संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * ६३७
राजाके द्वारा एकादशीके दिन भोजनविषयक मोहिनी तथा ब्राह्मणोंके वचनका खण्डन, मोहिनीका रुष्ट होकर राजाको त्यागकर जाना और धर्माङ्गदका उसे लौटाकर लाना एवं पितासे मोहिनीको दी हुई वस्तु देनेका अनुरोध करना
वसिष्ठजी कहते हैं—मोहिनीकी कही हुई बात सुनकर वे ब्राह्मणलोग 'यह ठीक ही है' ऐसा कहकर राजासे बोले।
ब्राह्मणोंने कहा—राजन् ! आपने जो यह पुण्यमय शपथ कर ली है कि दोनों पक्षोंकी एकादशीको भोजन नहीं करना चाहिये, वह निश्चय शास्त्रदृष्टिसे नहीं, अपनी बुद्धिसे ही किया गया है। जो अग्निहोत्री हैं, उनके लिये दोनों संध्याओंमें भोजनका विधान है। ब्राह्मण आदि तीन वर्णके लोग होमावशिष्ट (यज्ञशिष्ट) अन्नके भोक्ता बताये गये हैं। प्रभो! जो सदा अस्त्र-शस्त्र उठाये ही रहते हैं और दुष्ट पुरुषोंको संयममें रखते हैं, ऐसे भूपालोंके लिये विशेषतः उपवास-कर्म कैसे उचित हो सकता है? शास्त्रसे या अशास्त्रसे आपने इस व्रतके लिये जो प्रतिज्ञा कर ली है, वह ठीक है; किंतु आप ब्राह्मणोंके साथ भोजन करें, इससे आपका व्रत भङ्ग नहीं हो सकता।
यह वचन सुनकर राजाके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। पर वे उन ब्राह्मणोंसे मधुर वाणीमें बोले—'विप्रवरो! आप लोग सब प्राणियोंको मार्ग दिखानेवाले हैं, अतः आपको ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिये। जो लोग एकादशीके दिन उपवासका विधान करनेवाले वचनको (केवल) यतियों और विधवाओंके लिये ही विहित बताते हैं, वे ठीक नहीं कहते हैं। वैष्णवोंका कहीं ऐसा मत नहीं है। आप लोगोंने जो यह कहा है कि राजाओंके लिये उपवासका विधान नहीं है, उसके विषयमें मैं वैष्णवाचार-लक्षणके वचन सुनाता हूँ, आप लोग सुनें। 'मदिरा कभी नहीं पीना चाहिये, ब्राह्मणको कभी नहीं मारना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको जुएका खेल नहीं खेलना चाहिये और एकादशीके दिन भोजन नहीं करना चाहिये। नहीं करने योग्य कार्यको करके कौन सौ वर्षोंतक जीवित रहता है? कौन सचेष्ट मनुष्य है, जो एकादशीके दिन भोजन करे। उत्तर दिशामें रहनेवाले विष्णुधर्मपरायण ब्राह्मणोंको तो उचित है कि वे एकादशीके दिन पशुओंको भी अन्न न दें। द्विजोत्तमो! मेरा शरीर क्षीण नहीं है और मैं रोगी भी नहीं हूँ, अतः ब्राह्मणके कहनेमात्रसे मैं एकादशीके व्रतका त्याग कैसे करूँगा? मेरा पुत्र धर्माङ्गद इस भूतलकी रक्षा कर रहा है। अतः मैं लोक या प्रजाकी रक्षारूप धर्मसे भी शून्य नहीं हूँ। मेरा कोई भी शत्रु नहीं है। द्विजवरो! ऐसा जानकर आपलोगोंको वैष्णव-व्रतका पालन करनेवाले मेरे प्रतिकूल कोई व्रतनाशक वचन नहीं कहना चाहिये। देवता, दानव, गन्धर्व, राक्षस, सिद्ध, ब्राह्मण, हमारे पिता, भगवान् विष्णु, भगवान् शिव अथवा मोहिनीके पिता श्रीब्रह्माजी, सूर्य अथवा और कोई लोकपाल स्वयं आकर कहें तो भी मैं एकादशीको भोजन नहीं करूँगा। द्विजो! इस पृथ्वीपर विख्यात यह राजा रुक्माङ्गद अपनी सच्ची प्रतिज्ञाको कभी निष्फल नहीं कर सकता। ब्राह्मणो! इन्द्रका तेज क्षीण हो जाय, हिमालय बदल जाय, समुद्र सूख जाय तथा अग्नि अपनी स्वाभाविक उष्णताको त्याग दे तथापि मैं एकादशीके दिन उपवासरूप व्रतका त्याग नहीं करूँगा। विप्रगण! तीनों लोकोंमें यह बात प्रसिद्ध हो चुकी है और डंकेकी चोटसे दुहरायी जाती है कि जो लोग रुक्माङ्गदके गाँव, देश तथा अन्य स्थानोंमें एकादशीको भोजन करेंगे, वे पुत्रसहित दण्डनीय एवं वध्य होंगे और उनके लिये इस राज्यमें