भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 770 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 713

* उत्तरभाग * ७११

आसन-मन्त्र

कर्णिकायां सुपीठेऽत्र पद्मकल्पितमासनम्॥
सर्वसत्त्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २७-२८)
'यहाँ कमलकी कर्णिकामें सुन्दर पीठपर कमलका आसन बिछा हुआ है। मधुसूदन! सब प्राणियोंका हित करनेके लिये आप इसपर विराजमान हों। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

अर्घ्य-मन्त्र

ॐ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय हृषीकेशाय विष्णवे नमः।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
'त्रिभुवनपतियोंके भी पति, देवताओंके भी देवता, इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

पाद्य-मन्त्र

ॐ पाद्यं ते पादयोर्देव पद्मनाभ सनातन॥
विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २८-२९)
'देवपद्मनाभ! सनातन विष्णो!! कमलनयन मधुसूदन!!! आपके चरणोंमें यह पाद्य (पाँव पखारनेके लिये जल) समर्पित है, आप इसे स्वीकार करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

मधुपर्क-मन्त्र

मधुपर्कं महादेव ब्रह्माद्यैः कल्पितं तव॥
मया निवेदितं भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। २९-३०)
'महादेव! पुरुषोत्तम! ब्रह्मा आदि देवताओँने आपके लिये जिसकी व्यवस्था की थी, वही मधुपर्क मैं भक्तिपूर्वक आपको निवेदन करता हूँ। कृपया स्वीकार कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

आचमनीय-मन्त्र

मन्दाकिन्याः सितं वारि सर्वपापहरं शिवम्॥
गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम्।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। ३०-३१)
'भगवन्! मैंने गङ्गाजीका स्वच्छ जल जो सब पापोंको दूर करनेवाला तथा कल्याणमय है, आचमनके लिये भक्तिपूर्वक आपको अर्पित किया है, कृपया ग्रहण कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

स्नान-मन्त्र

त्वमापः पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वायुरेव च॥
लोकेश वृत्तिमात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। ३१-३२)
'लोकेश्वर! आप ही जल, पृथ्वी तथा अग्नि और वायुरूप हैं। मैं जीवनरूप जलके द्वारा आपको स्नान करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'

वस्त्र-मन्त्र

देव तन्तुसमायुक्ते यज्ञवर्णसमन्विते॥
स्वर्णवर्णप्रभे देव वाससी तव केशव।
ॐ नमो नारायणाय नमः॥
(ना० उत्तर० ५७। ३२-३३)
'देव केशव! यह दिव्य तन्तुओंसे युक्त यज्ञवर्णसमन्वित तथा सुनहले रंग और सुनहली प्रभावाले दो वस्त्र आपकी सेवामें समर्पित हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको नमस्कार है।'