भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 770 में से

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पृष्ठ 482

४८० * संक्षिप्त नारदपुराण *

करे। अष्टादशाक्षरसे करनी हो तो सायंकालमें करे। कुछ दूसरे विद्वान् ऐसा भी कहते हैं कि दोनों प्रकारके मन्त्रोंसे दोनों ही समय पूजा करनी चाहिये।

सायंकालिक ध्यान

सायंकालमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीमें एक सुन्दर भवनके भीतर विराजमान हैं, जो विचित्र उद्यानसे सुशोभित है। वह श्रेष्ठ भवन आठ हजार गृहोंसे अलंकृत है। उसके चारों ओर निर्मल जलवाले सरोवर सुशोभित हैं। हंस, सारस आदि पक्षियोंसे व्याप्त कमल और उत्पल आदि पुष्प उन सरोवरोंकी शोभा बढ़ाते हैं। उक्त भवनमें एक शोभासम्पन्न मणिमय मण्डप है, जो उदयकालीन सूर्यदेवके समान अरुण प्रकाशसे प्रकाशित हो रहा है। उस मण्डपके भीतर सुवर्णमय कमलकी आकृतिका सुन्दर सिंहासन है, जिसपर त्रिभुवनमोहन श्रीकृष्ण बैठे हैं। उनसे आत्मतत्त्वका निर्णय करानेके लिये मुनियोंके समुदायने उन्हें सब ओरसे घेर रखा है। भगवान् श्यामसुन्दर उन मुनियोंको अपने अविनाशी परम धामका उपदेश दे रहे हैं। उनकी अङ्गकान्ति विकसित नीलकमलके समान श्याम है। दोनों नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं। सिरपर स्निग्ध अलकावलियोंसे संयुक्त सुन्दर किरीट सुशोभित है। गलेमें वनमाला शोभा पा रही है। प्रसन्न मुखारविन्द मनको मोहे लेता है। कपोलोंपर मकराकृति कुण्डल झलमला रहे हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। वहीं कौस्तुभमणि अपनी प्रभा बिखेर रही है। उनका स्वरूप अत्यन्त मनोहर है। उनका वक्षःस्थल केसरके अनुलेपसे सुनहली प्रभा धारण करता है। वे रेशमी पीताम्बर पहने हुए हैं, विभिन्न अङ्गोंमें हार, बाजूबंद, कड़े और करधनी आदि आभूषण उन्हें अलंकृत कर रहे हैं। उन्होंने पृथ्वीका भारी भार उतार दिया। उनका हृदय परमानन्दसे परिपूर्ण है तथा उनके चारों हाथ शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे सुशोभित हैं*।

इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान्‌की पूजा करे। हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र—इनके द्वारा प्रथम आवरण बनता है। रुक्मिणी आदि पटरानियोंद्वारा द्वितीय आवरण सम्पन्न होता है। तृतीय आवरणमें नारद, पर्वत, विष्णु, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन तथा सात्यकि हैं, इनका आठ दिशाओंमें और विनतानन्दन गरुड़का भगवान्‌के सम्मुख पूजन करे। चौथे


* सायाह्ने द्वारवत्यां तु चित्रोद्यानोपशोभिते । अष्टसाहस्रसंख्यातैर्भवनैरुपमण्डिते ॥
हंससारससंकीर्णकमलोत्पलशालिभिः । सरोभिर्निर्मलाम्भोभिः परीते भवनोत्तमे ॥
उद्यत्प्रद्योतनोध्दोतद्युतौ श्रीमणिमण्डपे । हेमाम्भोजासनासीनं कृष्णं त्रैलोक्यमोहनम् ॥
मुनिवृन्दैः परिवृतमात्मतत्त्वविनिर्णये । तेभ्यो मुनिभ्यः स्वं धाम दिशन्तं परमक्षरम् ॥