संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९७
उदाहरण— $SS 'अन्यस्त्रीभिः सङ्गस्त्याज्यः।'
(३) तीन-तीन अक्षरोंके चार पादोंसे ‘मध्या’ नामक छन्द बनता है। प्रस्तारसे उसके भेदोंकी संख्या आठ होती है। इसके प्रथम भेदका, जिसमें तीनों अक्षर गुरु होते हैं, आचार्य पिङ्गलने 'नारी' नाम नियत किया है। उदाहरण— SSS १-'सर्वासां नारीणाम्। भर्ता स्यादाराध्यः॥' S ।S २-'प्राणतः प्रेयसी। राधिका श्रीपतेः॥' यह दूसरा उदाहरण मध्याका तृतीय भेद है। इसे 'मृगी' छन्द कहते हैं। इसके प्रत्येक चरणमें एक-एक रगण होता है। (४) चार-चार अक्षरोंके चार पादवाले छन्द-समूहका नाम 'प्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके सोलह भेद होते हैं। इसके प्रथम भेदका नाम 'कन्या' है। उदाहरण पढ़िये— S S S S भास्वत्कन्या सैका धन्या। यस्याः कूले कृष्णोऽखेलत् ॥ (५) पाँच-पाँच अक्षरके चार पादवाले छन्दसमुदायका नाम 'सुप्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके बत्तीस भेद होते हैं। इनमें सातवाँ भेद 'पंक्ति' है, उसे यहाँ बतलाया जाता है। भगण तथा दो गुरु अक्षरोंसे पंक्ति छन्दकी सिद्धि होती है। उदाहरण— S । । S S कृष्णसनाथा तूर्णकंपक्तिः। यामुनकच्छे चारु चचार ॥ (६) जिसके चारों चरणोंमें छः-छः अक्षर हों, उस छन्द-समूहका नाम गायत्री है। प्रस्तारसे इसके चौंसठ भेद होते हैं। इसके प्रथम भेदका नाम विद्युल्लेखा, तेरहवें भेदका नाम तनुमध्या, सोलहवेंका नाम शशिवदना तथा उन्तीसवेंका नाम वसुमती है। यहाँ केवल इन्हीं चरणोंका उल्लेख किया जाता है। दो मगण (S S S S S S) होनेसे विद्युल्लेखा, एक तगण (SS।) और एक यगण (। S S) होनेसे तनुमध्या, एक नगण (।।।) और एक यगण (। S S) होनेसे शशिवदना तथा एक तगण (S S ।) और एक सगण (।।S) होनेसे वसुमती नामक छन्द बनता है। उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं— 'विद्युल्लेखा'— SSSSSS गोगोपीगोपानां प्रेयांसं प्राणेशम्। विद्युल्लेखावस्त्रं वन्देऽहं गोविन्दम् ॥ 'तनुमध्या'— S S ।।SS प्रीत्या प्रतिवेलं नानाविधखेलम्। सेवे गततन्द्रं वृन्दावनचन्द्रम् ॥ 'शशिवदना'— ।।।।SS परममुदारं विपिनविहारम्। भज प्रतिपालं व्रजपतिबालम् ॥ 'वसुमती'— SS।।।S भक्तार्तिकदनं संसिद्धिसदनम्। नौमीन्दुवदनं गोविन्दमधुना ॥ (७) सात-सात अक्षरोंके चार पादवाले छन्दसमुदायको 'उष्णिक्' कहा गया है, प्रस्तारसे इसके एक सौ अट्ठाईस भेद होते हैं। इनमेंसे पचीसवाँ भेद 'मदलेखा' और तीसवाँ भेद 'कुमारललिता' के नामसे प्रसिद्ध है। मगण, सगण तथा एक गुरु—इन सात अक्षरोंसे 'मदलेखा' तथा जगण, सगण और एक गुरुसे 'कुमारललिता' छन्दकी सिद्धि होती है। प्रथमका उदाहरण यों है— SS S।।SS SSS।।SS$ रङ्गे बाहुविरुग्णाद् दन्तीन्द्रान्मदलेखा। लग्नाभून्मुरशत्रौ कस्तूरीरसचर्चा ॥