भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 640, कुल 770 में से

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पृष्ठ 640

६३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


ठहरनेका स्थान नहीं होगा। एकादशीका दिन सब यज्ञोंसे प्रधान पापनाशक, धर्मवर्धक, मोक्षदायक तथा जन्मरूपी बन्धनको काटनेवाला है। यह तेजकी निधि है और सब लोगोंमें इसकी प्रसिद्धि भी है। इस तरहके शब्दकी घोषणा होनेपर भी यदि मैं एकादशीको भोजन करता हूँ तो पापका प्रवर्तक होऊँगा। मेरा व्रत भङ्ग हो जानेपर मुझे जन्म देनेवाली माता अपनेको व्यर्थ मानेगी तथा ब्राह्मण, देवता तथा पितर निराश होंगे। जो वेद, पुराण और शास्त्रोंको नहीं मानता, वह अन्तमें सूर्यपुत्र यमराजकी पुरीमें जाता है। जो वमन करके फिर उसे खाता है, उसीके समान वह भी है, जो अपनी प्रतिज्ञा तथा व्रतको भङ्ग कर देता है। वेद, शास्त्र, पुराण, संत-महात्मा तथा धर्मशास्त्र कोई भी ऐसे नहीं हैं, जो भगवान् विष्णुके प्रिय कार्यके योग्य एकादशीके दिन भोजनका विधान करते हों। एकादशीके दिनका व्रत भगवान् विष्णुके पदको देनेवाला है। उस दिन क्षयाह तिथि होनेपर भी अन्न-भोजनकी बात मूढ़ पुरुष ही कह सकते हैं।'

राजाकी यह बात सुनकर मोहिनी भीतर-ही-भीतर जल उठी और क्रोधसे आँखें लाल करके पतिसे बोली—'राजन्! तुम मेरी बात नहीं स्वीकार करते हो तो धर्मभ्रष्ट हो जाओगे। पृथ्वीपते ! तुमने वर देनेके लिये अपना हाथ सौंपा था। अपनी उस प्रतिज्ञाका उल्लङ्घन करके यदि दिये हुए वचनका पालन न करोगे तो मैं चली जाऊँगी। नरेश! अब मैं न तो तुम्हारी प्यारी पत्नी हूँ और न तुम मेरे पति। तुम अपने वचनको मिटाकर धर्मका नाश करनेवाले हो। तुम्हें धिक्कार है।'

ऐसा कहकर मोहिनी बड़ी उतावलीके साथ उठी और जिस प्रकार सती देवी महादेवजीको छोड़कर गयी थीं, उसी प्रकार वह राजाको छोड़कर ब्राह्मणोंको साथ ले उसी समय वहाँसे चल दी। उस समय ब्रह्माजीकी मानसपुत्री मोहिनी 'हा तात ! हा जगन्नाथ ! जगत्की सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले परमेश्वर ! मेरी सुध लो'—इन शब्दोंका जोर-जोरसे उच्चारण करती हुई विलाप कर रही थी।

इसी समय धर्माङ्गद सारी पृथ्वीका परिभ्रमण करके घोड़ेपर चढ़े हुए आये। उनके मनमें कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं था। उन्होंने मोहिनीकी वह पुकार अपने कानों सुन ली थी। धर्माङ्गद बड़े पितृभक्त थे। धर्ममूर्ति रुक्माङ्गदकुमार तुरंत घोड़ेसे उतर पड़े और पिताके चरणोंके समीप गये। उन्हें प्रणाम करके धर्माङ्गदने फिर उठकर हाथ जोड़, उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम किया। राजन्! तदनन्तर रोषयुक्त हृदयवाली मोहिनीको शीघ्रगतिसे बाहर जाती देख धर्माङ्गद बड़े वेगसे सामने गये और हाथ जोड़कर बोले—'माँ ! किसने तुम्हारा अपमान किया है? देवि! तुम तो पिताजीको अधिक प्रिय हो, आज रुष्ट कैसे हो गयी? इन ब्राह्मणोंके साथ इस समय तुम कहाँ जा रही हो?' धर्माङ्गदकी बात सुनकर मोहिनी बोली—'बेटा ! तुम्हारे पिता झूठे हैं, जिन्होंने अपना हाथ मुझे देकर भी उसे व्यर्थ कर दिया। अतः तुम्हारे पिता रुक्माङ्गदके साथ रहनेका अब मेरे मनमें कोई उत्साह नहीं है।'

धर्माङ्गदने कहा—देवि! तुम जो कहोगी, उसे मैं तुरंत करूँगा। माँ ! तुम क्रोध न करो। तुम पिताजीको अधिक प्रिय हो; अतः उनके पास लौट चलो।

मोहिनी बोली—वत्स ! मुँहमाँगा वरदान देनेकी शर्त रखकर तुम्हारे पिताने मन्दराचलपर मुझे अपनी पत्नी बनाया था। देवेश्वर भगवान् शिव इसके साक्षी हैं, किंतु तुम्हारे पिता रुक्माङ्गद अब उस प्रतिज्ञासे गिर गये हैं। राजकुमार! मैं उनसे सुवर्ण, धन, हाथी, घोड़े, गाँव या बहुमूल्य वस्त्र नहीं माँगती