। ये तीनों अव्यय हैं।