संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 723, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरभाग * ७२१
प्रतिष्ठित होता है। उसे सदा धन-धान्यसे भरा हुआ स्थान प्राप्त होता है। वह भोगसम्पन्न और सदा ऐश्वर्य-ज्ञानसे परिपूर्ण होता है। उसने नरकसे अपने पितरों और पितामहोंका उद्धार कर दिया। जिसके हाथ, पैर और मन अपने वशमें हैं तथा जो विद्या, तपस्या और कीर्तिसे सम्पन्न है, वही तीर्थके पूर्ण फलका भागी होता है। जो प्रतिग्रहसे दूर रहता है और जो कुछ मिल जाय, उसीसे संतुष्ट होता है तथा जिसमें अहंकारका सर्वथा अभाव है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो संकल्परहित प्रवृत्तिशून्य, स्वल्पाहारी, जितेन्द्रिय तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे युक्त है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। धीर पुरुष श्रद्धा और एकाग्रतापूर्वक यदि तीर्थोंमें भ्रमण करता है तो वह पापी होनेपर भी उस पापसे शुद्ध हो जाता है। फिर जो शुद्ध कर्म करनेवाला है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? अश्रद्धालु, पापपीड़ित, नास्तिक, संशयात्मा और केवल युक्तिवादी—ये पाँच प्रकारके मनुष्य तीर्थ-फलके भागी नहीं होते। पापी मनुष्योंके तीर्थमें जानेसे उनके पापकी शान्ति होती है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्योंके लिये तीर्थ यथोक्त फलको देनेवाला है। जो काम, क्रोध और लोभको जीतकर तीर्थमें प्रवेश करता है, उसे उस तीर्थयात्रासे कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती। जो यथोक्त विधिसे तीर्थयात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वोंको सहन करनेवाले वे धीर पुरुष स्वर्गगामी होते हैं। गङ्गा आदि तीर्थोंमें मछलियाँ निवास करती हैं, पक्षीगण देवालयमें वास करते हैं; किंतु उनके चित्त भक्तिभावसे रहित होनेके कारण तीर्थसेवन तथा श्रेष्ठ देवमन्दिरमें रहनेसे कोई फल नहीं पाते। अतः हृदयकमलमें भावका संग्रह करके एकाग्रचित्त हो तीर्थोंका सेवन करना चाहिये।
मुनीश्वरोंने तीन प्रकारकी तीर्थयात्रा बतायी है—कृत, प्रयुक्त तथा अनुमोदित। ब्रह्मचारी बालक संयमपूर्वक गुरुकी आज्ञामें संलग्न रहकर उक्त तीनों प्रकारकी तीर्थयात्राको विधिपूर्वक सम्पन्न कर लेता है। (अर्थात् ब्रह्मचर्यपालन, इन्द्रियसंयम तथा गुरु-सेवनसे उसको गुरुकुलमें ही तीर्थयात्राका पूरा फल मिल जाता है।) जो कोई भी पुरुष तीर्थयात्राको जाय, वह पहले घरमें ही रहकर पूर्ण संयमका अभ्यास करे और पवित्र एवं सावधान होकर भक्तिभावसे विनम्र हो गणेशजीकी पूजा करे। तत्पश्चात् देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों तथा साधुपुरुषोंका भी अपने वैभव और शक्तिके अनुसार प्रयत्नपूर्वक सत्कार करे। बुद्धिमान् ब्राह्मण तीर्थयात्रासे लौटनेपर भी पुनः पूर्ववत् देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका पूजन करे। ऐसा करनेपर उसे तीर्थसे जिस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह सब यहाँ प्राप्त होता है। प्रयागमें, तीर्थयात्रामें तथा माता-पिताकी मृत्यु होनेपर अपने केशोंका मुण्डन करा देना चाहिये। ऐसा कोई कारण न होनेपर व्यर्थ ही सिर न मुड़ाये। जो गया जानेको उद्यत हो, वह विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्रीका वेश बना ले और अपने समूचे गाँवकी परिक्रमा करे। उसके बाद प्रतिदिन किसीसे प्रतिग्रह न लेकर पैदल यात्रा करे। गया जानेवाले पुरुषको पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। जो ऐश्वर्यके अभिमानसे अथवा लोभ या मोहसे किसी सवारी* द्वारा यात्रा करता है, उसकी वह तीर्थयात्रा
* मूलमें 'यान' शब्द आया है, अपने यहाँ 'यान' उस सवारीके लिये प्रयुक्त हुआ करता है जो किसी-न-किसी जीवद्वारा खींची या ढोयी जाती है। जैसे नरयान, अश्वयान, वृषभयान आदि। मूलमें आगे इन्हींका नाम लेकर दोष कहा गया है। अतः वर्तमान रेलगाड़ी या मोटरके लिये निषेध नहीं मानना चाहिये। फिर भी जो सर्वथा पैदल यात्रा कर सके, उसीकी यात्रा सर्वोत्तम कही जायगी।