भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 255
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २५३

तिङ् प्रत्यय होनेके कारण ओदनमें प्रथमा विभक्ति है॥८८॥
एधितव्यमेधनीयमिति कृत्ये निदर्शनम्।
भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः॥८९॥
कर्ता कारक इत्याद्या भूते भूतादि कीर्तितम्।
गम्यादि गम्ये निर्दिष्टं शेषमद्यतने मतम्॥९०॥
(अब कृदन्त-प्रकरण प्रारम्भ करते हैं—कृत्-प्रत्यय जिसके अन्तमें हो, वह कृदन्त है। ण्वुल्, तृच्, अच् आदि प्रत्यय 'कृत्' कहलाते हैं। कृत्-प्रत्ययोंमेंसे जो कृत्य, क्त और खलर्थ प्रत्यय हैं, वे केवल भाव और कर्ममें ही होते हैं। तव्यत्, तव्य, अनीयर्, केलिमर् आदि प्रत्यय कृत्य कहलाते हैं। घञ् आदि प्रत्यय भाव, करण और अधिकरणमें होते हैं। सामान्यतः कृत्-प्रत्यय 'कर्ता' में प्रयुक्त होते हैं। यहाँ पहले कृत्य प्रत्ययोंके उदाहरण देते हैं—) एधितव्यम् और एधनीयम्—ये कृत्य प्रत्ययके उदाहरण हैं। 'कृत्य' भाव और कर्ममें तथा 'कृत्' कर्तामें बताये गये हैं। 'त्वया मया अन्यैश्च एधितव्यम्', यहाँ भावमें तव्य और अनीयर् प्रत्यय हुए हैं। कर्ममें प्रत्ययका उदाहरण इस प्रकार समझना चाहिये। 'छात्रेण पुस्तकं पठनीयम्' 'ग्रन्थः पठितव्यः' इत्यादि कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्तामें तृतीया विभक्ति और कर्ममें प्रथमा विभक्ति हुई है। कर्ता, कारकः इत्यादि 'कृत्' प्रत्ययके उदाहरण हैं। यथा— 'रामः कर्ता' 'ब्रह्मा कारकः' यहाँ कर्तामें 'तृच्' और 'ण्वुल्' प्रत्यय हुए हैं। 'वु'के स्थानमें अक् आदेश होता है। ण्, ल्, च् आदिकी इत्संज्ञा होती है। 'क्त' और 'क्तवतु' ये प्रत्यय भूतकालमें होते हैं। यथा—'भूतः भूतवान्' इत्यादि; और 'गम्य' आदि शब्द भविष्यत् अर्थमें निर्दिष्ट हुए हैं। शेष शब्द वर्तमान कालमें प्रयुक्त होने योग्य माने गये हैं ॥८९-९०॥
अधिस्त्रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कीर्तितम्।
रामाश्रितस्तत्पुरुषे धान्यार्थो यूपदारु च॥९१॥
व्याघ्रभी राजपुरुषोऽक्षशौण्डो द्विगुरुच्यते।
पञ्चगवं दशग्रामी त्रिफलेति तु रूढितः॥९२॥
(अब समासका प्रकरण आरम्भ करते हैं—) समास चार प्रकारके माने गये हैं—अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वन्द्व। 'तत्पुरुष' का एक विशिष्ट भेद 'कर्मधारय' और कर्मधारयका एक विशिष्ट भेद 'द्विगु' है। भूतपूर्वः इत्यादि स्थलोंमें जो समास है, उसका कोई नाम नहीं निर्देश किया जा सकता। अतः उसे केवल समासमात्र जानना चाहिये। जिसमें प्रथम पद अव्यय हो, वह समास अव्ययीभाव होता है। अथवा अव्ययीभावके अधिकारमें जो समासविधायक वचन हैं, उनके अनुसार जहाँ समास हुआ है, वह अव्ययीभाव समास है। अव्ययीभाव अव्ययसंज्ञक होता है। अतः सभी विभक्तियोंमें उसका समान रूप है। अकारान्त अव्ययीभावमें विभक्तियोंका 'अम्' आदेश हो जाता है, परंतु पञ्चमी विभक्तिको छोड़कर ऐसा होता है। तृतीया और सप्तमीमें भी अम्भाव वैकल्पिक है। यथा अपदिशम्, अपदिशे इत्यादि। अधिस्त्रि और यथाशक्ति आदि पद अव्ययीभाव समासके अन्तर्गत बताये गये हैं। द्वितीयान्तसे लेकर सप्तम्यन्त तकके पद सुबन्तके साथ समस्त होते हैं और वह समास तत्पुरुष होता है। तत्पुरुषके उदाहरण इस प्रकार हैं—रामम्+आश्रितः=रामाश्रितः। धान्येन+अर्थः=धान्यार्थः यूपाय+दारु=यूपदारु। व्याघ्रात्+भीः= व्याघ्रभीः राज्ञः+पुरुषः=राजपुरुषः। अक्षेषु+शौण्डः=अक्षशौण्डः इत्यादि। जिसमें संख्यावाचक शब्द पूर्वमें हो, वह 'द्विगु' कहा गया है। 'पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम्।' 'दशानां ग्रामाणां समाहारः दशग्रामी (यहाँ स्त्रीलिङ्गसूचक 'ङीप्' प्रत्यय हुआ है)। 'त्रयाणां फलानां समाहारः त्रिफला' (इसमें स्त्रीत्वसूचक 'टाप्' प्रत्यय हुआ है)। त्रिफला-शब्द आँवले, हर्रे और बहेड़ेके लिये रूढ़ (प्रसिद्ध) है॥९१-९२॥