संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः। अब्राह्मणो नञि प्रोक्तः कुम्भकारादिकः कृतः ॥ ९३ ॥
समानाधिकरण तत्पुरुषकी 'कर्मधारय' संज्ञा होती है। उसके दोनों पद प्रायः विशेष्य-विशेषण होते हैं। विशेषणवाचक शब्दका प्रयोग प्रायः पहले होता है। 'नीलं च तत् उत्पलं च=नीलोत्पलम्, महती चासौ षष्ठी च=महाषष्ठी।' जहाँ 'न' शब्द किसी सुबन्तके साथ समस्त होता है, वह 'नञ् तत्पुरुष' कहलाता है। 'न ब्राह्मणः अब्राह्मणः' इत्यादि। कुम्भकार आदि पदोंमें 'उपपद तत्पुरुष' समास है ॥ ९३ ॥
अन्यार्थे तु बहुव्रीहौ ग्रामः प्राप्तोदको द्विज। पञ्चगू रूपवद्भार्यो मध्याह्नः ससुतादिकः ॥ ९४॥
विप्रवर! जहाँ अन्य अर्थकी प्रधानता हो, उस समासकी बहुव्रीहिमें गणना होती है। 'प्राप्तम् उदकं यं स प्राप्तोदको ग्रामः' (जहाँ जल पहुँचा हो, वह ग्राम 'प्राप्तोदक' है)। इसी तरह—'पञ्च गावो यस्य स पञ्चगुः। रूपवती भार्या यस्य स रूपवद्भार्यः।' मध्याह्नः-पद तत्पुरुष समास है। 'सुतेन सह आगतः ससुतः' आदि पद बहुव्रीहि समासके अन्तर्गत हैं ॥ ९४ ॥
समुच्चये गुरुं चेशं भजस्वान्वाचये त्वट। भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोर्भवेत् ॥ ९५ ॥
चार्थमें द्वन्द्व समास होता है। 'च' के चार अर्थ हैं—समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग और समाहार। परस्पर निरपेक्ष अनेक पदोंका एकमें अन्वय होना 'समुच्चय' कहलाता है। समुच्चयमें 'ईशं गुरुं च भजस्व' यह वाक्य है। इसमें ईश और गुरु दोनों स्वतन्तरूपसे 'भज' इस क्रियापदसे अन्वित होते हैं। ईश-पदका क्रियाके साथ अन्वय हो जानेपर पुनः क्रियापदकी आवृत्ति करके गुरुपदका भी उसमें अन्वय होता है। यही उन दोनोंकी निरपेक्षता है। समास साकाङ्क्ष पदोंमें होता है। अतः समुच्चय-वाक्यमें द्वन्द्व समास नहीं होता है। जहाँ एक प्रधान और दूसरा अप्रधानरूपसे अन्वित हो, वहाँ अन्वाचय होता है—जैसे 'भिक्षामट गाञ्चानय' इस वाक्यमें भिक्षाके लिये गमन प्रधान है और गौका लाना अप्रधान या आनुषङ्गिक कार्य है। अतः एकार्थीभावरूप सामर्थ्य न होनेसे अन्वाचयमें भी द्वन्द्व समास नहीं होता। समुच्चय और अन्वाचयमें वाक्यमात्रका ही प्रयोग होता है ॥ ९५ ॥
इतरेतरयोगे तु रामकृष्णौ समाहृतौ। रामकृष्णं द्विज द्वौ द्वौ ब्रह्म चैकमुपास्यते ॥ ९६ ॥
उद्भूत अवयव-भेद-समूहरूप परस्पर अपेक्षा रखनेवाले सम्मिलित पदोंका एकधर्मावच्छिन्नमें अन्वय होना इतरेतरयोग कहलाता है। अतः इसमें सामर्थ्य होनेके कारण समास होता है, यथा—'रामकृष्णौ भज' इस वाक्यमें 'रामश्च कृष्णश्च=रामकृष्णौ' इस प्रकार समास है। इतरेतरयोग द्वन्द्वमें समस्यमान पदार्थगत संख्याका समुदायमें आरोप होता है। इसलिये वहाँ द्विवचनान्त या बहुवचनान्तका प्रयोग देखा जाता है। समूहको समाहार कहते हैं। वहाँ अवयवगत भेद तिरोहित होता है। यथा—'रामश्च कृष्णश्चेत्यनयोः समाहारः रामकृष्णम्।' समाहार द्वन्द्वमें अवयवगत संख्या समुदायमें आरोपित नहीं होती। इसलिये एकत्व-बुद्धिसे एकवचनान्तका प्रयोग किया जाता है। समाहारमें नपुंसकलिङ्ग होता है। विप्रवर! इतरेतरयोगमें राम और कृष्ण दोनों दो हैं और समाहारमें उनकी एकता है, इसलिये कि ब्रह्मरूपसे उन्हें एक मानकर उनकी उपासना की जाती है ॥ ९६ ॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे व्याकरणनिरूपणं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥