भारतकोश
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

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पृष्ठ 744

७४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

गौतमाश्रम-माहात्म्यमें गोदावरीके प्राकट्यका तथा पञ्चवटीके माहात्म्यका वर्णन

**मोहिनी बोली—**वसुजी! मैंने पुष्करका पापनाशक माहात्म्य सुन लिया। प्रभो! अब गौतम-आश्रमका माहात्म्य कहिये।

**पुरोहित वसुने कहा—**देवि! महर्षि गौतमका आश्रम परम पवित्र तथा देवर्षियोंद्वारा सेवित है। वह सब पापोंका नाशक तथा सब प्रकारके उपद्रवोंकी शान्ति करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिभावसे युक्त हो बारह वर्षोंतक गौतम-आश्रमका सेवन करता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है, जहाँ जाकर मनुष्य शोकका अनुभव नहीं करता। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! महर्षि गौतमके तपस्या करते समय एक बार बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि हुई, जो समस्त जीवोंका संहार करनेवाली थी। शुभे! उस भयानक दुर्भिक्षके आरम्भ होते ही सब मुनि अनेक देशोंसे गौतमके आश्रमपर आये। उन्होंने तपस्वी गौतमको इस बातकी जानकारी करायी कि 'आप हमें भोजन दें, जिससे हमारे प्राण शरीरमें रह सकें।' उन मुनियोंके इस प्रकार सूचना देनेपर महर्षि गौतमको बड़ी दया आयी। वे अपने ऊपर विश्वास करनेवाले उन ऋषियोंसे अपनी तपस्याके बलपर बोले।

**गौतमने कहा—**मुनियो! आप सब लोग मेरे आश्रमके समीप ठहरें। जबतक यह दुर्भिक्ष रहेगा, तबतक मैं आदरपूर्वक आपको भोजन दूँगा।

ऐसा कहकर गौतमने तपोबलसे गङ्गादेवीका ध्यान किया। उनके स्मरण करते ही गङ्गादेवी पृथ्वीतलसे प्रकट हुईं। महर्षिने गङ्गाजीको प्रकट हुई देख प्रातःकाल पृथ्वीपर अगहनीके बीज रोपे और दोपहर होते-होते वे धानके पौधे बढ़कर उनमें फल लग गये। उसी समय वे पक भी गये; अतः मुनिने उन सबको काट लिया। फिर उसी अगहनीके चावलसे रसोई तैयार करके उन्होंने उन ऋषियोंको भोजन कराया। भद्रे! इस प्रकार प्रतिदिन पके हुए अगहनी धानके चावलोंसे गौतमजीने भक्तिभावसे युक्त हो उन अतिथियोंका अतिथिसत्कार किया। तदनन्तर नित्यप्रति ब्राह्मण-भोजन कराते हुए मुनीश्वर गौतमके बारह वर्ष बीत जानेपर दुर्भिक्षकाल समाप्त हो गया। इसलिये वे सब मुनि मुनिश्रेष्ठ गौतमसे पूछकर अपने-अपने देशको चले गये। मोहिनी! गौतम मुनि बहुत वर्षोंतक वहाँ तपस्यामें लगे रहे।

तदनन्तर अम्बिकापति भगवान् शिवने उनकी तपस्यासे संतुष्ट हो उन्हें अपने पार्षदगणोंके साथ दर्शन दिया और कहा—'वर माँगो।' तब मुनिवर गौतमने भगवान् त्र्यम्बकको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और बोले—'सबका कल्याण करनेवाले भगवन्!

आपके चरणोंमें मेरी सदा भक्ति बनी रहे और मेरे आश्रमके समीप इसी पर्वतके ऊपर आपको मैं सदा विराजमान देखूँ, यही मेरे लिये अभीष्ट