संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 607, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * | ६०५ ---|---
अनुभव नहीं किया। सहस्रों राजकुमारियाँ उसकी पत्नी होनेके लिये स्वयं आयीं, किंतु उसने सबको त्याग दिया। वह घरमें रहकर कभी पिताकी आज्ञाके पालनसे विचलित नहीं होता। चारुहासिनि! धर्माङ्गदके तीन सौ माताएँ हैं। वे सब-की-सब सोनेके महलोंमें रहती हैं। राजकुमार उन सबके प्रति समानरूपसे पूज्य दृष्टि रखता है। रुक्माङ्गदके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता है। वे पुत्ररत्नसे सम्पन्न हैं। मोहिनी! तुम उत्तम मन्दराचलपर उन्हीं नरेशके समीप जाओ और उन्हें मोहित करो। सुन्दरी! तुमने इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर लिया है, अतः देवि! तुम्हारे इस गुणके अनुरूप ही तुम्हारा 'मोहिनी' नाम होगा।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मोहिनी ब्रह्माजीको प्रणाम करके मन्दराचलकी ओर प्रस्थित हुई। तीसरे मुहूर्त (पाँचवीं घड़ी)-में वह पर्वतके शिखरपर जा पहुँची। मन्दराचल वह पर्वत है, जिसे पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने कच्छपरूपसे अपनी पीठपर धारण किया था और देवता तथा दानवोंने जिसके द्वारा क्षीरसागरका मन्थन किया था एवं जो महान् पर्वत भगवान्के कूर्म-शरीरसे रगड़ा जानेपर भी फूट न सका तथा जिसने क्षीरसागरमें पड़कर उसकी गहराई कितनी है, इसे स्पष्ट दिखा दिया। वह अनेक प्रकारके रत्नोंका घर तथा भाँति-भाँतिकी धातुओंसे सम्पन्न है। मन्दराचल देवताओंकी क्रीडा और विहारका स्थान है। तपस्वी मुनियोंकी तपस्याका वह प्रमुख साधन है। उसका मूलभाग ग्यारह हजार योजनतक नीचे गया है। इतना ही उसका विस्तार भी है और ऊँचाईमें भी उसका यही माप है। वह अपने सुवर्णमय तथा रत्नमय शिखरोंसे पृथ्वी और आकाशको प्रकाशित कर रहा है। मोहिनी उस मन्दराचलपर आ पहुँची। उसके अङ्गोंकी प्रभा भी स्वर्णके ही समान थी; अतः वह अपनी कान्तिसे स्वयं भी उस पर्वतके तेजको बढ़ा रही थी। वह राजा रुक्माङ्गदसे मिलनेकी इच्छा रखकर पर्वतकी एक विशाल शिलापर जा बैठी, जिसका विस्तार सात योजन था। वह दिव्य शिला नीली कान्तिसे सुशोभित थी। राजेन्द्र! उस शिलापर एक वज्रमय शिवलिङ्ग स्थापित था, जिसकी ऊँचाई दस हाथकी थी। वह 'वृषलिङ्ग' के नामसे विख्यात था और ऐसा जान पड़ता था, मानो महलके ऊपर सुन्दर सोनेका कलश शोभा पा रहा हो। द्विजवरो! मोहिनीने उस शिवलिङ्गके समीप ही उत्तम संगीत प्रारम्भ किया। वीणाकी झंकार और ताल-स्वरसे युक्त वह श्रेष्ठ गीत मानसिक क्लेशको दूर करनेवाला था। वह सुन्दरी शिवलिङ्गके अत्यन्त निकट होकर मूर्च्छना और तालके साथ गान्धारस्वरमें गीत गा रही थी। राजेन्द्र! उसका वह गान कामवेदनाको बढ़ानेवाला था। मुनीश्वरो! उस संगीतके प्रारम्भ होनेपर स्थावर जीवोंकी भी उसमें स्पृहा हो गयी। देवताओं तथा दैत्योंके समाजमें भी कभी वैसा मोहक संगीत नहीं हुआ था। मोहिनीके मुखसे निकला हुआ वह गान चित्तको मोह लेनेवाला था।
रुक्माङ्गद-धर्माङ्गद-संवाद, धर्माङ्गदका प्रजाजनोंको उपदेश और प्रजापालन तथा रुक्माङ्गदका रानी सन्ध्यावलीसे वार्तालाप
सौति कहते हैं— महाराज रुक्माङ्गदने मनुष्य-लोकके उत्तम भोग भोगते हुए नाना प्रकारसे पीताम्बरधारी भगवान् श्रीहरिकी आराधना की। विप्रगण! युद्धमें पराक्रमसे सुशोभित होनेवाले शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली और वैवस्वत यमको जीतकर यमलोकका मार्ग सूना कर