संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 750, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें७४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
पुत्रकी इच्छा रखनेवाले हैं, वे मनुष्य भी इन नित्य तरुण भगवान् शिवकी आराधना करें। इन्हींसे सृष्टिके आरम्भमें जगद्विधाता स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए थे। बहुत कहनेसे क्या लाभ? इन भगवान् शिवकी शरणमें जानेसे समस्त कामनाएँ सिद्ध होती हैं। पूर्वकालमें इन्हींकी शरण लेकर महर्षि अगस्त्य दिन-रातमें वृद्धावस्थासे युवा हो गये थे। ऐ मेरे नेत्ररूपी भ्रमरो! तुम और सब कुछ छोड़कर सदा इन भगवान् शिवका ही आश्रय लो। ये आमोदवान् (सुगन्ध और आनन्दसे परिपूर्ण) और मृदु (कमलसे भी कोमल) हैं। परम स्वादिष्ट एवं मधुर हैं; ये तुम्हारा कल्याण करेंगे। ओ मनुष्य! तुम भगवान् शिवकी शरण लेकर ऐसे हो जाओगे कि तुम्हारी किसीसे भी तुलना नहीं हो सकेगी। तुम समस्त मनुष्यों और देवताओंको भी अपने गुणोंसे परास्त कर दोगे। वाणी तुम्हें नमस्कार है; तुम हृदयगुफामें शयन करनेवाले इन नित्य-तरुण भगवान् महेश्वरकी स्तुति करो। मन! तू जिस-जिस अभीष्ट वस्तुका चिन्तन करेगा, वह सब तुझे अवश्य प्राप्त होगी। विषयोंमें कभी दुःखसे छुटकारा नहीं मिल सकता। हम हृदयकी शुद्धिके लिये भगवान् रुद्रकी आराधना करेंगे। दयालु भगवन्! हमने पूर्वकालमें अज्ञानवश जो आपके विरुद्ध अपराध या दुष्कर्मका अनुष्ठान किया है, वह सब क्षमा करके जैसे पिता अपने पुत्रोंको आश्रय देता है उसी प्रकार आप हमें भी अपनाइये।
'संसार नामक क्रोधमें भरे हुए सर्पने राग, द्वेष, उन्माद और लोभ आदिरूप तीखे दाँतोंसे मुझे डँस लिया है। इस अवस्थामें मुझे देखकर सबकी रक्षा करनेवाले दयालु देवता पिनाकधारी भगवान् शिव मेरी रक्षा करें। रुद्रदेव! जो लोग समाधिके अन्तमें उपर्युक्त वचन कहकर आपको नमस्कार करते हैं, वे जन्म-मृत्युरूपी सर्पसे डसे हुए लोग संत होकर आपको प्राप्त होते हैं। नीलग्रीव! मैं जीवात्मारूपसे ब्रह्माजीके साथ आपकी वन्दना करता हुआ आपकी ही शरण आता हूँ। अनाथनाथ वसुस्वरूप! महेश्वर! हम सांसारिक चिन्ताके भीषण ज्वरसे पीडित हैं; बड़े-बड़े रोगोंसे ग्रस्त हो गये हैं; समस्त पातकोंके निवासस्थान बने हुए हैं; कालकी दृष्टि हमसे दूर नहीं है; ऐसी दशामें आप अपने औषधरूप हाथसे हमारा स्पर्श करें। शूरवीर! आपका करस्पर्श सब प्रकारकी सिद्धियोंका हेतु है। आप कालके भी काल हैं। संसारकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् भवको नमस्कार है। भस्मभूषित वक्षवाले हरको नमस्कार है। संसारके पराभव और भयमें साथ देनेवाले पिनाकधारी रुद्रको नमस्कार है। विश्वके पालक कल्याणस्वरूप शिवको नमस्कार है। जीवके सनातन सखा उन महेश्वरको नमस्कार है, जिनके सखारूप जीवको न तो कोई मार सकता है और न कोई परास्त ही कर सकता है। देवताओंके पति, इन्द्रके भी स्वामी भगवान् शिवको नमस्कार है। प्रजापतियोंके और भूमिपतियोंके भी अधिपति भगवान् शिवको नमस्कार है तथा अम्बिकापति उमापतिको नमस्कार है, नमस्कार है।
'जो प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले, त्रिकालदर्शी, विद्वानोंमें भी सबसे श्रेष्ठ विद्वान् और उत्तम यशवाले हैं उन भगवान् गणेशको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। देवतालोग युद्धमें जिन स्कन्दस्वामीका आवाहन करके विजय पाते हैं उन सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् सुब्रह्मण्यकी मैं वन्दना करता हूँ। सुब्रह्मण्य—स्कन्दस्वामी सच्चिदानन्दमय हैं। कल्याणमयी जगदम्बिकाको नमस्कार है। कल्याणमय विग्रहवाली शिवप्रियाको नमस्कार है। जिनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान है; जो अपने चरणोंमें मणिमय नूपुर धारण करती हैं; जिनका मुख सदा प्रसन्न रहता है; जो अपने हाथोंमें कमल धारण किये रहती हैं; जिनके नेत्र विशाल हैं, जो भाषाशास्त्रकी विदुषी तथा उत्तम वचन बोलनेवाली हैं, उन गौरीदेवीको मैं प्रणाम करता हूँ। मैं मेनाकी पुत्री उन