भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 770 में से

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पृष्ठ 606
६०४* संक्षिप्त नारदपुराण *

हुआ है। स्त्रियोंके शरीरमें जो दो सुन्दर नेत्र स्थित हैं, वे वसा और मेदके सिवा और क्या हैं? छातीपर दोनों स्तनोंमें यह अत्यन्त ऊँचा मांस ही तो स्थित है। जघनदेशमें भी अधिक मांस ही भरा हुआ है। जिस योनिपर तीनों लोकोंके प्राणी मुग्ध रहते हैं, वह छिपा हुआ मूत्रका ही तो द्वार है। वीर्य और हड्डियोंसे भरा हुआ शरीर केवल मांससे ढका होनेके कारण कैसे सुन्दर कहा जा सकता है? मांस, मेद और चर्बी ही जिसका सार-सर्वस्व है, देहधारियोंके उस शरीरमें सार-तत्त्व क्या है? बताओ। विष्ठा, मूत्र और मलसे पुष्ट हुए शरीरमें कौन मनुष्य अनुरक्त होगा?' इस प्रकार ब्रह्माजीने ज्ञानदृष्टिसे बहुत विचार करके उस नारीसे कहा—'सुन्दरी ! जिस प्रकार मैंने मनसे तुम श्रेष्ठ वर्णवाली नारीकी सृष्टि की है, उसके अनुरूप ही तुम मनको उन्मत्त बना देनेवाली उत्पन्न हुई हो।'

तब उस नारीने चतुर्मुख ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा—'नाथ ! देखिये, योगियोंसहित समस्त चराचर जगत् मेरे रूपसे मोहित हो गया है; तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है, जो मुझे देखकर क्षुब्ध न हो जाय। कल्याणकी इच्छा रखनेवाले किसी पुरुषको अपनी स्तुति नहीं करनी चाहिये; तथापि कार्यके उद्देश्यसे मुझे अपनी प्रशंसा करनी पड़ी है। ब्रह्मन् ! आपने किसीके चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेके लिये ही मेरी सृष्टि की है; अतः जगन्नाथ ! उसका नाम बताइये, मैं निस्सन्देह उसको क्षुब्ध कर डालूँगी। देव ! पृथ्वीपर मुझे देखकर पहाड़ भी मोहित हो जायगा; फिर साँस लेनेवाले जङ्गम प्राणीके लिये तो कहना ही क्या? इसीलिये पुराणोंमें नारीकी ओर देखना, उसके रूपकी चर्चा करना मनुष्योंके लिये उन्मादकारी बतलाया गया है। वह कठिन-से-कठिन व्रतका भी नाश करनेवाला है। मनुष्य तभीतक सन्मार्गपर चलता रहता है, तभीतक इन्द्रियोंको काबूमें रखता है, तभीतक दूसरोंसे लज्जा करता है और तभीतक विनयका आश्रय लेता है, जबतक कि धैर्यको छीन लेनेवाले युवतियोंके नीली पाँखवाले नेत्ररूपी बाण हृदयमें गहरी चोट नहीं पहुँचाते। नाथ ! मदिराको तो जब मनुष्य पी लेता है, तब वह चतुर पुरुषके मनमें मोह उत्पन्न करती है; परंतु युवती नारी दूरसे दर्शन और स्मरण करनेपर ही मोहमें डालती है; अतः वह मदिरासे बढ़कर है'*।

ब्रह्माजीने कहा—देवि ! तुमने ठीक कहा है। तुम्हारे लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं है। ऐसी शक्ति रखनेवाली तुम सम्पूर्ण लोकोंके चित्तका अपहरण क्यों न करोगी। यह सत्य है कि तुम्हारा रूप सबको मोह लेनेवाला है। मैंने जिस उद्देश्यसे तुम्हारी सृष्टि की है, उसे सिद्ध करो। शुभे! वैदिश नगरमें रुक्माङ्गद नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं। उनकी पत्नीका नाम सन्ध्यावली है, जो रूपमें तुम्हारे ही समान है। उसके गर्भसे राजकुमार धर्माङ्गदका जन्म हुआ है, जो पितासे भी अत्यधिक प्रतापी है। उसमें एक लाख हाथीका बल है और प्रतापमें तो वह सूर्यके ही समान है। क्षमामें पृथिवीके और गम्भीरतामें वह समुद्रके समान है। तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित होता है। त्यागमें राजा बलि, गतिमें वायु, सौम्यतामें चन्द्रमा तथा रूपमें कामदेवके समान है। राजकुमार धर्माङ्गद राजनीतिमें बृहस्पति और शुक्राचार्यको भी परास्त करता है। वरानने ! पिताने केवल एक (अखण्ड) रूपमें समस्त जम्बूद्वीपका भोग किया है; किंतु धर्माङ्गदने अन्य द्वीपोंपर भी अधिकार प्राप्त कर लिया है। उसने माता-पिताके संकोचवश अभीतक स्त्रीसुखका


* पीतं हि मद्यं मनुजेन नाथ करोति मोहं सुविचक्षणस्य। स्मृता च दृष्टा युवती नरेण विमोहयेदेव सुराधिका हि॥
(ना० उत्तर० ७। ४०)

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