भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 770 में से

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पृष्ठ 641
* उत्तरभाग *६३१
हूँ, जिससे उनकी आर्थिक हानि हो। देहधारियोंमें श्रेष्ठ बेटा धर्माङ्गद! जिससे वे अपने शरीरको पीड़ा दे रहे हैं, वही वस्तु मैंने उनसे माँगी है; किंतु वे मोहवश उसे भी नहीं दे रहे हैं। नृपनन्दन! उन्हींके शरीरकी भलाईके लिये, उन्हींके सुखके लिये मैंने वर माँगा है, किंतु वे नृपश्रेष्ठ उसे न देकर आज भयंकर असत्यके दलदलमें फँस गये हैं। असत्य मदिरापानके समान घृणित पाप है। इस कारण तुम्हारे पिताको मैं त्याग रही हूँ। अब उनके साथ मेरा रहना नहीं हो सकता। <br><br> मोहिनीका यह वचन सुनकर पुत्र धर्माङ्गदने कहा—‘मेरे जीते-जी मेरे पिता कभी झूठे नहीं हो सकते। वरारोहे! तुम लौटो। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा। देवि! मेरे पिताने पहले कभी असत्यभाषण नहीं किया है; फिर वे महाराज मुझ पुत्रके होते हुए असत्य कैसे बोलेंगे? जिनके सत्यपर देवता, असुर तथा मानवोंसहित सम्पूर्ण लोक स्थित हैं, जिन्होंने यमराजके घरको पापियोंसे शून्य कर दिया है, जिनकी कीर्ति रोज बढ़ रही है और उससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमण्डल व्याप्त हो गया है, वे ही भूपालशिरोमणि असत्य-भाषणमें तत्पर कैसे हो सकते हैं? मैंने महाराजका वचन सुना नहीं है, फिर उनके परोक्षमें तुम्हारी बातपर कैसे विश्वास कर लूँ? शुभानने! मुझपर दया करके लौट चलो। <br><br> राजन्! धर्माङ्गदका यह कथन सुनकरमोहिनी लौटी। सूर्यके समान तेजस्वी रुक्माङ्गद जिस शय्यापर मृतकके समान लेटे थे, उसीपर धर्माङ्गदने मोहिनीको बिठाया। वह शय्या सुवर्णसे विभूषित, अनुपम और मनोहर थी। जब मोहिनी उसपर बैठ गयी, तब धर्माङ्गदने हाथ जोड़कर पितासे मधुर वाणीमें कहा—‘तात! ये मेरी माता मोहिनी आज आपको असत्यवादी बता रही हैं। महाराज! इस पृथ्वीपर आप असत्यवादी क्यों होंगे? आप सातों समुद्रोंसे युक्त भूमण्डलका शासन करते हैं। आपके पास खजाना है, रत्नोंकी राशि संचित है। प्रभो! यह सब आप इन्हें दे दीजिये। और भी जो कुछ देनेकी प्रतिज्ञा आपने की हो, वह दे दीजिये। पिताजी! जब मैं धनुष-बाण धारण करके खड़ा हूँ तो आपके प्रतिकूल आचरण कौन कर सकता है? आप चाहें तो देवीको इन्द्रपद दे दीजिये और इन्द्रको जीता हुआ ही समझिये। ब्रह्माजीका पद अत्यन्त दुर्लभ है, वह योगियोंके ही अनुभवमें आने योग्य तथा निरञ्जन है। यदि देवी चाहें तो मैं तपस्यासे ब्रह्माजीको संतुष्ट करके वह भी इन्हें दे दूँगा। राजेन्द्र! इस त्रिलोकीमें जो दुष्कर हो अथवा अधिक प्रिय होनेसे जो देनेयोग्य न हो, वह भी मोहिनी देवीको दे दीजिये। ये चाहें तो मेरा अथवा मेरी जननीका जीवन भी इन्हें दे सकते हैं। इससे आप तत्काल ही इस लोकमें सदाके लिये उत्तम कीर्तिसे सुशोभित होंगे।’

राजा रुक्माङ्गदका एकादशीको भोजन न करनेका ही निश्चय

राजा बोले—बेटा! मेरी कीर्ति नष्ट हो जाय, मैं असत्यवादी हो जाऊँ अथवा घोर नरकमें ही पड़ जाऊँ, किंतु एकादशीके दिन भोजन कैसे करूँगा? पुत्र! यह मोहनी देवी ब्रह्माजीके लोकमें चली जाय, यह मुझसे बार-बार यही कहती हैकि मैं पापनाशिनी एकादशीके दिन तुम्हें भोजन करानेके सिवा राज्य, वसुधा और धन आदि दूसरी कोई वस्तु नहीं चाहती। यह जो हमारी दुंदुभी स्वयं गुरुतर होकर गम्भीर नाद करती हुई लोगोंको शिक्षा देती है, वह आज असत्य