संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 634, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें६३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
आज्ञाका पालन करे। सुन्दरी! देवता, तीर्थ और यज्ञ भी ब्राह्मणोंके वचनका पालन करते हैं; फिर कल्याणकी इच्छा रखनेवाला कौन विद्वान् मनुष्य उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करेगा। प्रिये! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीको जिस प्रकार यह धर्म-रहस्यसे युक्त उपदेश दिया था, वही मैंने तुमसे प्रकाशित किया है। यह दूसरे अनधिकारियोंके सामने प्रकट करने योग्य नहीं है। यह दान और व्रत भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताका हेतु और मनोवाञ्छित फल देनेवाला है।
राजा रुक्माङ्गदकी आज्ञासे रानी संध्यावलीका कार्तिक मासमें कृच्छ्रव्रत प्रारम्भ करना, धर्माङ्गदकी एकादशीके लिये घोषणा, मोहिनीका राजासे एकादशीको भोजन करनेका आग्रह और राजाकी अस्वीकृति
मोहिनी बोली— राजेन्द्र! आपने कार्तिक मासमें उपवासके विषयमें जो बातें कही हैं, वे बहुत उत्तम हैं। पर राजाओंके लिये तीन ही कर्म प्रधान रूपसे बताये गये हैं। पहला कर्म है दान देना, दूसरा प्रजाका पालन करना तथा तीसरा है विरोधी राजाओंसे युद्ध करना। आपको यह व्रत नहीं करना चाहिये। मैं तो आपके बिना कहीं दो घड़ी भी नहीं रह सकती; फिर तीस दिनोंतक मैं आपसे अलग कैसे रह सकती हूँ। वसुधापते! आप जहाँ उपवास करना उचित मानते हैं, वहाँ उपवास न करके महात्मा ब्राह्मणोंको भोजन-दान करें अथवा यदि उपवास ही आवश्यक हो तो आपकी जो ज्येष्ठ पत्नी हैं, वे ही यह सब व्रत आदि करें।
मोहिनीके ऐसा कहनेपर राजा रुक्माङ्गदने संध्यावलीको बुलाया। बुलानेपर वे प्रचुर दक्षिणा देनेवाले महाराजके पास तत्काल आ पहुँचीं और हाथ जोड़कर बोलीं—'प्राणनाथ! दासीको किसलिये बुलाया ? आज्ञा कीजिये, मैं उसका पालन करूँगी।'
रुक्माङ्गदने कहा— भामिनि! मैं तुम्हारे शील-स्वभाव और कुलको जानता हूँ। तुम्हारे आदेशसे ही मैंने मोहिनीके साथ दीर्घकालतक निवास किया है। इस तरह चिरकालतक प्रियाके समागम-सुखसे मुग्ध हो निवास करते-करते मेरे बहुतसे कार्तिक मास व्यर्थ बीत गये। तथापि मेरा एकादशीव्रत कभी भङ्ग नहीं होने पाया है। अब सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला यह कार्तिक मास आया है। देवि! मैं उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाले इस कार्तिकव्रतको करना चाहता हूँ। परंतु शुभे! ये ब्रह्मकुमारी मुझे इस व्रतसे रोकती हैं। इसलिये शरीरको सुखानेवाले कृच्छ्र नामक व्रतका पालन मेरी ओरसे तुम करो।
रानी संध्यावलीने उस समय पतिदेवका वह प्रस्ताव सुनकर कहा—'प्रभो! मैं आपके संतोषके लिये व्रतका पालन अवश्य करूँगी। आपके लिये मैं अपने शरीरको आगमें भी झोंक सकती हूँ। भूमिपाल! आपने जो आज्ञा दी है, वह तो बहुत उत्तम है। नरदेवनाथ! मैं इसका पालन करूँगी।' यमराजके शत्रु राजा रुक्माङ्गदसे ऐसा कहकर मनोहर एवं विशाल नेत्रोंवाली रानी संध्यावलीने उन्हें प्रणाम किया और समस्त पापराशिका विनाश करनेके लिये उस उत्तम व्रतका पालन आरम्भ किया। अपनी प्रियाद्वारा उत्तम कृच्छ्रव्रत प्रारम्भ किये जानेपर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ब्रह्माजीकी पुत्री मोहिनीसे यह बात कही—'सुभ्रु! मैंने तुम्हारी आज्ञाका पालन किया। देवि! मेरे प्रति तुम्हारे मनमें जो-जो कामनाएँ निहित हैं, उन सबको सफल कर लो। मैं तुम्हारे संतोषके लिये राज्यशासनके समस्त कार्योंसे अलग हो गया हूँ। तुम्हारे सिवा दूसरी कोई नारी मुझे सुख देनेवाली नहीं है।'
अपने प्राणवल्लभके मुखसे ऐसी बात सुनकर मोहिनीके हर्षकी सीमा न रही। उसने राजासे