संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 742, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें७४० * संक्षिप्त नारदपुराण *
कोटिह्रदमें स्नान करके कोटीश्वरका पूजन करनेसे मानव सुखी होता है। फिर सिद्धस्थानमें स्नान करके जो मनुष्य वहाँके असंख्य शिव-लिङ्गोंका पूजन करता है, वह इस पृथ्वीपर सिद्ध होता है। दामोदरगृहका दर्शन करके मनुष्य उत्तम सुख पाता है। शुभे! प्रभासके नाभिस्थानमें वस्त्रापथतीर्थ है। वहाँ भगवान् शङ्करकी आराधना करनेसे मनुष्य स्वयं साक्षात् शङ्करके समान हो जाता है। दामोदरमें स्वर्णरेखातीर्थ, रैवतक पर्वतपर ब्रह्मकुण्ड, उज्जयन्ततीर्थमें कुन्तीश्वर और महातेजस्वी भीमेश्वर तथा वस्त्रापथक्षेत्रमें मृगीकुण्डतीर्थ सर्वस्व माना गया है। इनमें क्रमशः स्नान करके देवताओंका यत्नपूर्वक पूजन तथा जलसे पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाता है। तदनन्तर गङ्गेश्वरका पूजन करनेसे मनुष्यको गङ्गास्नानका फल मिलता है। देवि! रैवतक पर्वतपर बहुतसे तीर्थ हैं। उनमें स्नान करके भक्तिपूर्वक ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पूजा करनेसे मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों पा लेता है। सुन्दरि! ये सब तीर्थ तुमसे बहुत थोड़ेमें बताये गये हैं। इनमें अवान्तरतीर्थ तो अनन्त हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता। मोहिनि! तीनों लोकोंमें प्रभास-क्षेत्रके समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं है।
पुष्कर-माहात्म्य
मोहिनि बोली— द्विजश्रेष्ठ! प्रभासक्षेत्रका अत्यन्त पुण्यदायक माहात्म्य सुना। अब पुष्करतीर्थका, जो कि मेरे पिता ब्रह्माजीका यज्ञसदन है, माहात्म्य विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
पुरोहित वसुने कहा— भद्रे! सुनो; मैं पुष्करके पवित्र माहात्म्यका, जो मनुष्योंको सदा अभीष्ट वस्तु देनेवाला है, वर्णन करता हूँ। इसमें अनेक तीर्थोंका माहात्म्य सम्मिलित है। जहाँ भगवान् विष्णुके साथ इन्द्र आदि देवता, गणेश, रैवत और सूर्य विराजमान हैं, उस पुष्करवनमें जो बिना किसी साधनके भी निवास करता है, वह अष्टाङ्गयोग-साधनका पुण्य पाता है। पृथ्वीपर इससे बढ़कर दूसरा कोई क्षेत्र नहीं है। अतः श्रेष्ठ मानवोंको सर्वथा प्रयत्न करके इस उत्तम क्षेत्रका सेवन करना चाहिये। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र इस क्षेत्रमें निवास करते हुए सर्वतोभावेन ब्रह्माजीमें भक्ति रखते और सभी जीवोंपर दया करते हैं, वे ब्रह्माजीके लोकमें जाते हैं। पुष्करवनमें, जहाँ प्राची सरस्वती बहती हैं, जानेसे मनुष्यको मति (मननशक्ति), स्मृति (स्मरणशक्ति), दया, प्रज्ञा (उत्कृष्ट ज्ञानशक्ति), मेधा (धारणाशक्ति) और बुद्धि (निश्चयात्मक वृत्ति) प्राप्त होती है। जो वहाँ तटपर स्थित होकर प्राची सरस्वतीके उस जलको पीते हैं, वे भी अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर सुखस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। पुष्करमें तीन उज्ज्वल शिखर हैं, तीन निर्मल झरने हैं तथा ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ—ये तीन सरोवर हैं। सती मोहिनि! वहाँ नन्दासरस्वतीके नामसे सुप्रसिद्ध महान् तीर्थ है, जो पुष्करसे एक योजन दूर पश्चिम दिशामें विद्यमान है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान और वेदवेत्ता ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौका दान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें जाता है। इसके सिवा वहाँ कोटितीर्थ है, जहाँ करोड़ों ऋषियोंका आगमन हुआ था। वहाँ स्नान और ब्राह्मणोंका पूजन करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। उसके बाद अगस्त्याश्रममें जाकर स्नान और कुम्भज ऋषिका पूजन करके मनुष्य भोगसामग्रीसे सम्पन्न और दीर्घायु होता है तथा शरीरका अन्त होनेपर वह स्वर्गलोकमें जाता है। सप्तर्षियोंके आश्रममें जाकर वहाँ एकाग्रचित्त