भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 770 में से

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पृष्ठ 400

३९८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


(८) आठ अक्षरवाले चार पदोंसे जो छन्द बनते हैं, उनकी जातिवाचक संज्ञा 'अनुष्टुप्' है। प्रस्तारसे अनुष्टुप्के दो सौ छप्पन भेद होते हैं। इसके विद्युन्माला, माणवकाक्रीड, चित्रपदा, हंसरुत, प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी, समानिका, श्लोक तथा वितान आदि अनेक भेद-प्रभेद हैं। श्लोक-छन्दके प्रत्येक चरणमें छठा अक्षर गुरु और पाँचवाँ लघु होता है। प्रथम और तृतीय चरणोंमें सातवाँ अक्षर दीर्घ होता है तथा द्वितीय तथा चतुर्थ चरणोंमें वह ह्रस्व हुआ करता है। शेष अक्षरोंका विशेष नियम न होनेसे इस श्लोक-छन्दके भी बहुत-से अवान्तर भेद हो जाते हैं। उपर्युक्त छन्दोंमें विद्युन्माला अनुष्टुप्का प्रथम भेद है; क्योंकि उसमें सभी अक्षर गुरु होते हैं। इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी छियासीवाँ भेद है। इसमें जगण, रगण १ लघु तथा १ गुरु होते हैं। प्रमाणिका और समानिकाके सिवा अनुष्टुप्के जितने भेद हैं, वे सब वितानके अन्तर्गत माने जाते हैं। यहाँ विद्युन्माला, नगस्वरूपिणी, श्लोक (अनुष्टुप्) तथा माणवकाक्रीडका एक-एक उदाहरण दिया जाता है—

'विद्युन्माला'— ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानोत्पन्नं निःसामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाङ्क्षेत् ॥

'नगस्वरूपिणी'— शिवताण्डवस्तोत्र 'नगस्वरूपिणी' छन्दमें ही लिखा गया है। उसके एक-एक पद्यमें दो-दो नगस्वरूपिणी छन्द आ गये हैं। कुछ लोग उस संयुक्तछन्दको 'पञ्चचामर' आदि नाम देते हैं। इसमें ज. र. ज. र. ज. और १ गुरु होते हैं। उदाहरण यह है— । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ । ऽ जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

'श्लोक' — यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

माणवकाक्रीडमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु होते हैं। जैसे— ऽ ।। ऽ ऽ ।। ऽ आदिगतं तुर्यगतं पञ्चमकं चान्त्यगतम्। स्याद् गुरु चेत् तत् कथितं माणवकाक्रीडमिदम्॥

(९) नौ-नौ अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमूहका नाम 'बृहती' है। प्रस्तारसे इसके पाँच सौ बारह भेद होते हैं। इसके 'हलमुखी' (१ रगण १ नगण १ सगण) तथा 'भुजङ्गशिशुभृता' (२ नगण १ भगण) भेद यहाँ बतलाये जाते हैं। इनमें एक तो २५१ वाँ भेद है और दूसरा ६४ वाँ। उदाहरण क्रमशः यों हैं— ऽ । ऽ ।। ।।। ऽ १—हस्तयोर्मधुरमुरलीं धारयन्नधरशयने। सन्निवेश्य रवममृतं संसृजञ्जयति स हरिः ॥ ।।।। ।। ऽऽऽ २—प्रणमत नयनारामं विकचकुवलयश्यामम्। अधहरयमुनानीरे भुजगशिरसि नृत्यन्तम्॥

(१०) दस अक्षरके पादवाले छन्द-समुदायको 'पङ्क्ति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके १०२४ भेद होते हैं। इसके शुद्धविराट्, पणव, रुक्मवती, मयूरसारिणी, मत्ता, मनोरमा, हंसी, उपस्थिता तथा चम्पकमाला आदि अनेक अवान्तर भेद हैं। शुद्धविराट् पङ्क्तिका ३४५ वाँ भेद है। यहाँ शुद्धविराट् (मगण, सगण, जगण, १ गुरु) तथा चम्पकमालाके उदाहरण दिये जाते हैं— ऽऽ ऽ ।। ऽ । ऽ । ऽ विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा। सर्वेषां प्रपितामहो गुरुर्ब्रह्मा शुद्धविराट् पुनातु नः॥

'चम्पकमाला' के प्रत्येक पादमें भगण, मगण, सगण और एक गुरु होते हैं तथा पाँच-पाँच अक्षरोंपर विराम होता है। प्रत्येक चरणमें इसके अन्तिम अक्षरको कम कर देनेसे 'मणिबन्ध' छन्द हो जाता है।

उदाहरण— ऽ । ऽ ऽऽ ।। ऽऽ सौम्य गुरु स्यादाद्यचतुर्थं पञ्चमषष्ठं चान्त्यमुपान्त्यम्। इन्द्रियबाणैर्यत्र विरामः सा कथनीया चम्पकमाला॥