संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २५१ ---|---
होती है, उससे आत्मनेपदके प्रत्यय होते हैं। यथा—एधते, वर्धते इत्यादि। ये अनुदात्तेत् हैं। त्रैङ् पालने—यह ङित् धातु है, इसके केवल आत्मनेपदमें 'त्रायते' इत्यादि रूप होते हैं। जहाँ क्रियाका विनिमय व्यक्त होता हो, वहाँ भी आत्मनेपद होता है। यथा—व्यतिलुनीते (दूसरेके योग्य लवनरूप कार्य दूसरा करता है) ॥८०॥
निविशादेस्तथा विप्र विजानीह्यात्मनेपदम्।
परस्मैपदमाख्यातं शेषात् कर्तरि शाब्दिकैः ॥८१॥
विप्रवर ! निपूर्वक 'विश्' एवं वि और परापूर्वक 'जि' इत्यादि धातुओंसे भी आत्मनेपद ही जानो। यथा—निविशते, विजयते, पराजयते इत्यादि। भाव और कर्ममें प्रत्यय होनेपर भी आत्मनेपद ही होता है। आत्मनेपदके जितने निमित्त हैं, उन्हें छोड़कर शेष धातुओंसे कर्तामें परस्मैपद होता है—ऐसा वैयाकरणोंका कथन है॥८१॥
ञित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्भावकर्मणोः।
जिन धातुओंमें 'स्वरित' और 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उनसे परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों होते हैं। यथा—'खनति, खनते। श्रयति, श्रयते' इत्यादि।
(अब भाव-कर्म-प्रकरण आरम्भ करते हैं—) भाव और कर्ममें धातुसे यक् प्रत्यय होता है। भावमें प्रत्यय होनेपर क्रियामें केवल औत्सर्गिक एकवचन होता है और सदा प्रथम पुरुषके ही एकवचनका रूप लिया जाता है। उस दशामें कर्ता तृतीयान्त होता है। भू धातुसे भावमें प्रत्यय करनेपर 'भूयते' रूप होता है। वाक्यमें उसका प्रयोग इस प्रकार है—'त्वया मया अन्यैश्च भूयते।' सकर्मक धातुसे कर्ममें प्रत्यय होनेपर कर्म उक्त हो जाता है, अतः उसमें प्रथमा विभक्ति होती है और अनुक्त कर्तामें तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता है। कर्ताके अनुसार ही क्रियामें पुरुष और वचनकी व्यवस्था होती है। यथा—'चैत्रः आनन्दमनुभवति इति कर्मणि प्रत्यये चैत्रेणानन्दोऽनुभूयते', (चैत्रसे आनन्दका अनुभव किया जाता या आनन्द भोगा जाता है) चैत्रस्त्वामनुभवति, चैत्रेण त्वमनुभूयसे, (चैत्रसे तुम अनुभव किये जाते हो) चैत्रो मामनुभवति, चैत्रेणाहमनुभूये' (चैत्रसे मैं अनुभव किया जाता हूँ) इत्यादि उदाहरण भाव-कर्मके हैं।
सौकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने॥८२॥
विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे।
लभन्ते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम्॥८३॥
साध्वसिश्छिनत्त्येवं स्थाली पचति वै मुने।
धातोः सकर्मकात् कर्तृकर्मणोरपि प्रत्ययाः ॥८४॥
मुने! जब अतिशय सौकर्य प्रकाशित करनेके लिये लक्ष्यमें कर्ताके व्यापारकी विवक्षा नहीं रह जाती, तब कर्म और करण आदि दूसरे कारक ही कर्तृभावको प्राप्त होते हैं। यथा—'चैत्रो वह्निना स्थाल्यामोदनं पचति' (चैत्र आगसे बटलोईमें भात पकाता है)—इस वाक्यमें जब चैत्रके कर्तृत्वकी विवक्षा न रहे और करण आदिके कर्तृत्वकी विवक्षा हो जाय तो वे ही कर्ता हो जाते हैं और तदनुकूल क्रिया होती है। यथा—'वह्निः पचति' (आग पकाती है)। यहाँ करण ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'स्थाली पचति' (बटलोई पकाती है)—यहाँ अधिकरण ही कर्ताके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। 'ओदनः स्वयं पच्यते' (भात स्वयं पकता है)—यहाँ कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हुआ है। जब कर्म ही कर्तारूपमें प्रयुक्त हो तो कर्तामें लकार होता है; परंतु कर्मवद्भाव होनेसे यक् और आत्मनेपद आदि ही होते हैं। अतः 'पचति' न होकर 'पच्यते' रूप होता है। ऐसे प्रयोगको कर्म-कर्तृप्रकरणके अन्तर्गत मानते हैं। दूसरा उदाहरण इस प्रकार है—'असिना साधु छिनत्ति' (तलवारसे अच्छी तरह काटता है)—इस वाक्यमें उपर्युक्त नियमानुसार करणमें कर्तृत्वकी विवक्षा होनेपर