भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 712

७१० * संक्षिप्त नारदपुराण *


और उन्हें नमस्कार करके पूर्वाभिमुख बैठकर स्वाध्याय करे। उसके बाद देवता और ऋषियोंका तर्पण करके दिव्य मनुष्यों और पितरोंका भी तर्पण करे। मन्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि चित्तको एकाग्र करके तिलमिश्रित जलके द्वारा नाम-गोत्रोच्चारणपूर्वक पितरोंकी विधिवत् तृप्ति करे। श्राद्धमें और हवनकालमें एक हाथसे सब वस्तुएँ अर्पित करे, परंतु तर्पणमें दोनों हाथोंका उपयोग करना चाहिये। यही सनातन विधि है। बायें और दायें हाथकी सम्मिलित अञ्जलिसे नाम और गोत्रके उच्चारणपूर्वक 'तृप्यताम्' कहे और मौनभावसे जल दे*। यदि दाता जलमें स्थित होकर पृथ्वीपर जल दे अथवा पृथ्वीपर खड़ा होकर जलमें तर्पणका जल डाले तो वह जल पितरोंतक नहीं पहुँचता है। जो जल पृथ्वीपर नहीं दिया जाता वह पितरोंको नहीं प्राप्त होता। ब्रह्माजीने पितरोंके लिये अक्षय स्थानके रूपमें पृथ्वी ही दी है। अतः पितरोंकी प्रीति चाहनेवाले मनुष्योंको पृथ्वीपर ही जल देना चाहिये। पितर भूमिपर ही उत्पन्न हुए, भूमिपर ही रहे और भूमिमें ही उनके शरीरका लय हुआ; अतः भूमिपर ही उनके लिये जल देना चाहिये। अग्रभागसहित कुशोंको बिछाकर उसपर मन्त्रोंद्वारा देवताओं और पितरोंका आवाहन करना चाहिये। पूर्वाग्र कुशोंपर देवताओंका और दक्षिणाग्र कुशोंपर पितरोंका आवाहन करना उचित है।


भगवान् नारायणके पूजनकी विधि

**पुरोहित वसु कहते हैं—**ब्रह्मपुत्री मोहिनी! देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्य प्राणियोंका तर्पण करनेके पश्चात् मौनभावसे आचमन करके समुद्रके तटपर एक चौकोर मण्डप बनाये। उसमें चार दरवाजे रखे। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक हाथकी होनी चाहिये। मण्डप बहुत सुन्दर बनाया जाय। इस प्रकार मण्डप बनाकर उसके भीतर कर्णिकासहित अष्टदल कमल अङ्कित करे। उसमें अष्टाक्षर-मन्त्रकी विधिसे अजन्मा भगवान् नारायणका पूजन करे। हृदयमें उत्तम ज्योतिःस्वरूप ॐकारका चिन्तन करके कमलकी कर्णिकामें विराजमान ज्योतिःस्वरूप सनातन विष्णुका ध्यान करे; फिर अष्टदल कमलके प्रत्येक दलमें क्रमशः मन्त्रके एक-एक अक्षरका न्यास करे। मन्त्रके एक-एक अक्षरद्वारा अथवा सम्पूर्ण मन्त्रद्वारा भी पूजन करना उत्तम माना गया है। सनातन परमात्मा विष्णुका द्वादशाक्षर-मन्त्रसे पूजन करे। तदनन्तर हृदयके भीतर भगवान्‌का ध्यान करके बाहर कमलकी कर्णिकामें भी उनकी भावना करे। भगवान्‌की चार भुजाएँ हैं। वे महान् सत्त्वमय हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा कोटि-कोटि सूर्योंके समान है। वे महायोगस्वरूप हैं। इस प्रकार उनका चिन्तन करके क्रमशः आवाहन आदि उपचारद्वारा पूजन करे।

आवाहन-मन्त्र

मीनरूपो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः॥
आयातु देवो वरदो मम नारायणोऽग्रतः।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २६-२७)

'मीन, वराह, नृसिंह एवं वामन-अवतारधारी वरदायक देवता भगवान् नारायण मेरे सम्मुख पधारें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'


* श्राद्धे हवनकाले च पाणिनेकेन निर्वपेत्। तर्पणे तूभयं कुर्यादेष एव विधिः सदा॥
अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु। तृप्यतामिति सिञ्चेत्तु नामगोत्रेण वाग्यतः॥
(ना० उत्तर० ५६। ६२-६४)