संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
पृष्ठ 483, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 483
- पूर्वभाग-तृतीय पाद * ४८१
| आवरणमें लोकपालोंके साथ और पाँचवें आवरणमें वज्र आदि आयुधोंके साथ उत्तम वैष्णव भगवत्पूजनका कार्य सम्पन्न करे। इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके खीरका नैवेद्य अर्पण करे। फिर जलमें खाँड़मिश्रित दूधकी भावना करके उस जलद्वारा तर्पण करे। उसके बाद मन्त्रोपासक पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए मूलमन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। तीनों कालकी पूजाओंमें अथवा केवल मध्याह्नकालमें ही होम करे। आसनसे लेकर विशेषार्घ्यपर्यन्त सम्पूर्ण पूजा पूरी करके विद्वान् पुरुष भगवान्की स्तुति और नमस्कार करे। फिर भगवान्को आत्मसमर्पण करके उनका विसर्जन करनेके पश्चात् अपने हृदयकमलमें उनकी स्थापना करे और तन्मय होकर पुनः आत्मस्वरूप भगवान्की पूजा करे। जो प्रतिदिन इस प्रकार सायंकालमें भगवान् वासुदेवकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर अन्तमें परम गतिको प्राप्त होता है।<br><br>रात्रिकालिक ध्यान<br>रात्रौ चेन्मदनाक्रान्तचेतसं नन्दनन्दनम्।<br>यजेद्रासपरिश्रान्तं गोपीमण्डलमध्यगम्॥<br>विकसत्कुन्दकह्ल्हारमल्लिकाकुसुमोद्गतैः ।<br>रजोभिर्धूसरैर्मन्दमारुतैः शिशिरीकृते॥<br>उन्मीलन्नवकैरवालिविगलन्माध्वीकलब्धान्तर-<br>भ्राम्यन्मत्तमिलिन्दगीतललिते सन्मल्लिकोज्जृम्भिते।<br>पीयूषांशुकैरैर्विशालितहरित्प्रान्ते स्मरोदीपने<br>कालिन्दीपुलिनाङ्गणे स्मितमुखं वेणुं रणन्तं मुहुः॥<br>अन्तस्तोयलसन्नवाम्बुदघटासंघट्टकारत्विषं | चञ्चच्चिल्लिकमम्बुजायतदृशं बिम्बाधरं सुन्दरम्।<br>मायूरच्छदबद्धमौलिविलसद्धम्मिल्लमालं चलद्-<br>दीप्तत्कुण्डलरत्नरश्मिविलसद्गण्डद्वयोद्भासितम् ॥<br>काञ्चीनूपुरहारकङ्कणलसत्केयूरभूषान्वितं<br>गोपीनां द्वितयान्तरे सुललितं वन्यप्रसूनस्रजम्।<br>अन्योन्यं विनिबद्धगोपदयितादोर्वल्लिवीतं लस-<br>द्रासक्रीडनलोलुपं मनसिजाक्रान्तं मुकुन्दं भजेत्॥<br>विविधश्रुतिभिन्नमनोज्ञतरस्वरसप्तकमूर्छनतानगणैः ।<br>भ्रममाणममूरुभिरुदारमणिस्फुटमण्डनशिञ्जितचारुतनम्॥<br>इतरेतरबद्धकरप्रमदागणकल्पितरासविहारविधौ ।<br>मणिशङ्कुगमप्यमुना वपुषाबहुधा विहितस्वकदिव्यतनुम्॥<br>(ना० पूर्व० ८०। १०७-११३)<br><br>‘रात्रिमें पूजन करना हो तो भगवान्का ध्यान इस प्रकार करे—भगवान् नन्दनन्दनने अपने हृदयमें प्रेमको आश्रय दे रखा है। वे रासक्रीड़ामें संलग्न हो मानो थक गये हैं और गोपाङ्गनाओंकी मण्डलीके मध्यभागमें विराज रहे हैं। उस समय यमुनाजीका पुलिन-प्राङ्गण अमृतमय किरणोंवाले चन्द्रदेवकी धवल ज्योत्स्नासे उद्भासित हो रहा है। वहाँका प्रान्त अत्यन्त हरा-भरा एवं भगवत्प्रेमका उद्दीपक हो रहा है। खिले हुए कुन्द, कह्लार और मल्लिका आदि कुसुमोंके परागपुञ्जसे धूसरित मन्द-मन्द वायु प्रवाहित होकर उस पुलिन-प्राङ्गणको शीतल बना रही है। खिले हुए नूतन कुमुदोंके मादक मकरन्दका पान करके उन्मत्त हृदयवाले भ्रमर इधर-उधर भ्रमण करते हुए मधुर गुञ्जारव फैला रहे हैं; जिससे वह वनप्रान्त अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। वहाँ सब ओर सुन्दर चमेलीकी |
उन्निद्रेन्दीवरश्यामं पद्मपत्रायतेक्षणम्। स्निग्धकुन्तलसम्भिन्नकिरीटवनमालिनम् ॥
चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम्। श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं सुमनोहरम्॥
काश्मीरकपिशोरस्कं पीतकौशेयवाससम्। हारकेयूरकटककटिसूत्रैरलङ्कृतम् ॥
हतविश्वम्भराभूरिभारं मुदितमानसम्। शङ्खचक्रगदापद्मराजद्धुजचतुष्टयम् ॥
(ना० पूर्व० ८०। ९२-९९)