भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 704

७०२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

सर्वज्ञ तथा सबके पालक हैं। आपके श्रीअङ्गोंकी कान्ति नील कमलदलके समान श्याम है। आप क्षीरसागरके भीतर निवास करनेवाले तथा शेषनागकी शय्यापर सोनेवाले हैं। इन्द्रियोंके नियन्ता तथा सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाले आप श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ। देवदेवेश्वर ! आप सबको वर देनेवाले, सर्वव्यापी, समस्त लोकोंके ईश्वर, मोक्षके कारण तथा अविनाशी विष्णु हैं; मैं पुनः आपको प्रणाम करता हूँ।

इस प्रकार स्तुति करके राजाने हाथ जोड़कर भगवान्‌को प्रणाम किया और विनीतभावसे धरतीपर मस्तक टेककर कहा—'नाथ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मोक्षमार्गके ज्ञाता पुरुष जिस निर्गुण, निर्मल एवं शान्त परमपदका ध्यान करते हैं, साक्षात्कार करते हैं, उस परम दुर्लभ पदको मैं आपके प्रसादसे प्राप्त करना चाहता हूँ।'

श्रीभगवान् बोले—राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी कही हुई सब बातें सफल हों। मेरे प्रसादसे तुम्हें अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति होगी। नृपश्रेष्ठ! तुम दस हजार नौ सौ वर्षोंतक अपने अखण्ड एवं विशाल साम्राज्यका उपभोग करो, इसके बाद उस दिव्य पदको प्राप्त होओगे, जो देवता और असुरोंके लिये भी दुर्लभ है और जिसे पाकर सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो शान्त, गूढ, अव्यक्त, अव्यय, परसे भी पर, सूक्ष्म, निर्लेप, निर्गुण, ध्रुव, चिन्ता और शोकसे मुक्त तथा कार्य और कारणसे वर्जित, जानने योग्य परम पद है, उसका तुम्हें साक्षात्कार कराऊँगा। उस परमानन्दमय पदको पाकर तुम परम गति—मोक्षको प्राप्त हो जाओगे। राजेन्द्र ! जबतक पृथ्वी और आकाश है, जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारे प्रकाशित होते हैं, जबतक सात समुद्र तथा मेरु आदि पर्वत मौजूद हैं तथा जबतक स्वर्गलोकमें अविनाशी देवगण सब ओर विद्यमान हैं, तबतक इस भूतलपर सर्वत्र तुम्हारी अक्षय कीर्ति छायी रहेगी। तुम्हारे यज्ञके घृतसे प्रकट हुआ तालाब 'इन्द्रद्युम्न-सरोवर'के नामसे विख्यात होगा और उसमें एक बार भी स्नान कर लेनेपर मनुष्य इन्द्रलोकको प्राप्त होगा। सरोवरके दक्षिण भागमें नैर्ऋत्य कोणकी ओर जो बरगदका वृक्ष है, उसके समीप केवड़ेके वनसे आच्छादित एक मण्डप है, जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे घिरा हुआ है। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको मघा नक्षत्रमें भक्तजन हमारी इन प्रतिमाओंकी सवारी निकालेंगे और इन्हें ले जाकर उक्त मण्डपमें सात दिनोंतक रखेंगे। ब्रह्मचारी, संन्यासी, स्नातक, श्रेष्ठ ब्राह्मण, वानप्रस्थ, गृहस्थ, सिद्ध तथा अन्य द्विज नाना प्रकारके अक्षर और पदवाले स्तोत्रोंसे तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी ध्वनियोंसे श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णकी बारंबार स्तुति करेंगे।

भद्रे ! इस प्रकार राजाको वरदान दे और उनके लिये इस लोकमें रहनेका समय निर्धारित करके भगवान् विष्णु विश्वकर्माके साथ अन्तर्धान हो गये। उस समय राजा बड़े प्रसन्न थे। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। भगवान्‌के दर्शनसे उन्होंने अपनेको कृतकृत्य माना। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, बलराम तथा वरदायिनी सुभद्राको मणिकाञ्चनजटित विमानाकार रथोंमें बिठाकर वे बुद्धिमान् नरेश अमात्य और पुरोहितके साथ मङ्गलपाठ, जय-जयकार, अनेक प्रकारके वैदिक मन्त्रोंके उच्चारण और भाँति-भाँतिके गाजे-बाजेके सहित ले आये और उन्हें परम मनोहर पवित्र स्थानमें पधराया। फिर शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र, शुभ समय और शुभ मुहूर्तमें ब्राह्मणोंके द्वारा उनकी प्रतिष्ठा करायी। उत्तम प्रासाद (मन्दिर)-में वेदोक्त विधिसे आचार्यकी आज्ञाके अनुसार प्रतिष्ठा करके विश्वकर्माके द्वारा बनाये हुए उन सब विग्रहोंको विधिवत् स्थापित