संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 749, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें* उत्तरभाग * ७४७
नाश करनेवाले हैं, आपके उन दिव्य नामोंका हम सैकड़ों वर्षोंतक कीर्तन करते रहें। जो नित्य तरुण, सम्पूर्ण विश्वके अधिपति तथा त्रिकालदर्शी विद्वान् हैं उन भगवान् शिवका मैं कब दर्शन करूँगा। जिसमें बहुत-से पाप भरे हुए हैं, जिसने कभी लेशमात्र भी पुण्यका उपार्जन नहीं किया है तथा जिसकी बुद्धि अत्यन्त खोटी है ऐसे मुझ अधमको भगवान् महेश्वर क्या कभी अपना सेवक जानकर स्वीकार करेंगे? गायको! तुम गाओ; यदि राग आदि प्राप्त करना चाहते हो तो कुबेरके सखा भगवान् शिवकी महिमाका गान करो। सखी जिह्वे! तेरा कल्याण हो। तू विद्यादाता उमापतिकी उच्च स्वरसे स्तुति बोला कर। अजन्मा जीव! तू शान्तभावसे चेत जा, क्या तुझे यह ज्ञात नहीं है कि इन भगवान् शिवकी तृप्तिसे ही यह सम्पूर्ण जगत् तृप्त होता है। इसलिये इनके नामामृतका पान कर। ऐ मेरे चित्त! जिनकी गन्ध मनोहर और स्पर्श सुखद है, जो सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं तथा चन्द्रमा जिनका आभूषण है उन भगवान् शङ्करका गाढ़ आलिङ्गन कर। त्रिपुरासुरका अन्त करनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है। तीनों लोकोंके स्वामी दिगम्बर शिवको नमस्कार है। भवकी उत्पत्तिके कारण भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रभो! आपकी असंख्य प्रजाएँ हैं तथा आपका स्वरूप अत्यन्त विचित्र है। आपसे ही जगत्की उत्पत्ति हुई है। जिनका सुवर्णमय पादपीठ देवराज इन्द्रके महाकिरीटमें जड़े हुए नाना प्रकारके रत्नोंसे आवृत होता है, भस्म ही जिनका अङ्गराग है तथा जिनसे भिन्न पर अथवा अपर किसी भी वस्तुकी सत्ता नहीं है, उन परमेश्वर शिवको नमस्कार है। जिन आपमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता और विलीन हो जाता है; जो छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े हैं; जिनका कहीं अन्त नहीं है; जो अव्यक्त, अचिन्त्य, एक, दिगम्बर, आकाशस्वरूप, अजन्मा, पुराणपुरुष तथा यज्ञयूपमय हैं उन भगवान् हरको मैं प्रणाम करता हूँ। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा ऊपर-नीचे सब ओर वे ही तो हैं। जो चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं तथा जो परमानन्दस्वरूप एवं शोक-दुःखसे रहित हैं; सबके हृदयकमलमें परमात्मरूपसे जिनका निवास है; जिनसे सम्पूर्ण दिशाएँ और अवान्तर दिशाएँ प्रकट हुई हैं; उन शिवस्वरूप भगवान् महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। चन्द्रमौले! राग आदि कपट-दोषके कारण प्रकट हुई भवरूपी महारोगसे मैं बड़ी घबराहटमें हूँ। अपनी कृपादृष्टिसे मुझे देखकर आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि वैद्योंमें आप सबसे बड़े वैद्य हैं।
‘मेरे मनमें दुःखका महासागर उमड़ आया है, मैं लेशमात्र सुखसे भी वञ्चित हूँ, पुण्यका तो मैंने कभी स्पर्श भी नहीं किया है और मेरे पातक असंख्य हैं; मैं मृत्युके हाथमें आ गया हूँ और बहुत डरा हुआ हूँ; भगवान् भव! आप आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सब ओरसे मेरी रक्षा कीजिये। महेश! मैं असार-संसाररूपी महासागरमें डूबकर जोर-जोरसे क्रन्दन कर रहा हूँ; मेरा राग बहुत बढ़ गया है; मैं सर्वथा असमर्थ हो गया हूँ; आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरी रक्षा कीजिये। जिनके मुखपर मनोहर मुसकानकी छटा छा रही है, चन्द्रमाकी कला जिनके मस्तकका आभूषण बनी हुई है तथा जो अन्धकारसे परे हैं, उन सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् शिवका माता पार्वतीके साथ कब दर्शन करूँगा? अनादिकालसे मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जीवो! तुम सब लोग यहाँ आओ और अपने हृदयकमलमें भगवान् शिवका चिन्तन करो; क्योंकि जिन्होंने वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद्)-के विज्ञानद्वारा उसके अर्थभूत परमात्माको पूर्ण निश्चयपूर्वक जान लिया है, वे ज्ञानीजन मोक्षके लिये सदा उन्हींका ध्यान करते हैं। जो उत्तम