भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 770 में से

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पृष्ठ 481
  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४७९

पूजित विशिष्ट रूपधारी भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे।

मध्याह्नकालिक ध्यान

लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्य-
स्थितं सान्द्रमेघप्रभं सुन्दराङ्गम्।
शिखण्डिच्छदापीडमब्जायताक्षं
लसच्चिल्लिकं पूर्णचन्द्राननं च॥
चलत्कुण्डलोल्लासिगण्डस्थलश्री-
भरं सुन्दरं मन्दहासं सुनासम्।
सुकार्त्तस्वराभाम्बरं दिव्यभूषं
क्वणत्किङ्किणीजालमाप्तानूलेपम् ॥
वेणुं धमन्तं स्वकरे दधानं
सव्ये दरं यष्टिमुदारवेषम्।
दक्षे तथैवेप्सितदानदक्षं
ध्यात्वार्चयेन्नन्दजमिन्दिराप्त्यै ॥
(ना० पूर्व० ८०। ८३-८५)

सुन्दर है, जो मयूरपिच्छका मुकुट धारण करते हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान विशाल हैं, भौंहोंका मध्यभाग शोभासम्पन्न है और मुख पूर्ण चन्द्रमाको भी लज्जित कर रहा है, हिलते और झलमलाते हुए कमनीय कुण्डलोंसे उल्लसित कपोलोंपर जो शोभाकी राशि धारण करते हैं, जिनकी नासिका मनोहर है, जो मन्द-मन्द हँसते हुए बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं; जिनका वस्त्र तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् और आभूषण दिव्य हैं, कटिभागमें धारण की हुई जिनकी क्षुद्र घण्टिकाओंसे मधुर झनकार हो रहा है, जिन्होंने दिव्य अङ्गराग धारण किया है, जो अपने हाथमें लेकर मुरली बजा रहे हैं, जिनके बायें हाथमें शङ्ख और दाहिने हाथमें छड़ी है, जिनकी वेश-भूषासे उदारता टपक रही है, जो मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेमें दक्ष हैं, उन नन्दनन्दन श्रीकृष्णका ध्यान करके लक्ष्मीप्राप्तिके लिये उनका पूजन करे।'

'जो सुन्दर गोप, गोपाङ्गनाओं तथा गौओंके मध्य विराजमान हैं, स्निग्ध मेघके समान जिनकी श्याम छवि है, जिनका एक-एक अङ्ग बहुत सुन्दर है...'

इस प्रकार ध्यान करके श्रेष्ठ वैष्णव पुरुष पूर्ववत् भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। पूआ, खीर तथा अन्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका नैवेद्य अर्पण करे। घृतयुक्त खीरकी एक सौ आठ आहुति देकर प्रत्येक दिशामें उसीसे बलि अर्पण करे। तत्पश्चात् आचमन करे। इसके बाद एक हजार आठ बार उत्तम मन्त्र-जप करे। जो उत्तम वैष्णव मध्याह्नकालमें इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है, उसे सब देवता प्रणाम करते हैं और वह मनुष्य सब लोगोंका प्रिय होता है। वह मेधा, आयु, लक्ष्मी तथा सुन्दर कान्तिसे सुशोभित होकर पुत्र-पौत्रोंके साथ अभ्युदयको प्राप्त होता है। तीसरे समयकी पूजामें कौन-सा काल है, इस विषयमें मतभेद है। कुछ विद्वान् इस पूजाको सायंकालमें करने योग्य बताते हैं और कुछ रात्रिमें। दशाक्षर-मन्त्रसे पूजा करनी हो तो रातमें