भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 703
  • उत्तरभाग *

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चन्द्रमाके समान श्वेत था। नेत्रोंमें कुछ-कुछ लालिमा थी। उनका शरीर विशाल और मस्तक फणाकार होनेसे विकट जान पड़ता था। वे नील वस्त्र धारण किये, बलके अभिमानसे उद्धत प्रतीत होते थे। उन्होंने हाथोंमें महान् हल और महान् मुसल धारण कर रखा था। उनका स्वरूप दिव्य था। द्वितीय विग्रह साक्षात् भगवान् वासुदेवका था। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित थे। शरीरकी कान्ति नील मेघके समान श्याम थी। वे तीसीके फूलके समान सुन्दर प्रभासे उद्भासित हो रहे थे। उनके बड़े-बड़े नेत्र कमलदलकी शोभाको छीने लेते थे। श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पाता था। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न तथा हाथोंमें शङ्ख, चक्र सुशोभित थे। इस प्रकार वे सर्वपापहारी श्रीहरि दिव्य शोभासे सम्पन्न थे। तीसरी प्रतिमा सुभद्रादेवीकी थी, जिनके देहकी दिव्य कान्ति सुवर्णके समान दमक रही थी, नेत्र कमलदलके समान विशाल थे। उनका अङ्ग विचित्र वस्त्रसे आच्छादित था। वे हार और केयूर आदि आभूषणोंसे विभूषित थीं। इस प्रकार विश्वकर्माने उनकी बड़ी रमणीय प्रतिमा बनायी।

राजा इन्द्रद्युम्नने यह बड़ी अद्भुत बात देखी कि सब प्रतिमाएँ एक ही क्षणमें बनकर तैयार हो गयीं। वे सभी दो दिव्य वस्त्रोंसे आच्छादित थीं। उन सबका भाँति-भाँतिके रत्नोंसे शृङ्गार किया गया था और वे सभी अत्यन्त मनोहर तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं। उन्हें देखकर राजा अत्यन्त आश्चर्यमग्न होकर बोले—'आप दोनों ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् ब्रह्मा और विष्णु तो नहीं हैं? आपके यथार्थ रूपको मैं नहीं जानता। मैं आप दोनोंकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे अपने स्वरूपका ठीक-ठीक परिचय दें।'

ब्राह्मण बोले—राजन्! तुम मुझे पुरुषोत्तम समझो। मैं समस्त लोकोंकी पीड़ा दूर करनेवाला अनन्त बल-पौरुषसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण भूतोंका आराध्य हूँ। मेरा कभी अन्त नहीं होता। जिसका सब शास्त्रोंमें प्रतिपादन किया जाता है, उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका वर्णन मिलता है, योगिजन जिसे ज्ञानगम्य वासुदेव कहते हैं, वह परमात्मा मैं ही हूँ। स्वयं मैं ही ब्रह्मा, मैं ही शिव और मैं ही विष्णु हूँ। देवताओंका राजा इन्द्र और सम्पूर्ण जगत्का नियन्त्रण करनेवाला यम भी मैं ही हूँ। पृथ्वी आदि पाँच भूत, हविष्यका भोग लगानेवाले त्रिविध अग्नि, जलाधीश वरुण, सबको धारण करनेवाली धरती और धरतीको भी धारण करनेवाले पर्वत भी मैं ही हूँ। संसारमें जो कुछ भी वाणीसे कहा जानेवाला स्थावर-जङ्गम भूत है, वह मेरा ही स्वरूप है। सम्पूर्ण विश्वके रूपमें मुझे ही प्रकट हुआ समझो। मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है। नृपश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। सुव्रत! मुझसे कोई वर माँगो। तुम्हारे हृदयको जो अभीष्ट हो, वह तुम्हें दूँगा। जो पुण्यात्मा नहीं हैं, उन्हें स्वप्नमें भी मेरा दर्शन नहीं होता। तुम्हारी तो मुझमें दृढ़ भक्ति है, इसलिये तुमने मेरा प्रत्यक्ष दर्शन किया है।

मोहिनी! भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर राजाके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे इस प्रकार स्तोत्र-गान करने लगे—

राजाने कहा—लक्ष्मीकान्त! आपको नमस्कार है। श्रीपते! आपके दिव्य विग्रहपर पीताम्बर शोभा पा रहा है; आपको नमस्कार है। आप श्रीद (धन-सम्पत्तिके देनेवाले), श्रीश (लक्ष्मीके पति), श्रीनिवास (लक्ष्मीके आश्रय) तथा श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके धाम) हैं; आपको नमस्कार है। आप आदिपुरुष, ईशान, सबके ईश्वर, सब ओर मुखवाले, निष्कल एवं सनातन परमदेव हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप शब्द और गुणोंसे अतीत, भाव और अभावसे रहित, निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म,