संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 748, कुल 770 में से
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पोषण करनेवाले और ईश्वर हैं; समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं; देवताओंके नेता, विजेता तथा स्वयं कभी पराजित न होनेवाले हैं उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो मुझे और इन तीनों लोकोंको रचकर सबका धारण-पोषण करते हैं उन कालके भी नियन्ता आप भगवान् गङ्गाधरकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनसे यजुर्वेदके साथ ऋग्वेद और सामवेद भी प्रकट हुए हैं उन सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वस्वरूप, विद्वान् एवं ईश्वर शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वको सब ओरसे देखते रहते हैं तथा जिनके भयसे भूत, वर्तमान और भविष्य जगत्के जीव पापकर्मोंका त्याग करते हैं, उन सर्वोत्तम द्रष्टा आप भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो देवताओंके नियन्ता और समस्त पापोंको हर लेनेवाले हर हैं उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न शान्त संन्यासी अपने हृदयकमलमें जिन कल्याणमय परमात्माकी उपासना करते हैं, उन ईशान देवको मैं प्रणाम करता हूँ।
'ईश! मैं अज्ञानी, अत्यन्त क्षीण, अशिक्षित, असहाय, अनाथ, दीन, विपत्तिग्रस्त तथा दरिद्र हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुर्मुख, दुष्कर्मी, दुष्ट तथा दुर्दशाग्रस्त हूँ; मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सिद्धिके लिये वरण करूँ। शम्भो! राग, द्वेष तथा मदकी लपटोंसे प्रज्वलित संसाररूपी अग्निके द्वारा हम दग्ध हो रहे हैं; दयालो! आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके अनेक नाम हैं और बहुतोंने आपका स्तवन किया है। हर! मैं परायी स्त्री, पराये घर, पराये वस्त्र, पराये अन्न तथा पराये आश्रयमें आसक्त हूँ; आप मेरी रक्षा करें। मुझे विश्वका भरण-पोषण करनेवाली धन-सम्पत्तिके साथ उत्तम विद्या दीजिये। देवेश! अनिष्ट तो मुझे सहस्रों मिलते हैं, किंतु इष्ट वस्तुका सदा वियोग ही बना रहता है; आप मेरे मानसिक रोगका नाश कीजिये। भगवन्! आप महान् हैं। देवेश! आप ही हमारे रक्षक हैं, दूसरा कोई मेरी रक्षा करनेवाला नहीं है। आप ब्रह्माजीके भी अधिपति हैं, अतः मुझे स्वीकार करके मेरी रक्षा कीजिये। उमापते! आप ही मेरे माता-पिता, पितामह, आयु, बुद्धि, लक्ष्मी, भ्राता तथा सखा हैं। देवेश! आप ही सब कर्मके कर्ता हैं, अतः मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, वह सब आप क्षमा करें। प्रभुतामें आपकी समता करनेवाला कोई नहीं है और लघुतामें मैं भी अपना सानी नहीं रखता। अतः देव! महादेव! मैं आपका हूँ और आप मेरे हैं। आपके मुखपर सुन्दर मुसकान सुशोभित है। गोरे अङ्गोंमें लगी हुई विभूति उनकी गौरताको और बढ़ा देती है। आपका श्रीविग्रह बालसूर्यके समान तेजस्वी तथा सौम्य है। आपका मुख सदा प्रसन्न रहता है तथा आप शान्तस्वरूप हैं। मैं मन और वाणीके द्वारा आपके गुणोंका गान करता हूँ। ताण्डवनृत्य करते और मेरी ओर देखते हुए आप भगवान् उमाकान्तको हम सैकड़ों वर्षोंतक निहारते रहें, यही हमारा अभीष्ट वर है। महाभाग! भगवन्! हम आपके प्रसादसे नीरोग, विद्वान् और बहुश्रुत होकर सैकड़ों वर्षोंतक जीवित रहें। ईशान! स्त्री तथा भाई-बन्धुओंके साथ आपके ताण्डवरूपी अमृतका यथेष्ट पान करते हुए सैकड़ों वर्षोंतक आनन्दका अनुभव करते रहें। देवदेव! महादेव! हम इच्छानुसार आपके चरणारविन्दोंके मधुर मकरन्दका पान करते हुए सौ वर्षोंतक आमोदमें मग्न रहें।
'महादेव! हम प्रत्येक जन्ममें कीट, नाग, पिशाच अथवा जो कोई भी क्यों न हों, सैकड़ों वर्षोंतक आपके दास बने रहें। ईश! देव! महादेव! हम सभामें अपने कानोंद्वारा आपके नृत्य, वाद्य तथा कण्ठकी मधुर ध्वनिका सैकड़ों वर्षोंतक श्रवण करते रहें। जो स्मरणमात्रसे संसार-बन्धनका