भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 642
६४०* संक्षिप्त नारदपुराण *

कैसे हो जाय? अभक्ष्यभक्षण, अगम्या स्त्रीके साथ संगम तथा न पीने योग्य मदिरा आदिका पान करके कोई सौ वर्ष क्यों जीयेगा? इस चञ्चल कटाक्षवाली मोहिनीके वियोगसे यदि मेरी मृत्यु हो जाय तो वह भी यहाँ अच्छा ही है; किंतु मैं एकादशीके दिन भोजन नहीं करूँगा। तात! नरकोंकी जो पङ्क्तियाँ मैंने सूनी कर दी हैं, वे मेरे भोजन करते ही पुनः ज्यों-की-त्यों लोगोंसे भर जायँगी। मेरा रुक्माङ्गद नाम तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है और एकादशीके | उपवाससे ही मैंने इस यशका संचय किया है, वही अब मैं एकादशीको भोजन करके अपने ही द्वारा फैलाये हुए यशका नाश कैसे कर दूँगा। मोहिनी मर जाय या चली जाय, गिर जाय या नष्ट हो जाय तथापि मेरा मन इसके लिये एकादशीके उपवाससे विरत नहीं हो सकता। स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्बीजनोंके साथ मैं अपने शरीरका त्याग कर सकता हूँ, परंतु भगवान् मधुसूदनके पुण्यमय दिवस एकादशीको अन्नका सेवन नहीं करूँगा।


संध्यावली-मोहिनी-संवाद, रानी संध्यावलीका मोहिनीको पतिकी इच्छाके विपरीत चलनेमें दोष बताना

वसिष्ठजी कहते हैं— पिताकी बात सुनकर पुत्र धर्माङ्गदने अपनी कल्याणमयी माता संध्यावलीको शीघ्र ही बुलाया। पुत्रके कहनेसे वे उसी क्षण महाराजके समीप आयीं। धर्माङ्गदने उनसे मोहिनी तथा पिताकी भी बातें कह सुनायीं और निवेदन किया—'माँ! दोनोंकी बातोंपर विचार करके मोहिनीको सान्त्वना दो। यह एकादशीके दिन राजाको भोजन करानेपर तुली हुई है। मेरे पिता जिस प्रकार सत्यसे विचलित न हों और एकादशीको भोजन भी न करें—ऐसा कोई उपाय निकालो, ऐसा होनेपर ही दोनोंका मङ्गल होगा।' राजन्! पुत्रकी बात सुनकर संध्यावलीदेवी ब्रह्मपुत्री मोहिनीसे उस समय मधुर वाणीमें बोलीं—'वामोरु! आग्रह न करो। एकादशी प्राप्त होनेपर अन्नमात्रमें पापका सम्पर्क हो जाता है, अतः महाराज किसी प्रकार भी उसका आस्वादन नहीं कर सकते। तुम राजाका अनुसरण करो। ये हम लोगोंके सनातन गुरु हैं। जो नारी सदा अपने पतिकी आज्ञाका पालन करती है, उसे सावित्रीके समान अक्षय तथा निर्मल लोक प्राप्त होते हैं। | देवि! यदि इन्होंने पहले मन्दराचलपर कामसे पीड़ित होकर तुम्हें अपना हाथ दिया है तो उस समय इन्होंने योग्यायोग्यका विचार नहीं किया। जो देनेलायक वस्तु है, उसे तो वे दे ही रहे हैं और जो नहीं देनेयोग्य वस्तु है, उसको तुम माँगो भी मत। जो सन्मार्गमें स्थित है उसे यदि विपत्ति भी प्राप्त हो तो वह कल्याणमयी ही होती है। सुभगे! जिन्होंने बचपनमें भी एकादशीके दिन भोजन नहीं किया है, वे इस समय वृद्धावस्थामें भगवान् विष्णुके पुण्यमय दिवसको अन्न कैसे ग्रहण करेंगे? तुम इच्छानुसार कोई दूसरा अत्यन्त दुर्लभ वर माँग लो। उसे महाराज अवश्य दे देंगे। उन्हें भोजन करानेके हठसे निवृत्त हो जाओ। देवि! मैं धर्माङ्गदकी जननी हूँ। यदि तुम मुझे विश्वसनीय मानती हो तो सातों द्वीप, नदी, वन और पर्वतसहित इस सम्पूर्ण राज्यको और मेरे जीवनको भी माँग लो। विशाललोचने! यद्यपि मैं ज्येष्ठ हूँ तथापि पतिके लिये छोटी सपत्नीकी भी चरण-वन्दना करूँगी। तुम प्रसन्न हो जाओ। जो वचनसे और शपथ-दोषसे पतिको विवश करके