संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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निष्फल है। इसलिये सवारीका त्याग करे। गोयान (बैलगाड़ी आदि)-पर तीर्थमें जानेसे गोवधका पाप कहा गया है। अश्वयान (घोड़े या एक्के-ताँगे आदि)-पर जानेसे वह यात्रा निष्फल होती है। तथा नरयान (पालकी, रिक्शा आदि)-पर जानेसे तीर्थका आधा फल मिलता है; किंतु पैदल चलनेसे चौगुने फलकी प्राप्ति होती है। वर्षा और धूप आदिमें छाता लगाकर डंडा हाथमें लेकर चले और कंकड़ तथा काँटोंमें शरीरको कष्टसे बचानेकी इच्छासे मनुष्य सदा जूता पहनकर चले। जो दूसरेके धनसे तीर्थयात्रा करता है, उसे पुण्यका सोलहवाँ अंश प्राप्त होता है तथा जो दूसरे कार्यके प्रसंगसे तीर्थमें जाता है, उसे उसका आधा फल मिलता है। तीर्थमें ब्राह्मणकी कदापि परीक्षा न करे। वहाँ याचकरूपसे आये हुए ब्राह्मणको भी भोजन कराना चाहिये, ऐसा मनुका कथन है। तीर्थमें किया हुआ श्राद्ध पितरोंके लिये तृप्तिकारक बताया गया है। समयमें या असमयमें मनुष्य जब भी तीर्थमें पहुँचे तभी उसे तीर्थश्राद्ध और पितृतर्पण अवश्य करना चाहिये।
पृथ्वीपर जो तीर्थ हैं, वे साधारण भूमिकी अपेक्षा अधिक पुण्यमय क्यों हैं? इसका कारण सुनो—जैसे शरीरके कुछ अवयव प्रधान माने गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वी, जल और तेजके प्रभावसे तथा मुनियोंके संगठनसे तीर्थोंको अधिक पवित्र कहा गया है। देवि! जो गङ्गाजीके समीप जाकर मुण्डन नहीं कराता, उसका समस्त शुभ कर्म नहीं किये हुएके समान हो जाता है। सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीके समीप जानेपर कल्पभरके पापोंका संग्रह मनुष्यके केशोंका आश्रय लेकर स्थित होता है। अतः उन केशोंका त्याग कर देना चाहिये। मनुष्यके जितने नख और रोएँ गङ्गाजीके जलमें गिरते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सती मोहिनी! जिसके पिता जीवित हैं, वह विधिज्ञ पुरुष तीर्थमें जानेपर क्षौर तो करावे, परंतु मूँछ न मुड़ावे।
प्रयागमें माघ-मकरके स्नानकी महिमा तथा वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य
पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! सुनो, अब मैं प्रयागके वेदसम्मत माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, जहाँ स्नान करके मानव सर्वथा शुद्ध हो जाता है। गङ्गामें जहाँ-कहीं भी स्नान किया जाय, यह कुरुक्षेत्रके समान पुण्यदायिनी है। उससे दसगुना पुण्य देनेवाली गङ्गा वह बतायी गयी है, जहाँ वह विन्ध्यपर्वतसे संयुक्त होती है। काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गा विन्ध्यपर्वतके निकटवर्तिनी गङ्गासे सौगुनी पुण्यदायिनी कही गयी है। काशीसे भी सौ गुना पुण्य वहाँ बताया गया है, जहाँ गङ्गा यमुनासे मिलती है। वह भी जहाँतक पश्चिमवाहिनी हैं, वहाँ उसमें सहस्रगुना पुण्य प्राप्त होता है। देवि! पश्चिमवाहिनी गङ्गा दर्शनमात्रसे ही ब्रह्महत्या आदि पापोंका निवारण करनेवाली है। देवि! पश्चिमाभिमुखी गङ्गा यमुनाके साथ मिली हैं। वे सौ कल्पोंका पाप हर लेती हैं। माघ मासमें तो वे और भी दुर्लभ हैं। भद्रे! पृथ्वीपर वे अमृतरूप कही जाती हैं। गङ्गा और यमुनाके सङ्गमका जल 'वेणी'के नामसे प्रसिद्ध है, जिसमें माघ मासमें दो घड़ीका स्नान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सती! पृथ्वीपर जितने तीर्थ तथा जितनी पुण्यपुरियाँ हैं, वे मकर राशिपर सूर्यके रहते हुए माघ मासमें वेणीमें स्नान करनेके लिये आती हैं। शुभे! ब्रह्मपुत्री मोहिनी! ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य, मरुद्गण, गन्धर्व, लोकपाल, यक्ष, किन्नर, गुह्यक, अणिमादि गुणोंसे युक्त अन्यान्य तत्त्वदर्शी पुरुष, ब्रह्माणी, पार्वती, लक्ष्मी, शची, मेधा, अदिति, रति, समस्त देवपत्नियाँ, नागपत्नियाँ तथा