संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * | ६३३ ---|---
कहा—'देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षस सब मेरी दृष्टिमें आये, किंतु मैं सबको त्यागकर केवल आपके प्रति स्नेहयुक्त हो मन्दराचलपर आयी थी। लोकमें कामकी सफलता इसीमें है कि प्रिया और प्रियतम दोनों एकचित्त हों—परस्पर एक-दूसरेको चाहते हों।' उस समय महाराज रुक्माङ्गदके कानोंमें डंकेकी चोट सुनायी दी, जो मतवाले गजराजके मस्तकपर रखकर धर्माङ्गदके आदेशसे बजाया जा रहा था। उस पटह-ध्वनिके साथ यह घोषणा हो रही थी—'लोगो! कल प्रातः-कालसे भगवान् विष्णुका दिन (एकादशी) है, अतः आज केवल एक समय भोजन करके रहो। क्षार नमक छोड़ दो। सब-के-सब हविष्यान्नका सेवन करो। भूमिपर शयन करो। स्त्री-संगमसे दूर रहो और पुराणपुरुषोत्तम देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुका स्मरण करो। आज एक समय भोजन करके कल दिन-रात उपवास करना होगा। ऐसा करनेसे तुम्हारे लिये श्राद्ध चाहे न किया गया हो, तुम्हें पिण्ड न मिला हो और तुम्हारे पुत्र गयामें जाकर श्राद्ध न कर सके हों, तो भी तुम्हें भगवान् श्रीहरिके वैकुण्ठधामकी प्राप्ति होगी। यह कार्तिक शुक्ला एकादशी भगवान् श्रीहरिकी निद्रा दूर करनेवाली है। प्रातःकाल एकादशी प्राप्त होनेपर तुम कदापि भोजन न करो। इस प्रबोधिनी एकादशीको उपवास करनेसे इच्छानुसार किये हुए ब्रह्महत्या आदि सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जायँगे। यह तिथि धर्मपरायण तथा न्याययुक्त सदाचारका पालन करनेवाले पुरुषोंको प्रबोध (ज्ञान) देती है और इसमें भगवान् विष्णुका प्रबोध (जागरण) होता है, इसलिये इसका नाम प्रबोधिनी है। इस एकादशीको जो एक बार भी उपवास कर लेता है, वह मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। मनुष्यो! तुम अपने वैभवके अनुसार इस एकादशीको चक्रसुदर्शनधारी भगवान् विष्णुकी पूजा करो। वस्त्र, उत्तम चन्दन, रोली, पुष्प, धूप, दीप तथा हृदयको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले सुन्दर फल एवं उत्तम गन्धके द्वारा भगवान् श्रीहरिके चरणारविन्दोंकी अर्चना करो। जो भगवान् विष्णुका लोक प्रदान करनेवाले मेरे इस धर्मसम्मत वचनका पालन नहीं करेगा, निश्चय ही उसे कठोर दण्ड दिया जायगा।'
इस प्रकार मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले नगाड़ेको बजाकर जब उक्त घोषणा की जा रही थी, उस समय वे भूपाल मोहिनीकी शय्या छोड़कर उठ गये। फिर मोहिनीको मधुर वचनोंसे सान्त्वना देते हुए बोले—'देवि! कल प्रातःकाल पापनाशक एकादशी तिथि होगी। अतः आज मैं संयमपूर्वक रहूँगा। तुम्हारी आज्ञासे मैंने कृच्छ्र-व्रत तो संध्यावलीदेवीके द्वारा कराया है, किंतु यह प्रबोधिनी एकादशी मुझे स्वयं भी करनी है। यह सम्पूर्ण पापबन्धनोंका उच्छेद करनेवाली तथा उत्तम गति देनेवाली है। अतः मोहिनी देवी! आज मैं हविष्य भोजन करूँगा और संयम-नियमसे रहूँगा। विशाललोचने! तुम भी मेरे साथ उपवासपूर्वक समस्त इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् अधोक्षजकी आराधना करो, जिससे निर्वाणपदको प्राप्त करोगी।'
मोहिनी बोली—राजन्! चक्रधारी भगवान् विष्णुका पूजन जन्म-मृत्यु तथा जरावस्थाका नाश करनेवाला है—यह बात आपने ठीक कही है, किंतु पहले मन्दराचलके शिखरपर आपने मुझे अपना दाहिना हाथ देकर प्रतिज्ञा की है, उसके पालनका समय आ गया है। अतः मुझे आप वर दीजिये, यदि नहीं देते हैं तो जन्मसे लेकर अबतक आपने बड़े यत्नसे जो पुण्यसंचय किया है, वह सब शीघ्र नष्ट हो जायगा।
रुक्माङ्गदने कहा—प्रिये! आओ, तुम्हारे मनमें जो इच्छा होगी, उसे मैं पूर्ण करूँगा। मेरे पास कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो तुम्हारे लिये देने योग्य न हो, मेरा यह जीवनतक तुम्हें अर्पित है, फिर ग्राम, धन और पृथ्वीके राज्य आदिकी तो बात ही क्या है।