भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 708

७०६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


प्रणाम करके पा लेता है। सब प्रकारके दान, व्रत और नियमोंका पालन करके मनुष्य जिस फलको पाता है, अथवा ब्रह्मचर्य-व्रतका विधिपूर्वक पालन करनेसे जो फल बताया गया है, उसी फलको मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और प्रणाम करके प्राप्त कर लेता है। भामिनि! भगवद्दर्शनके माहात्म्यके सम्बन्धमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता? भगवान् श्रीकृष्णका भक्तिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य दुर्लभ मोक्षतक प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्मकुमारी मोहिनी! तदनन्तर भक्तोंपर स्नेह रखनेवाली सुभद्रादेवीका भी नाम-मन्त्रसे पूजन करके उन्हें प्रणाम करे और हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे—

नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे।
त्राहि मां पद्मपत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
(ना० उत्तर० ५५। ६७)

'देवि! तुम सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली और शुभ सौख्य प्रदान करनेवाली हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। पद्मपत्रोंके समान विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी-स्वरूपा सुभद्रे! मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है।'

इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली लोकहितकारिणी, वरदायिनी एवं कल्याणमयी बलभद्रभगिनी सुभद्रादेवीको प्रसन्न करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा श्रीविष्णुलोकमें जाता है।

इस प्रकार बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्रादेवीको प्रणाम करके भगवान्‌के मन्दिरसे बाहर निकले। उस समय मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। तत्पश्चात् जगन्नाथजीके मन्दिरको प्रणाम करके एकाग्रचित्त हो उस स्थानपर जाय जहाँ भगवान् विष्णुकी इन्द्रनीलमयी प्रतिमा बालूके भीतर छिपी है। वहाँ अदृश्यरूपसे स्थित भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम करके मनुष्य श्रीविष्णुके धाममें जाता है। देवि! जो भगवान् सर्वदेवमय हैं, जिन्होंने आधा शरीर सिंहका बनाकर हिरण्यकशिपुका उद्धार किया था, वे भगवान् नृसिंह भी पुरुषोत्तमतीर्थमें नित्य निवास करते हैं। शुभे! जो भक्तिपूर्वक उन भगवान् नृसिंहदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम करता है, वह मनुष्य समस्त पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो मानव इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहके भक्त होते हैं, उन्हें कोई पाप छू नहीं सकता और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् नृसिंहकी शरण ले; क्योंकि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षसम्बन्धी फल प्रदान करते हैं। ब्रह्मपुत्री! अतः सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंके देनेवाले महापराक्रमी श्रीनृसिंहदेवकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र और अन्त्यज आदि सभी मनुष्य भक्तिभावसे सुरश्रेष्ठ भगवान् नृसिंहकी आराधना करके करोड़ों जन्मोंके अशुभ एवं दुःखसे छुटकारा पा जाते हैं। विधिनन्दिनी! मैं अजित, अप्रमेय तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नृसिंहका प्रभाव बतलाता हूँ, सुनो! सुव्रते! उनके समस्त गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है? अतः मैं भी श्रीनृसिंहदेवके गुणोंका संक्षेपसे ही वर्णन करूँगा। इस लोकमें जो कोई दैवी अथवा मानुषी सिद्धियाँ सुनी जाती हैं, वे सब भगवान् नृसिंहके प्रसादसे ही सिद्ध होती हैं। भगवान् नृसिंहदेवके कृपाप्रसादसे स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल, अन्तरिक्ष, जल, असुरलोक तथा पर्वत—इन सब स्थानोंमें मनुष्यकी अबाध गति होती है। सुभगे! इस सम्पूर्ण चराचर जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो भक्तोंपर निरन्तर कृपा करनेवाले भगवान् नृसिंहके लिये असाध्य हो।

अब मैं श्रीनृसिंहदेवके पूजनकी विधि बतलाता