संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 770 में से
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दूसरेसे भिन्न लक्षण लक्षित होते हों, वह विषम^१ वृत्त है ॥८॥ एक अक्षरके पादसे आरम्भ करके एक-एक अक्षर बढ़ाते हुए जबतक छब्बीस अक्षरका पाद पूरा हो तबतक पृथक्-पृथक् छन्द बनते हैं। छब्बीस अक्षरसे अधिकका चरण होनेपर चण्डवृष्टिप्रपात आदि दण्डक^२ बनते हैं। तीन या छः पादोंसे गाथा^३ होती है। अब क्रमशः एकसे छब्बीस अक्षरतकके पादवाले छन्दोंकी संज्ञा सुनो ॥९-१०॥ उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, अष्टि, अत्यष्टिधृति, विधृति (या अतिधृति), कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अतिकृति या अभिकृति तथा उत्कृति^४ ॥११-१३॥ ये छन्दोंकी
नगण, १ रगण और १ यगण हैं और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणमें एक-से लक्षणवाले तेरह-तेरह अक्षर हैं। इनमें १ नगण, २ जगण, १ रगण और १ गुरु हैं।
अर्धसम वृत्तोंमें 'पुष्पिताग्रा' के अतिरिक्त हरिणप्लुता तथा वैतालीय या वियोगिनी आदि और भी अनेक छन्द होते हैं। वैतालीय अथवा वियोगिनीके प्रथम और तृतीय चरणोंमें २ सगण, १ जगण और १ गुरु होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरणोंमें १ सगण, १ भगण, १ रगण, १ लघु और १ गुरु होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।
उदाहरण—
IIS I I S IS I S IISS IIS I S IS
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परां न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥
'हरिणप्लुता' (में विषम पादोंमें ३ सगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं और सम पादोंमें १ नगण, २ भगण और १ रगण होते हैं। इसके दूसरे, चौथे पाद द्रुतविलम्बितके ही समान हैं।)
उदाहरण—
IIS IIS IIS IS I IIS IIS IIS IS
स्फुटफेनचया हरिणप्लुता वलिमन्नोजतटा तरणेः सुता।
कलहंसकुलारवशालिनी विहरतो हरति स्म हरेर्मनः॥
१. विषम वृत्तका उदाहरण—
नलिनेक्षणं शशिमुखं च रुचिरदशनं घनच्छविम्। चारुचरणकमलं कमलाञ्चितमाव्रज व्रजमहन्द्रनन्दनम्॥
(—इस 'उद्गता' नामक छन्दमें चारों चरणोंके भिन्न-भिन्न लक्षण हैं। इसके प्रथम पादमें स, ज, स, ल; २ में न, स, ज, ग; ३ में भ, न, ज, ल, ग और ४ में स, ज, स, ज, ग होते हैं।)
२. छब्बीस अक्षरोंसे अधिकका एक-एक चरण होनेपर जो छन्द बनता है उसे, 'दण्डक' कहते हैं। सत्ताईस अक्षरोंके दण्डकका नाम 'चण्डवृष्टिप्रपात' है। इसमें दो 'नगण' और सात 'रगण' होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।
उदाहरण—
इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी
त्रिदशविजयिवीर्यदृप्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण संसेविते।
जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदास्पर्शपूताश्रमे
भुवननमितपादपद्माभिधानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥
३.आचार्य पिङ्गलके मतमें पिङ्गल सूत्रोंमें जिनके नामका उल्लेख नहीं हुआ है, ऐसे छन्दोंकी 'गाथा' संज्ञा है। यहाँ मूलमें तीन पाद या छः पादके छन्दोंको 'गाथा' कहा गया है। अतः उसके किसी विशेष लक्षण या उदाहरणका उल्लेख नहीं किया गया।
४. (१) जिसके प्रत्येक चरणमें एक-एक अक्षर हो, उस छन्दका नाम 'उक्ता' है। इसके दो भेद होते हैं। पहला गुरु अक्षरोंसे बनता है, दूसरा लघु अक्षरोंसे। गुरु अक्षरोंसे जो छन्द बनता है, उसका नाम पिङ्गलाचार्यने 'श्री' रखा है। उदाहरण— 'विष्णुं वन्दे।' लघु अक्षरोंवाले उक्ता छन्दका उदाहरण 'हरिरिह' समझना चाहिये।
(२) जिसके प्रत्येक चरणमें दो-दो अक्षरोंकी संयोजना हो, वह 'अत्युक्ता' नामक छन्द है। प्रस्तारसे इसके चार भेद हो सकते हैं। यहाँ विस्तार-भयसे केवल एक प्रथम भेद 'स्त्री' का उदाहरण दिया जाता है। दो गुरु अक्षरोंवाले चार पदोंसे जो छन्द बनता है, उसको 'स्त्री' कहते हैं।