संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें* पूर्वभाग-तृतीय पाद * ५०३
गोकुल जाते समय वसुदेवजीको मार्ग देनेके लिये यमुनाजीके जलका भेदन करनेवाले।
१५. व्रजवासी=व्रजमें निवास करनेवाले, १६. व्रजानन्दी=अपने शुभागमनसे सम्पूर्ण व्रजका आनन्द बढ़ानेवाले, १७. नन्दबालः=नन्दजीके पुत्र, १८. दयानिधिः=दयाके समुद्र, १९. लीलाबालः=लीलाके लिये बालरूपमें प्रकट, २०. पद्मनेत्रः=कमलसदृश नेत्रवाले, २१. गोकुलोत्सवः=गोकुलके लिये उत्सवरूप अथवा अपने जन्मसे गोकुलमें आनन्दोत्सवको बढ़ानेवाले, २२. ईश्वरः=सब प्रकारसे समर्थ।
२३. गोपिकानन्दनः=अपनी शैशवसुलभ चेष्टाओंसे यशोदा आदि गोपियोंको आनन्दित करनेवाले, २४. कृष्णः=सच्चिदानन्दस्वरूप अथवा सबको अपनी ओर खींचनेवाले, २५. गोपानन्दः=गोपोंके लिये मूर्तिमान् आनन्द, २६. सताङ्गतिः=साधु-महात्माओं तथा भक्तजनोंके आश्रय, २७. वकप्राणहरः=वकासुरके प्राण लेनेवाले, २८. विष्णुः=सर्वत्र व्यापक, २९. वकमुक्तिप्रदः=वकासुरको मोक्ष देनेवाले, ३०. हरिः=पाप, दुःख और अज्ञानको हर लेनेवाले।
३१. बलदोलाशयशयः=शेषस्वरूप बलरामरूपी हिंडोलेपर शयन करनेवाले, ३२. श्यामलः=श्यामवर्ण, ३३. सर्वसुन्दरः=पूर्ण सौन्दर्यके आश्रय, ३४. पद्मनाभः=जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ वे भगवान् विष्णु, ३५. हृषीकेशः=इन्द्रियोंके नियन्ता और प्रेरक, ३६. क्रीडामनुजबालकः=लीलाके लिये मनुष्य-बालकका रूप धारण किये हुए।
३७. लीलाविध्वस्तशकटः=अनायास ही चरणोंके स्पर्शसे छकड़ेको उलटकर उसमें स्थित असुरका नाश करनेवाले, ३८. वेदमन्त्राभिषेचितः=यशोदा मैयाकी प्रेरणासे बालारिष्टनिवारणके लिये ब्राह्मणोंद्वारा वेद-मन्त्रसे अभिषिक्त, ३९. यशोदानन्दनः=यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले, ४०. कान्तः=कमनीय स्वरूप, ४१. मुनिकोटिनिषेवितः=करोड़ों मुनियोंद्वारा सेवित।
४२. नित्यं मधुवनवासी=मधुवनमें नित्य निवास करनेवाले, ४३. वैकुण्ठः=वैकुण्ठधामके अधिपति विष्णु, ४४. सम्भवः=सबकी उत्पत्तिके स्थान, ४५. क्रतुः=यज्ञस्वरूप, ४६. रमापतिः=लक्ष्मीपति, ४७. यदुपतिः=यदुवंशियोंके स्वामी, ४८. मुरारिः=मुर दैत्यके नाशक, ४९. मधुसूदनः=मधु नामक दैत्यको मारनेवाले।
५०. माधवः=यदुवंशान्तर्गत मधुकुलमें प्रकट, ५१. मानहारी=अभिमान और अहंकारका नाश करनेवाले, ५२. श्रीपतिः=लक्ष्मीके स्वामी, ५३. भूधरः=शेषनागरूपसे पृथिवीको धारण करनेवाले, ५४. प्रभुः=सर्वसमर्थ, ५५. बृहद्वनमहालीलः=महावनमें बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले, ५६. नन्दसूनुः=नन्दजीके पुत्र, ५७. महासनः=अनन्त शेषरूपी महान् आसनपर विराजनेवाले।
५८. तृणावर्तप्राणहारी=तृणावर्त नामक दैत्यको मारनेवाले, ५९. यशोदाविस्मयप्रदः=अपनी अद्भुत लीलाओंसे यशोदा मैयाको आश्चर्यमें डाल देनेवाले, ६०. त्रैलोक्यवक्त्रः=अपने मुखमें तीनों लोकोंको दिखानेवाले, ६१. पद्माक्षः=विकसित कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, ६२. पद्महस्तः=हाथमें कमल धारण करनेवाले, ६३. प्रियङ्करः=सबका प्रिय कार्य करनेवाले।
६४. ब्रह्मण्यः=ब्राह्मण-हितकारी, ६५. धर्मगोप्ता=धर्मकी रक्षा करनेवाले, ६६. भूपतिः=पृथिवीके स्वामी, ६७. श्रीधरः=वक्षःस्थलमें लक्ष्मीको धारण करनेवाले, ६८. स्वराट्=स्वयंप्रकाश, ६९.अजाध्यक्षः=ब्रह्माजीके स्वामी, ७०. शिवाध्यक्षः=भगवान् शिवके स्वामी, ७१. धर्माध्यक्षः=धर्मके अधिपति, ७२. महेश्वरः=परमेश्वर।