संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 770 में से
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ऐसा वाक्य बनेगा—‘साधु असिश्छिनत्ति' (तलवार अच्छा काटती है)। मुने! सकर्मक धातु भी कर्मकर्तृमें अकर्मक हो जाता है, अतः उससे भाव तथा कर्तामें भी लकार होता है। यथा भावे—पच्यते ओदनेन। कर्तरि—पच्यते ओदनः। सम्प्रदान और अपादान कारकोंमें कर्तृत्वकी विवक्षा कभी नहीं की जाती, क्योंकि यह अनुभवके विरुद्ध है। सामान्य स्थितिमें सकर्मक धातुसे ‘कर्ता' और 'कर्म'में प्रत्यय होते हैं ॥ ८२—८४ ॥
तस्माद् वाकर्मकाद्विप्र भावे कर्तरि कीर्तिताः।
फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥ ८५ ॥
धातुस्तयोर्धर्मभेदे सकर्मक उदाहृतः।
गौणे कर्मणि दुह्वादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् ॥ ८६ ॥
बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया।
प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयो मताः ॥ ८७ ॥
विप्रवर! वही धातु यदि अकर्मक हो तो उससे 'भाव' और 'कर्ता' में प्रत्यय कहे गये हैं।
सभी धातुओंके फल और व्यापार—ये दो अर्थ हैं। ये दोनों जहाँ एकमात्र कर्तामें ही मौजूद हों, उन धातुओंको अकर्मक कहते हैं। जैसे—भू-धातुका अर्थ सत्ता है। सत्ताका तात्पर्य है—आत्मधारणानुकूल व्यापार। इसमें आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापार दोनों केवल कर्तामें ही स्थित हैं; अतः भू-धातु अकर्मक है।
जहाँ फल और व्यापार दोनों भिन्न-भिन्न धर्मोंमें स्थित हों, वहाँ धातुको सकर्मक माना गया है। जैसे—'पच्' धातुका अर्थ है—विक्लेत्त्यनुकूल व्यापार (चावल आदिको गलानेके अनुरूप प्रयत्न)। इसमें विक्लेत्ति (गलना) यह फल है, जो चावलमें होता है और इसके अनुकूल जो चूल्हेमें आग जलाने आदिका व्यापार है, वह कर्तामें है; अतः 'पच्' धातु सकर्मक हुआ है। 'दुह' आदि* धातुओंके दो कर्म होते हैं। यथा—'गां दोग्धि पयः' (गायसे दूध दुहता है)—इसमें गाय गौण कर्म है और दूध प्रधान कर्म। दुह आदि धातुओंके गौण कर्ममें ही प्रत्यय होता है। यथा—'गौर्दुह्यते पयः, बलिर्याच्यते वसुधाम्' इत्यादि। नी, हृ, कृष् और वह्—इन चार धातुओंके प्रधान कर्ममें प्रत्यय होता है। यथा—'अजां ग्रामं नयति'—इस वाक्यमें अजा प्रधान कर्म और ग्राम गौण कर्म है। प्रधान कर्ममें प्रत्यय होनेपर वाक्यका स्वरूप इस प्रकार होगा—'अजा ग्रामं नीयते।' ज्ञानार्थक और भक्षणार्थक धातुओंके एवं शब्दकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनसे प्रधान या अप्रधान किसी भी कर्ममें अपनी इच्छाके अनुसार प्रत्यय कर सकते हैं। यथा—'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम् इति वा।' अन्य गत्यर्थक एवं अकर्मक धातुओंके ण्यन्त होनेपर उनके प्रयोज्य कर्ममें लकार आदि प्रत्यय माने गये हैं। यथा—'मासमास्यते माणवकः' ॥ ८५-८७ ॥
फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः।
फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम् ॥ ८८ ॥
धातु फल और व्यापाररूप अर्थोंका बोधक होता है। जैसे—भू-धातु आत्मधारणरूप फल और तदनुकूल व्यापारका बोधक है। फल और व्यापार दोनोंका जो आश्रय है, उसमें अर्थात् कर्ता एवं कर्ममें (तथा भावमें भी) तिङ्-प्रत्यय होते हैं, फलमें व्यापारकी ही प्रधानता है, तिङर्थरूप जो फल है वह उस व्यापारका विशेषण होता है। जैसे—'पचति'—इस क्रियाद्वारा चावल आदिके गलनेका प्रतिपादन होता है। यहाँ विक्लेत्तिरूप फलके अनुकूल जो अग्निप्रज्वालन और फूत्कारादि व्यापार हैं, उनके आश्रयभूत कर्तामें प्रत्यय हुआ है। 'ओदनः पच्यते' इत्यादिमें फलाश्रयभूत कर्ममें
*दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्—ये दुह् आदिके अन्तर्गत हैं, इनके दो कर्म होते हैं। इसी प्रकार नी, हृ, कृष् और वह्—इनके भी दो कर्म होते हैं।