भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पृष्ठ 743, कुल 770 में से

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पृष्ठ 743

* उत्तरभाग * ७४१


हो स्नान तथा भक्तिभावसे उनका पूजन करके मनुष्य सप्तर्षिलोकमें जाता है। मनुके आश्रममें स्नान करके मानव सर्वत्र पूजा प्राप्त करता है। गङ्गाके उद्गमस्थानमें स्नान करनेसे गङ्गास्नानका फल मिलता है। ज्येष्ठ पुष्करमें स्नान करके ब्राह्मणको गोदान देनेसे मनुष्य इहलोकमें सम्पूर्ण भोगोंके पश्चात् ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मध्यम पुष्करमें स्नान करके ब्राह्मणको भूदान करनेवाला पुरुष श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। कनिष्ठ पुष्करमें स्नान और ब्राह्मणको सुवर्ण दान करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पाता और अन्तमें भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर विष्णुपदमें स्नान और ब्राह्मणको कुछ दान करके मनुष्य भगवान् विष्णुके प्रसादसे समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् नागतीर्थमें स्नान और नागोंका पूजन करके ब्राह्मणोंको दान देनेसे मनुष्य एक युगतक स्वर्गमें आनन्द भोगता है। आकाशमें पुष्करका चिन्तन करके 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा जो पुष्करवनमें स्नान करता है, वह शाश्वत ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है।

जब कभी कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्र हो तो वह महातिथि समझी जाती है। उस समय आकाश पुष्करमें स्नान करना चाहिये। भरणी नक्षत्रसे युक्त कार्तिककी पूर्णिमाको मध्यम पुष्करमें स्नान करनेवाला मानव आकाश पुष्करमें स्नान करनेका पुण्यफल पाता है। रोहिणी नक्षत्रसे युक्त कार्तिककी पूर्णिमाको कनिष्ठ पुष्करमें स्नान करनेवाला पुरुष आकाश पुष्करजनित पुण्यफलका भागी होता है। जब सूर्य भरणी नक्षत्रपर, बृहस्पति कृत्तिकापर तथा चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्रपर हों और नन्दा तिथिका योग हो तो उस समय पुष्करमें स्नान करनेपर आकाश पुष्करका सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। जब विशाखा नक्षत्रपर सूर्य और कृत्तिका नक्षत्रपर चन्द्रमा हों, तब आकाश पुष्कर नामक योग होता है। उसमें स्नान करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है। आकाशमें उतरे हुए इस कल्याणमय पितामहतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयकारी लोक प्राप्त होते हैं। सती मोहिनी! पुष्करवनमें पञ्चस्रोता सरस्वती नदीमें सिद्ध महर्षियोंने बहुत-से तीर्थ और देवस्थान स्थापित किये हैं। जो मनुष्य यहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणको धान्य और तिल दान करता है, वह इहलोक और परलोकमें परम गतिको प्राप्त होता है। जो गङ्गा-सरस्वतीके सङ्गममें स्नान करके ब्राह्मणोंका पूजन करता है, वह इहलोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है। सती मोहिनी! जो मानव अवियोगा बावड़ीमें स्नान करके विधिपूर्वक पिण्डदान देता है, वह अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। जो अजगन्ध शिवके समीप जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह इहलोक और परलोकमें भी मनोवाञ्छित भोग पाता है। पुष्करतीर्थमें सरोवरसे दक्षिण भागमें एक पर्वतशिखरपर सावित्री देवी विराजमान हैं। जो उनकी पूजा करता है, वह वेदके तत्त्वका ज्ञाता होता है। मोहिनी! वहाँ भगवान् वाराह, नृसिंह, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्रमा, कार्तिकेय, पार्वती तथा अग्निके पृथक्-पृथक् तीर्थ हैं। महाभागे! जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर उनमें स्नान करके ब्राह्मणोंको दान देता है, वह उत्तम गति पाता है। पुष्करमें स्नान दुर्लभ है, पुष्करमें तपस्याका अवसर भी दुर्लभ है, पुष्करमें दान दुर्लभ है और पुष्करमें रहनेका सुयोग भी दुर्लभ है। सौ योजन दूर रहकर भी जो मनुष्य स्नानके समय भक्तिभावसे पुष्करका चिन्तन करता है, वह उसमें स्नानका फल पाता है।

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