संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 630, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें६२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
अतः इन सब कुमारियोंका यह धर्मपूर्वक पाणिग्रहण करे। धर्मकी इच्छा रखनेवाले पिताको पुत्रका विवाह अवश्य कर देना चाहिये। जो पिता पुत्रोंको पत्नी और धनसे संयुक्त नहीं करता, उसे इस लोक और परलोकमें भी निन्दित जानना चाहिये। अतः पुत्रोंको स्त्री तथा जीवन-निर्वाहके योग्य धनसे सम्पन्न अवश्य कर देना चाहिये।'
राजाका यह वचन सुनकर पुरोहितजी बड़े प्रसन्न हुए और धर्माङ्गदका विवाह करानेके उद्योगमें लग गये। धर्माङ्गद युवा होनेपर भी लज्जावश स्त्री-सुखकी इच्छा नहीं रखते थे तथापि पिताके आदेशसे उन्होंने उस समय स्त्री-संग्रह स्वीकार कर लिया। तदनन्तर महाबाहु धर्माङ्गदने वरुण-कन्याके साथ, मनोहर नागकन्याओंके साथ भी विवाह किया, जो पृथ्वीपर अनुपम रूपवती थीं। शास्त्रीय विधिके अनुसार उन सबका विवाह करके धर्माङ्गदने ब्राह्मणोंको धन, रत्न तथा गौओंका प्रसन्नतापूर्वक दान किया। विवाहके पश्चात् उन्होंने माता और पिताके चरणोंमें हर्षके साथ प्रणाम किया। तदनन्तर राजकुमार धर्माङ्गदने अपनी माता संध्यावलीसे कहा—'देवि! पिताजीकी आज्ञासे मेरा वैवाहिक कार्य सम्पन्न हुआ है। मुझे दिव्य भोगों तथा स्वर्गसे भी कोई प्रयोजन नहीं है। पिताजीकी तथा तुम्हारी दिन-रात सेवा करना ही मेरा कर्तव्य है।'
संध्यावली बोली—'बेटा! तुम दीर्घकालतक सुखपूर्वक जीते रहो। पिताके प्रसादसे मनके अनुरूप भोगोंका उपभोग करो। वत्स! तुम-जैसे गुणवान् पुत्रके द्वारा मैं इस पृथ्वीपर श्रेष्ठ पुत्रवाली हो गयी हूँ और सपत्नियोंके हृदयमें मेरे लिये उच्चतम स्थान बन गया है।'
ऐसा कहकर माताने पुत्रको हृदयसे लगाकर बार-बार उसका मस्तक सूँघा। तत्पश्चात् उसे राजकाज देखनेके लिये विदा किया। माता संध्यावलीसे विदा लेकर राजकुमारने अन्य माताओंको भी प्रणाम किया और पिताकी आज्ञाके अधीन रहकर वे राज्यशासनका समस्त कार्य देखने लगे। वे दुष्टोंको दण्ड देते, साधु-पुरुषोंका पालन करते और सब देशोंमें घूम-घूमकर प्रत्येक कार्यकी देखभाल किया करते थे। सर्वत्र पहुँचकर प्रत्येक मासमें वहाँके कार्योंका निरीक्षण करते थे। उन्होंने हाथी और घोड़ोंके पालन-पोषणकी अच्छी व्यवस्था की थी। गुप्तचर-मण्डलपर भी उनकी दृष्टि रहती थी। इधर-उधरसे प्राप्त समाचारोंको वे देखते और उनपर विचार करते थे। प्रतिदिन माप और तौलकी भी जाँच करते रहते थे। राजा धर्माङ्गद प्रत्येक घरमें जाकर वहाँके लोगोंकी रक्षाका प्रबन्ध करते थे। उनके राज्यमें कहीं दूध पीनेवाला बालक माताके स्तन न मिलनेसे रोता हो, ऐसा नहीं देखा गया। सास अपनी पुत्रवधूसे अपमानित होकर कहीं भी रोती नहीं सुनी गयी। कहीं भी समर्थ पुत्र पितासे याचना नहीं करता था। उनके राज्यभरमें किसीके यहाँ वर्णसंकर संतानकी उत्पत्ति नहीं हुई। लोग अपना धन-वैभव छिपाकर नहीं रखते थे। कोई भी धर्मपर दोषारोपण नहीं करता था। सधवा नारी कभी भी बिना चोलीके नहीं रहती थी। उन्होंने यह घोषणा करायी थी कि 'मेरे राज्यमें स्त्रियाँ घरोंमें सुरक्षित रहें। विधवा केश न रखावे और सौभाग्यवती कभी केश न कटावे। जो दूसरोंको साधारणवृत्ति (जीवन-निर्वाहके लिये अन्न आदि) नहीं देता, वह निर्दयी मेरे राज्यमें निवास न करे। दूसरोंको सद्गुणोंका उपदेश देनेवाला पुरुष स्वयं सद्गुण-शून्य हो और ऋत्विग् यदि शास्त्रज्ञानसे वञ्चित हो तो वह मेरे राज्यमें निवास न करे। जो नीलका उत्पादन करता है अथवा जो नीलके रंगसे अधिकतर वस्त्र रँगा करता है, उन दोनोंको मेरे राज्यसे निकाल देना चाहिये। जो मदिरा बनाता है, वह भी यहाँसे निर्वासित होने योग्य ही है। जो मांस भक्षण करता है तथा जो अपनी स्त्रीका