भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 257
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | २५५ ---|---

निरुक्त-वर्णन

सनन्दनजी कहते हैं—अब मैं निरुक्तका वर्णन करता हूँ, जो वेदका कर्णरूप उत्तम अङ्ग है। यह वैदिक धातुरूप है, इसे पाँच प्रकारका बताया गया है॥ १॥ उसमें कहीं वर्णका आगम होता है, कहीं वर्णका विपर्यय होता है, कहीं वर्णोंका विकार होता है और कहीं वर्णका नाश माना गया है॥ २॥ नारद ! जहाँ वर्णोंके विकार अथवा नाशद्वारा जो धातुके साथ विशेष अर्थका प्रकाशक संयोग होता है, वह पाँचवाँ उत्तम योग कहा गया है॥ ३॥ वर्णके आगमसे 'हंसः'१ पदकी सिद्धि होती है। वर्णोंके विपर्यय (अदल-बदल)—से 'सिंहः'२ पद सिद्ध होता है। वर्णविकारसे 'गूढोत्मा'३ की सिद्धि होती है। वर्णनाशसे 'पृषोदरः'४ सिद्ध होता है॥ ४॥ 'भ्रमर'५ आदि शब्दोंमें पाँचवाँ योग समझना चाहिये। वेदोंमें लौकिक नियमोंका विकल्प या विपर्यय कहा गया है। यहाँ 'पुनर्वसु'६ पदको उदाहरणके रूपमें रखना चाहिये॥ ५॥ 'नभस्वत्'-में 'वत्' प्रत्यय परे रहते भसंज्ञा हो जानेसे 'स'का रुत्व नहीं हुआ। (वार्तिक भी है—'नभोऽङ्गिरोमनुषां वत्युपसंख्यानम्') 'वृषन् अश्वो यस्य सः' इस विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर 'वृषन्+अश्वः' इस अवस्थामें अन्तर्वर्तिनी विभक्तिका आश्रय लेकर पदसंज्ञा करके नकारका लोप प्राप्त था, किंतु 'वृषण्वश्वयोः' इस वार्तिकके नियमानुसार भसंज्ञा हो जानेसे न लोप नहीं हुआ; अतः 'वृषणश्वः' यही वैदिक प्रयोग है। (लोकमें 'वृषाश्वः' होता है।) कहीं-कहीं आत्मनेपदके स्थानमें परस्मैपदका प्रयोग होता है। यथा—'प्रतीपमन्य ऊर्मिर्युध्यति' यहाँ 'युध्यते' होना चाहिये, किंतु परस्मैपदका प्रयोग किया गया है। 'प्र' आदि उपसर्ग यदि धातुके पहले हों तो उनकी उपसर्ग एवं गतिसंज्ञा होती है; किंतु वेदमें वे धातुके बादमें या व्यवधान देकर प्रयुक्त होनेपर भी 'उपसर्ग' एवं 'गति' कहलाते हैं—यथा 'हरिभ्यां याह्योक आ। आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि।' यहाँ 'आयाहि' के अर्थमें 'याहि+आ' का व्यवहित तथा पर प्रयोग है। दूसरे उदाहरणमें आ+याहिके बीचमें बहुत-से पदोंका व्यवधान है॥ ६॥ वेदमें विभक्तियोंका विपर्यास देखा जाता है, जैसे—'दध्ना जुहोति'; यहाँ 'दधि' शब्द 'हु' धातुका कर्म है, उसमें द्वितीया होनी चाहिये, किंतु 'तृतीया च होश्छन्दसि' इस नियमके अनुसार कर्ममें तृतीया हो गयी है। 'अभ्युत्साद्यामकः' इसमें अभि+उत्पूर्वक 'सद्' धातुसे लुङ् लकारमें 'आम्' और 'अक'-का अनुप्रयोग हुआ है (लोकमें 'अभ्युदषीषदत्' रूप बनता है)। 'मा त्वाग्निर्ध्वनयीत्' इसमें 'नोनयति ध्वनय०' इत्यादि वैदिक सूत्रके द्वारा च्लिके चङ्भावका निषेध होता है। माङ्के योगमें 'अट्


१. 'हन्तीति हंसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार हन्-धातुके आगे ('वृत्तॄवदिहनि०' इत्यादि उणादि सूत्रसे) 'स'का आगम होनेसे 'हंस' शब्द बनता है। २. 'हिंसि हिंसायाम्' इस धातुसे 'हिनस्तीति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार कर्त्रर्थमें अच् प्रत्यय करनेपर पहले 'हिंसः' बनता है, फिर 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्'के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'स' और 'स' के स्थानमें 'ह' आ जानेसे 'सिंहः' पद सिद्ध होता है। ३. 'गूढ+आत्मा' इस अवस्थामें 'आ' विकृत हो 'उ' के रूपमें परिणत हुआ और गुण होनेसे 'गूढोत्मा' बना। (एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते)। ४. 'पृषोदरः' में 'पृषद्+उदरः' यह पदच्छेद है। 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्'के आदेशानुसार यहाँ तकारका लोप (नाश) हुआ तथा गुण होनेसे 'पृषोदरः' सिद्ध हुआ है। ५. 'भ्रमतीति भ्रमरः' यहाँ 'भ्रमु अनवस्थाने'से 'अर्तिकमिश्रमिचमिदेविवाशिभ्यश्चित्' इस उणादि सूत्रके अनुसार 'अर' प्रत्यय होनेसे 'भ्रमर' शब्द सिद्ध होता है। किन्हीं विद्वानोंके मतमें 'भ्रमन् रौति' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'भ्रमर' शब्द बनता है। इसमें 'भ्रम्+अतृ+रु+अच्' इस अवस्थामें 'तृ'का लोप 'रु'में उका लोप करनेसे 'भ्रमर'की सिद्धि होती है। ६. लौकिक प्रयोगमें 'पुनर्वसु' शब्द नित्य द्विवचनान्त है, किंतु वेदमें 'छन्दसि पुनर्वस्वोरेकवचनम्'के नियमानुसार इसका एकवचनान्त प्रयोग भी होता है।