भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

२५० * संक्षिप्त नारदपुराण *

प्रयोजकके व्यापारमें प्रत्येक धातुसे णिच् प्रत्यय होता है। 'च'कार और 'ण'कार इत्संज्ञक हैं। णिच् प्रत्यय परे रहनेपर स्वरान्त अङ्गकी वृद्धि होती है। भू से णिच् करनेपर भू+इ बना; फिर वृद्धि और आव् आदेश करनेपर भावि बना, उससे धातुसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर भावयति रूप बनता है। जो कर्ताको प्रेरणा दे, उसे प्रयोजक कहते हैं। जैसे—'चैत्रः पण्डितो भवति' (चैत्र पण्डित होता है), 'तं मैत्रः अध्यापनादिना प्रेरयति' (उसे मैत्र पढ़ाने आदिके द्वारा पण्डित होनेमें प्रेरणा देता है)। इस वाक्यमें चैत्र प्रयोज्य कर्ता है और मैत्र प्रयोजक कर्ता है। इस प्रयोजकके व्यापारमें ही णिच् प्रत्यय होता है; इसलिये उसीके अनुसार प्रथम, मध्यम आदि पुरुषकी व्यवस्था एवं क्रिया होती है। प्रयोज्य कर्ता प्रयोजकके व्यापारमें कर्म बन जाता है, इसलिये उसमें द्वितीया विभक्ति होती है और प्रयोजक कर्तामें प्रथमा विभक्ति। यथा—'मैत्रः चैत्रं पण्डितं भावयति' (मैत्र चैत्रको पण्डित बनानेमें योग देता है)। इसी प्रकार अन्य धातुओंसे भी प्रेरणार्थक प्रत्यय होता है। यथा—'छात्रः पठति, गुरुः प्रेरयति इति गुरुः छात्रं पाठयति' (छात्र पढ़ता है, गुरु उसे प्रेरित करता है; इसलिये गुरु छात्रको पढ़ाता है)।

इच्छा-अर्थमें 'सन्' प्रत्यय होता है 'भवितुम् इच्छति बुभूषति' (होनेकी इच्छा करता है)। इसी प्रकार पठ्, गम् आदि अन्य धातुओंसे भी इच्छा-अर्थमें पिपठिषति (पढ़नेकी इच्छा करता है), जिगमिषति (जाना चाहता है)—इत्यादि सन्नन्त रूप होते हैं। मुने! क्रिया-समभिहारमें एक स्वरवाले हलादि धातुसे 'यङ्' प्रत्यय होता है, इस नियमके अनुसार भू-धातुसे यङ्प्रत्यय होनेपर धातुका द्वित्व होता है; क्योंकि सन् और यङ् परे रहनेपर धातुके द्वित्व होने (एकसे दो हो जाने)-का नियम है। फिर धातु-प्रत्ययसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर बोभूयते रूप बनता है। यथा—'देवदत्तः पण्डितो बोभूयते' (देवदत्त बड़ा भारी पण्डित हो रहा है)। 'बार-बार' या 'अधिक' अर्थका बोध कराना ही क्रियासमभिहार कहलाता है। इस तरहके प्रयोगको यङन्त कहते हैं। पठ् और गम् आदि धातुओंसे यङ्-प्रत्यय करनेपर पापठ्यते, (बार-बार या बहुत पढ़ता है)। जङ्गम्यते (बार-बार या बहुत जाता है) इत्यादि रूप होते हैं॥७९॥

तथा यङ्लुकि विप्रेन्द्र बोभवीति च पठ्यते।
पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद।
अनुदात्तङितो धातोः क्रियाविनिमये तथा ॥८०॥

यङ्-प्रत्ययका लुक् (लोप होना) भी देखा जाता है। उस दशामें बोभवीति, बोभोति, पापठीति और जङ्घमीति इत्यादि रूप होते हैं। इन रूपोंको यङ्लुगन्त रूप कहते हैं। अर्थ यङन्तके ही समान होते हैं। 'आत्मनः पुत्रम् इच्छति' (अपने लिये पुत्र चाहता है)। इस वाक्यसे पुत्रकी इच्छा व्यक्त होती है। ऐसे स्थलोंमें इच्छा-क्रियाके कर्मभूत शब्दसे क्यच्-प्रत्यय होता है। ककार और चकारकी इत्संज्ञा होती है। उपर्युक्त उदाहरणमें पुत्र-शब्दसे क्यच्-प्रत्यय करनेपर पुत्र+य इस अवस्थामें पुत्रमें 'त्र'के अकारका इ हो जाता है, फिर 'पुत्रीय' की धातुसंज्ञा करके तिङन्तके समान रूप चलते हैं। इस प्रकार 'पुत्रीयति' इत्यादि रूप होते हैं। 'पुत्रीयति'का अर्थ है—अपने लिये पुत्र चाहता है। ऐसे प्रयोगको नामधातु कहते हैं। नारदजी! कर्मभूत उपमानवाचक शब्दसे आचार-अर्थमें भी क्यच् होता है। यथा—'पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम्' (गुरुजी छात्रके साथ पुत्रका-सा बर्ताव करते हैं)।

अब आत्मनेपदका प्रकरण आरम्भ करते हैं। जिस धातुमें अनुदात्त स्वर और ङकारकी इत्संज्ञा