संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 709, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें| * उत्तरभाग * | ७०७ |
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हूँ, जो भक्तोंके लिये उपकारक है, जिससे वे भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते हैं। भगवान् नृसिंहका यथार्थ तत्त्व देवताओं और असुरोंको भी ज्ञात नहीं है। उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजनकी आवश्यकता पूरी करे अथवा भद्रे! दूध पीकर रहे। घास-फूस या कौपीनमात्र वस्त्रसे अपने शरीरको ढक ले। इन्द्रियोंको वशमें करके (भगवान् नृसिंहके) ध्यानमें तत्पर रहे। वनमें, एकान्त प्रदेशमें, नदीके सङ्गम या पर्वतपर, सिद्धक्षेत्रमें, ऊसरमें तथा भगवान् नृसिंहके आश्रममें जाकर अथवा जहाँ-कहीं भी स्वयं भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके जो विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, देवि! वह उपपातकी हो या महापातकी, उन समस्त पातकोंसे वह साधक मुक्त हो जाता है। वहाँ नृसिंहजीकी परिक्रमा करके उनकी गन्ध, पुष्प और धूप आदि सामग्रियोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् धरतीपर मस्तक टेककर भगवान्को प्रणाम करे और कर्पूर एवं चन्दन लगे हुए चमेलीके फूल भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ावे। इससे सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान् नृसिंह किसी भी कार्यमें कभी प्रतिहत नहीं होते। नृसिंह-कवचका एक बार जप करनेसे मनुष्य आगकी लपटद्वारा सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश कर सकता है। तीन बार जप करनेपर वह दिव्य कवच दैत्यों और दानवोंसे रक्षा करता है। तीन बार जप करके सिद्ध किया हुआ कवच भूत, पिशाच, राक्षस, अन्यान्य लुटेरे तथा देवताओं और असुरोंके लिये भी अभेद्य होता है। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंके दाता महापराक्रमी नृसिंहजीकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। शुभे! भगवान् नृसिंहका दर्शन, स्तवन, नमस्कार और पूजन करके मनुष्य राज्य, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्राप्त कर लेते हैं। भगवान् नृसिंहका दर्शन करके मनुष्यको मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है तथा वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो भक्तिपूर्वक नृसिंहरूपधारी भगवान्का एक बार भी दर्शन कर लेता है, वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है। दुर्गम संकटमें, चोर और व्याघ्र आदिकी पीड़ा उपस्थित होनेपर, दुर्गम प्रदेशमें, प्राणसंकटके समय, विष,अग्नि और जलसे भय होनेपर, राजा आदिसे भय प्राप्त होनेपर, घोर संग्राममें और ग्रह तथा रोग आदिकी पीड़ा प्राप्त होनेपर जो पुरुष भगवान् नृसिंहका स्मरण करता है, वह संकटोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्योदय होनेपर भारी अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् नृसिंहका दर्शन होनेपर सब प्रकारके उपद्रव मिट जाते हैं। भगवान् नृसिंहके प्रसन्न होनेपर गुटिका, अञ्जन, पातालप्रवेश, पैरोंमें लगाने योग्य दिव्यलेप, दिव्य रसायन तथा अन्य मनोवाञ्छित पदार्थ भी मनुष्य प्राप्त कर लेता है। मानव जिन-जिन कामनाओंका चिन्तन करते हुए भगवान् नृसिंहका भजन करता है, उन-उनको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
श्वेतमाधव, मत्स्यमाधव, कल्पवृक्ष और अष्टाक्षर-मन्त्र, स्नान, तर्पण आदिकी महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं— महाभागे! उस पुरुषोत्तमक्षेत्रमें तीर्थोंका समुदायरूप एक दूसरा तीर्थ है जो परम पुण्यमय तथा दर्शनमात्रसे पापोंका नाश करनेवाला है, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। उस तीर्थके आराध्य हैं—अनन्त नामक वासुदेव। उनका भक्तिपूर्वक दर्शन और प्रणाम