भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 631
  • उत्तरभाग * ६२९

अकारण परित्याग करता है, उसका मेरे राज्यमें निवास न हो। जो गर्भवती अथवा सद्यःप्रसूता युवतीसे समागम करता है, वह मनुष्य मुझ-जैसे शासकोंके द्वारा दण्डनीय है।'


राजा रुक्माङ्गदका मोहिनीसे कार्तिकमासकी महिमा तथा चातुर्मास्यके नियम, व्रत एवं उद्यापन बताना

वसिष्ठजी कहते हैं—राजेन्द्र! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे एकादशी-व्रतका पालन करते हुए धर्माङ्गद इस पृथ्वीका राज्य करने लगे। उस समय उनके राज्यमें कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो धर्म-पालनमें तत्पर न हो। महीपते! कोई भी व्यक्ति दुःखी, संतानहीन अथवा कोढ़ी नहीं था। नरेश्वर! उस राज्यमें सब लोग हृष्ट-पुष्ट थे। पृथ्वी निधि देनेवाली थी, गौएँ बछड़ोंको दूध पिलाकर तृप्त रखतीं और एक घड़ा दूध देती थीं। वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें मधु भरा था। एक-एक वृक्षपर एक-एक दोन मधु सुलभ था। सर्वथा प्रसन्न रहनेवाली पृथ्वीपर सब प्रकारके धान्योंकी उपज होती थी। त्रेताके अन्तका द्वापरयुग सत्ययुगसे होड़ लगाता था। वर्षाकाल बीत चला, शरद्-ऋतुका आकाश और गृहस्थोंका घर धूल-पङ्कसे रहित स्वच्छ हो गया। राजा रुक्माङ्गद मोहिनीके प्रेमसे अत्यन्त मुग्ध होनेपर भी एकादशी-व्रतकी अवहेलना नहीं करते थे। दशमी, एकादशी और द्वादशी—इन तीन दिनोंतक राजा रतिक्रीडा त्याग देते थे। इस प्रकार क्रीडा करते हुए उन्हें लगभग एक वर्ष पूरा हो गया। कालज्ञोंमें श्रेष्ठ नरेश! उस समय परम मङ्गलमय श्रेष्ठ कार्तिकमास आ पहुँचा था, जो भगवान् विष्णुकी निद्राको दूर करनेवाला परम पुण्यदायक मास है। राजन्! उसमें वैष्णव मनुष्योंद्वारा किया हुआ सारा पुण्य अक्षय होता है और विष्णुलोक प्रदान करता है।

कार्तिकके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके समान कोई युग नहीं है, दयाके तुल्य कोई धर्म नहीं है और नेत्रके समान कोई ज्योति नहीं है। वेदके समान दूसरा शास्त्र नहीं है, गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है। भूमिदानके समान अन्य दान नहीं है और पत्नी-सुखके समान कोई (लौकिक) सुख नहीं है। खेतीके समान कोई धन नहीं है, गाय रखनेके समान कोई लाभ नहीं है, उपवासके