संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 702, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें७०० * संक्षिप्त नारदपुराण *
इन्द्रद्युम्न बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने दृढ़ एवं तीक्ष्ण फरसेसे उस वृक्षको काट गिराया। उस समय इन्द्रद्युम्नने जब काष्ठका भलीभाँति निरीक्षण किया, तब उन्हें वहाँ एक अद्भुत बात दिखायी दी। विश्वकर्मा और भगवान् विष्णु दोनों ब्राह्मणका रूप धारण करके वहाँ आये। दोनों ही उत्तम तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। राजा इन्द्रद्युम्नसे उन्होंने पूछा—'महाराज! आप यहाँ कौन कार्य करेंगे? इस परम दुर्गम, गहन एवं निर्जन वनमें इस महासागरके तटपर यह अकेला ही महान् वृक्ष था। इसको आपने क्यों काट दिया?'
मोहिनी! उन दोनोंकी बात सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन दोनों जगदीश्वरोंको देखकर राजाने पहले तो उन्हें नमस्कार किया और फिर विनीतभावसे नीचे मुँह किये खड़े होकर कहा—'विप्रवरो! मेरा विचार है कि मैं अनादि, अनन्त, अमेय तथा देवाधिदेव जगदीश्वरकी आराधना करनेके लिये प्रतिमा बनाऊँ। इसके लिये परमपुरुष देवदेव परमात्माने स्वप्नमें मुझे प्रेरित किया है।' राजा इन्द्रद्युम्नका यह वचन सुनकर भगवान् जगन्नाथने प्रसन्नतापूर्वक हँसकर उनसे कहा—'महीपाल! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा; आपका यह विचार बहुत उत्तम है। यह भयंकर संसार-सागर केलेके पत्तेकी भाँति सारहीन है। इसमें दुःखकी ही अधिकता है। यह काम और क्रोधसे भरा हुआ है। इन्द्रियरूपी भँवर और कीचड़के कारण इसके पार जाना कठिन है। इसे देखकर रोमाञ्च हो आता है। नाना प्रकारके सैकड़ों रोग यहाँ भँवरके समान हैं तथा यह संसार पानीके बुलबुलेके समान क्षणभंगुर है। नृपश्रेष्ठ! इसमें रहते हुए जो आपके मनमें विष्णुकी आराधनाका विचार उत्पन्न हुआ, उसके कारण आप धन्य हैं। सम्पूर्ण गुणोंसे अलंकृत हैं। प्रजा, पर्वत, वन, नगर, पुर तथा ग्रामोंसहित एवं चारों वर्णोंसे सुशोभित यह धरती धन्य है, जहाँके शक्तिशाली प्रजापालक आप हैं। महाभाग! आइये, आइये। इस वृक्षकी सुखद एवं शीतल छायामें हम दोनोंके साथ बैठिये और धार्मिक कथा-वार्ताद्वारा धर्मका सेवन कीजिये। ये मेरे साथी शिल्पियोंमें श्रेष्ठ हैं और प्रतिमाके निर्माणकार्यमें आपकी सहायता करनेके लिये यहाँ आये हैं। ये मेरे बताये अनुसार प्रतिमा अभी तैयार कर देते हैं।'
उन ब्राह्मणदेवकी ऐसी बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न समुद्रका तट छोड़कर उनके पास चले गये और वृक्षकी छायामें बैठे।
ब्रह्मपुत्री मोहिनी! तदनन्तर ब्राह्मणरूपधारी विश्वात्मा भगवान्ने शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माको आज्ञा दी, 'तुम प्रतिमा बनाओ। उसमें श्रीकृष्णका रूप परम शान्त हो। उनके नेत्र कमलदलके समान विशाल होने चाहिये। वे वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणि और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये हुए हों। दूसरी प्रतिमाका विग्रह गो-दुग्धके समान गौरवर्ण हो। उसमें स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये। वह अपने हाथमें हल धारण किये हुए हों। वही महाबली भगवान् अनन्तका स्वरूप है। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, विद्याधर तथा नागोंने भी उनका अन्त नहीं जाना है, इसलिये वे 'अनन्त' कहलाते हैं। तीसरी प्रतिमा बलरामजीकी बहिन सुभद्रादेवीकी होगी। उनके शरीरका रंग सुवर्णके समान गौर एवं शोभासे सम्पन्न होना चाहिये। उनमें समस्त शुभ लक्षणोंका समावेश होना आवश्यक है।'
भगवान्का यह कथन सुनकर उत्तम कर्म करनेवाले विश्वकर्माने तत्काल शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न प्रतिमाएँ तैयार कर दीं। पहले उन्होंने बलभद्रजीकी मूर्ति बनायी। वे विचित्र कुण्डलमण्डित दोनों कानों तथा चक्र एवं हलके चिह्नसे युक्त हाथोंसे सुशोभित थे। उनका वर्ण शरत्कालके